इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने अपहरण, बंधक बनाने और बलात्कार के आरोपी की दोषमुक्ति (बरी किए जाने) को चुनौती देने वाली पीड़िता की आपराधिक अपील को खारिज कर दिया है। माननीय न्यायमूर्ति अब्दुल मोइन और माननीय न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने अंबेडकर नगर के एडिशनल सेशन जज (F.T.C. प्रथम) द्वारा 26 मार्च 2026 को दिए गए फैसले को बरकरार रखा, जिसमें आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया था।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष अपना मामला संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। अदालत ने पाया कि पीड़िता के बयानों में गंभीर विरोधाभास थे, लंबी अंतरराज्यीय यात्रा के दौरान उसने जनता के बीच कोई शोर नहीं मचाया, और मामले में कोई पुख्ता मेडिकल साक्ष्य भी मौजूद नहीं था। इन कारणों से पीड़िता की गवाही कानूनन “स्टर्लिंग क्वालिटी” (उत्कृष्ट और अचूक स्तर) की कसौटी पर खरी नहीं उतरती।
मामले की पृष्ठभूमि
अभियोजन पक्ष के अनुसार, घटना की शुरुआत 23 जनवरी 2023 की दोपहर को हुई थी। पीड़िता अपने घर पर थी, तभी पड़ोस में रहने वाली इंद्रावती के छोटे बेटे ने उसे बुलाया। वहां पहुंचने पर पीड़िता की मुलाकात आरोपी अमित शहानी की चाची सुमन से हुई। दोनों महिलाओं ने पीड़िता से पेट खराब होने की बात कहकर पास के जंगल की तरफ चलने का अनुरोध किया।
दोपहर करीब 3:00 बजे जब वे जंगल के रास्ते पर पहुंचे, तभी वहां एक बोलेरो कार आकर रुकी, जिसमें से आरोपी अमित शहानी और सुजीत कुमार बाहर निकले। कार में दो अन्य अज्ञात व्यक्ति भी बैठे थे। इंद्रावती और सुमन ने कथित तौर पर कहा, “देखो, हम इसे ले आए,” जिसके बाद पीड़िता को जबरन गाड़ी के अंदर खींच लिया गया। पीड़िता के शोर मचाने का प्रयास करने पर सुजीत कुमार ने कथित तौर पर उसकी छाती पर पिस्तौल तान दी और उसे व उसके परिवार को जान से मारने की धमकी देकर चुप रहने पर मजबूर कर दिया।
इसके बाद पीड़िता को अकबरपुर रेलवे स्टेशन ले जाया गया, जहाँ से रात 8:00 बजे उसे ट्रेन द्वारा दिल्ली ले जाया गया। अगले दिन, 24 जनवरी 2023 को उसे बस के जरिए दिल्ली से कैथल, चंडीगढ़ ले जाया गया। वहाँ उसे एक कमरे में रखा गया, जहाँ आरोपी का फूफा विजय कुमार उर्फ हवलदार भी आ गया। सुजीत और विजय के जाने के बाद, अमित शहानी ने कथित तौर पर उसी रात पीड़िता के साथ बलात्कार किया। पीड़िता का आरोप था कि उसे दिन में कमरे के अंदर बंद रखा जाता था और शाम को आरोपी उसके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाता था।
आरोप के अनुसार, 31 जनवरी 2023 को पीड़िता की पिटाई की गई और अंग्रेजी में लिखे कुछ दस्तावेजों पर जबरन हस्ताक्षर कराए गए। इसके बाद, 10 फरवरी 2023 को उसे दूसरे कमरे में ले जाया गया, जहाँ मारपीट कर अमित के साथ जबरन शादी कराई गई, मांग में सिन्दूर भरा गया और इस पूरी प्रक्रिया की तस्वीरें और वीडियो बनाए गए।
14 फरवरी 2023 की दोपहर करीब 12:00 बजे, जब अमित सो रहा था, पीड़िता कमरे का दरवाजा बाहर से बंद कर आरोपी का मोबाइल लेकर भाग निकली। उसने फोन से अपने पिता को संपर्क किया। रास्ते में एक स्थानीय कबाड़ी की मदद से वह सेक्टर 22 जाने वाले टेम्पो में बैठी। वहाँ उसे उसके भाई का दोस्त केतन कुमार मिला। पीड़िता का भाई केतन कुमार बेंगलुरु से हवाई जहाज द्वारा रात 1:00 बजे चंडीगढ़ पहुँचा और वे 15 फरवरी को अपने घर लौट आए। तबीयत खराब होने के कारण अतरौलिया सरकारी अस्पताल में इलाज कराने के बाद, पीड़िता ने थाना जलालपुर, जिला अंबेडकर नगर में प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई। जांच के बाद, पुलिस ने केवल अमित शहानी के खिलाफ आईपीसी की धारा 342, 366, 376 और 506 के तहत चार्जशीट दाखिल की।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता (पीड़िता) का पक्ष
पीड़िता ने निचली अदालत द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के आदेश को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि:
- निचली अदालत ने मामले के तथ्यों, परिस्थितियों और पीड़िता द्वारा दिए गए प्रत्यक्ष साक्ष्यों का सही परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकन नहीं किया।
- अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में कोई गंभीर या महत्वपूर्ण विरोधाभास नहीं था।
- पीड़िता और अन्य स्वतंत्र गवाहों की गवाही के माध्यम से अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को पूरी तरह साबित करने में सफल रहा था।
- ट्रायल कोर्ट का बरी करने का निर्णय त्रुटिपूर्ण (perverse) है, जिसे निरस्त किया जाना चाहिए।
प्रतिवादी और राज्य सरकार का पक्ष
मामले में राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व राज्य के अपर शासकीय अधिवक्ता (A.G.A.) ने किया। आरोपी ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 313 के तहत दर्ज कराए गए अपने बयान में सभी आरोपों