“जज कोई सुपर रोबोट या सुपर कंप्यूटर नहीं”: अदालती आदेश को ‘विकल्प’ मानने वाली मानसिकता पर इलाहाबाद हाईकोर्ट तल्ख, गाजीपुर के DIOS अवमानना के दोषी करार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक कर्मचारी के वेतन भुगतान से जुड़े चार साल पुराने अंतरिम आदेश का पालन न करने पर गाजीपुर के जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) श्री प्रकाश सिंह को अवमानना का दोषी ठहराया है। कोर्ट ने प्रशासन की उस दलील को कड़े शब्दों में खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि चूंकि राज्य सरकार की ‘स्टे वेकेशन एप्लिकेशन’ (स्थगन आदेश वापस लेने की अर्जी) लंबित है, इसलिए अवमानना की कार्यवाही टाल दी जानी चाहिए।

न्यायपीठ ने कानून के शासन और कोर्ट की गरिमा को सर्वोपरि बताते हुए स्पष्ट किया कि किसी अर्जी के लंबित होने मात्र से कोर्ट के प्रभावी आदेशों को निष्प्रभावी नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने दोषी अधिकारी को 8 जुलाई 2026 को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में उपस्थित होने का निर्देश दिया है ताकि उनके खिलाफ आरोप तय (framing of charges) किए जा सकें। हालांकि, कोर्ट ने उन्हें अगली सुनवाई से पहले आदेश का अनुपालन कर अपनी स्थिति सुधारने (purge the contempt) का एक अंतिम विकल्प भी दिया है।

कार्यभार का दबाव: “सुपर रोबोट” की उम्मीद और मुकदमों का अंबार

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में न्यायाधीशों पर काम के अत्यधिक दबाव और उनके सामने सूचीबद्ध होने वाले सैकड़ों मामलों का अत्यंत संवेदनशीलता के साथ उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि जब पक्षकार अदालती आदेशों की धज्जियां उड़ाते हैं और कार्रवाई से बचने के बहाने ढूंढते हैं, तो पूरी कानूनी व्यवस्था मजाक बनकर रह जाती है। न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र ने टिप्पणी की:

“इलाहाबाद हाईकोर्ट जैसे अत्यधिक कार्यभार वाले संवैधानिक कोर्टों में, जहाँ प्रत्येक जज के समक्ष प्रतिदिन लगभग 400, 500, 600 और कभी-कभी 800 से अधिक मामले सूचीबद्ध होते हैं, अदालती कार्यवाहियों के निस्तारण में काफी समय लग सकता है; कभी-कभी वर्ष और कभी-कभी दशक भी। फिर भी क्या चारों ओर लोग ऐसे अत्यधिक बोझ वाले जजों से यह उम्मीद करते हैं कि वे निरंतर काम करने वाले सुपर रोबोट, सुपर कंप्यूटर या सुपर-ह्यूमन बन जाएं? यदि मुकदमों के लंबित रहने के दौरान पक्षकारों को प्रभावी निर्देशों की खुलेआम अवहेलना करने की अनुमति दी गई, तो न्याय व्यवस्था पूरी तरह से अराजकता में बदल जाएगी। कानून ऐसी धृष्टता की कतई इजाजत नहीं देता।”

क्या है पूरा मामला?

इस विवाद की शुरुआत वर्ष 2017 में राधेश्याम यादव द्वारा दायर एक रिट याचिका से हुई थी। रिट कोर्ट ने 18 अप्रैल 2022 को एक अंतरिम आदेश पारित किया। इस आदेश में इसी प्रकार की अन्य याचिकाओं में पारित अंतरिम आदेशों का संज्ञान लेते हुए निर्देश दिया गया था कि याचिकाकर्ता को रिट याचिका के लंबित रहने के दौरान उसके वर्तमान वेतन का भुगतान किया जाए।

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इस अंतरिम आदेश के खिलाफ दायर विशेष अपील (स्पेशल अपील संख्या 385/2022) को 6 जुलाई 2022 को वापस लिए जाने के कारण खारिज कर दिया गया था, जिसमें अपीलकर्ता को रिकॉल आवेदन दाखिल करने की स्वतंत्रता दी गई थी। इसके बावजूद याचिकाकर्ता के वेतन का भुगतान नहीं किया गया, जिससे क्षुब्ध होकर याचिकाकर्ता ने वर्ष 2022 में यह अवमानना याचिका दायर की। कार्यवाही के दौरान, सिविल मिस. इम्प्लीडमेंट एप्लिकेशन संख्या 7 (वर्ष 2025) के माध्यम से वर्तमान DIOS गाजीपुर, श्री प्रकाश सिंह को विपक्षी पक्षकार संख्या 4 के रूप में मामले में पक्षकार बनाया गया।

कोर्ट में दोनों पक्षों की दलीलें

कोर्ट के पिछले निर्देश के अनुपालन में DIOS श्री प्रकाश सिंह व्यक्तिगत रूप से कोर्ट के समक्ष उपस्थित हुए।

विपक्षी अधिकारी की ओर से दी गई दलीलें: DIOS की ओर से दाखिल हलफनामे में यह तर्क दिया गया कि राज्य सरकार ने 12 मई 2022 को ही अंतरिम आदेश को वापस लेने (stay vacation) के लिए याचिका दायर कर दी थी और 13 मई 2026 को इसे सूचीबद्ध (listing) करने के लिए आवेदन भी प्रस्तुत किया था। इस आधार पर राज्य के वकील ने अनुरोध किया कि जब तक इस अर्जी पर अंतिम निर्णय नहीं आ जाता, तब तक अवमानना की कार्यवाही को स्थगित रखा जाए।

अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता श्री बृजेश कुमार ने अवमानना कार्यवाही को टालने के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के दो ऐतिहासिक फैसलों का हवाला दिया:

  1. विनय कुमार पांडे बनाम कमिटी ऑफ मैनेजमेंट, श्री गांधी इंटर कॉलेज व अन्य (सिविल अपील संख्या 4007-4008 / 2020)
  2. अनिल कुमार सिसोदिया बनाम वीरेंद्र कुमार मिश्रा (एसएलपी संख्या 13990 / 2024)

याचिकाकर्ता के वकील का प्रतिवाद: याचिकाकर्ता के अधिवक्ता श्री अवधेश कुमार मालवीय ने इस दलील का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि प्रशासन पिछले चार वर्षों से आदेश की अवहेलना कर रहा है और वेतन रोकने के लिए केवल एक अर्जी का लंबित होना कोई कानूनी आधार नहीं हो सकता।

कानूनी विश्लेषण और सुप्रीम कोर्ट की नजीरों का अंतर

न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र ने राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत दोनों नजीरों (precedents) का गहनता से विश्लेषण किया और पाया कि वर्तमान मामले की परिस्थितियां उन मामलों से बिल्कुल अलग हैं:

  • ‘विनय कुमार पांडे’ मामले से भिन्नता: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उस मामले में हाईकोर्ट का आदेश ‘तदर्थ अंतरिम आदेश’ (ad-interim order) था, जो केवल ‘अगली सुनवाई की तिथि तक’ प्रभावी था। इसके विपरीत, वर्तमान मामले में दिया गया आदेश कोई अल्पकालिक आदेश नहीं था, बल्कि याचिका के ‘लंबित रहने के दौरान’ निरंतर वेतन भुगतान का स्पष्ट निर्देश था। इसके अतिरिक्त, राज्य ने 2022 के बाद से अपनी अर्जी पर सुनवाई के लिए कोई प्रयास नहीं किया और केवल 13 मई 2026 को तब एक लिस्टिंग एप्लिकेशन दाखिल की, जब कोर्ट ने अधिकारी को खुद पेश होने का कड़ा आदेश दे दिया।
  • ‘अनिल कुमार सिसोदिया’ मामले से भिन्नता: उस मामले में सरकारी अधिकारियों ने स्थगन आदेश के लिए डिवीजन बेंच के समक्ष लगातार गंभीर प्रयास किए थे, लेकिन भारी बैकलॉग के कारण उनकी सुनवाई नहीं हो पा रही थी। इसके विपरीत, वर्तमान मामले में विपक्षी अधिकारियों ने अपनी अर्जी को चार साल तक निष्क्रिय (dormant) छोड़ दिया था।
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“आवेदन दाखिल करना उल्लंघन का लाइसेंस नहीं”

कोर्ट ने बहुत ही कड़े शब्दों में स्पष्ट किया कि सिर्फ अर्जी दायर कर देने से किसी को अदालती आदेश को नजरअंदाज करने का अधिकार नहीं मिल जाता:

“जिस व्यक्ति के विरुद्ध कोई अंतरिम आदेश प्रभावी है, उसे केवल इस आधार पर यह तय करने का अधिकार खुद को देने की अनुमति नहीं दी जा सकती कि वह आदेश का पालन करेगा या नहीं कि उसने आदेश को वापस लेने, संशोधित करने या स्पष्ट करने के लिए कोई आवेदन दायर कर रखा है। ऐसा आवेदन दाखिल करने से कोर्ट का सक्रिय आदेश निष्प्रभावी, स्थगित या निष्क्रिय नहीं हो जाता। जब तक सक्षम कोर्ट अपने पूर्व के आदेश को संशोधित, स्थगित या निरस्त नहीं कर देता, तब तक वह आदेश पूरी बाध्यकारी शक्ति के साथ लागू रहता है।”

कोर्ट ने आगे जोड़ा कि यदि आवेदन दाखिल करने मात्र को ही अनुपालन से बचने का आधार मान लिया गया, तो हर उल्लंघनकर्ता बार-बार अर्जी दाखिल कर उसकी आड़ में छिपने लगेगा।

महात्मा गांधी के विचार और प्रत्यास्थापन का सिद्धांत (Doctrine of Restitution)

कोर्ट ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रसिद्ध पुस्तक ‘सत्य के प्रयोग’ (My Experiments with Truth) के एक अमर सूत्र—“कोई भी आपकी अनुमति के बिना आपका अपमान नहीं कर सकता”—का उल्लेख करते हुए कहा:

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“यदि किसी संवैधानिक कोर्ट का आदेश प्रभावी है और उसका खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है, और फिर भी कोर्ट केवल इसलिए कार्रवाई करने से बचता है कि कोई अर्जी लंबित है, तो कोर्ट की गरिमा के इस ह्रास के लिए केवल उल्लंघनकर्ता जिम्मेदार नहीं है। कानून की महिमा तभी कम होती है जब कोर्ट स्वयं अपने आदेश को बेअसर होने की मौन अनुमति दे देता है। इस अर्थ में, एक प्रभावी न्यायिक आदेश को लागू न करना उसके उल्लंघन को एक मूक सहमति देने जैसा है…”

इसके साथ ही, कोर्ट ने राज्य सरकार की इस आशंका को भी दूर किया कि यदि बाद में अंतरिम आदेश खारिज हो गया तो भुगतान किए गए धन की हानि होगी। कोर्ट ने ‘प्रत्यास्थापन के सिद्धांत’ (Doctrine of Restitution) को रेखांकित करते हुए कहा कि यदि कोई अंतरिम आदेश बाद में रद्द हो जाता है, तो कानून स्वतः ही दोनों पक्षों को पूर्व स्थिति में वापस ले आता है। अतः आदेश का पालन करने से राज्य को कोई अपूरणीय क्षति नहीं हो सकती।

अदालत का अंतिम आदेश

कोर्ट ने गाजीपुर के DIOS श्री प्रकाश सिंह को अवमानना का दोषी पाते हुए निम्नलिखित निर्देश दिए:

  1. दोषी करार: विपक्षी अधिकारी श्री प्रकाश सिंह को 18 अप्रैल 2022 के अंतरिम आदेश की जानबूझकर अवहेलना करने के कारण कोर्ट की अवमानना का दोषी पाया जाता है।
  2. सुनवाई की तिथि: इस मामले को अवमानना आवेदन (सिविल) संख्या 6489/2022 के साथ संबद्ध किया जाए और 8 जुलाई 2026 को शीर्ष दस मामलों में सूचीबद्ध किया जाए।
  3. आरोप तय करना: अगली तिथि (8 जुलाई 2026) पर विपक्षी अधिकारी को कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना होगा, ताकि उनके खिलाफ आरोप तय किए जा सकें।
  4. बचाव का अंतिम अवसर: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिकारी के पास अभी भी अवसर है कि वे मुख्य अदालती आदेश का पालन करके अवमानना के प्रभाव को समाप्त (purge the contempt) कर सकते हैं।

मामले का विवरण

  • केस का नाम: राधेश्याम यादव बनाम श्री अशोक नाथ तिवारी, जिला विद्यालय निरीक्षक
  • केस संख्या: अवमानना आवेदन (सिविल) संख्या 6468 / 2022
  • पीठ: न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र 
  • फैसले की तिथि: 19 मई 2026

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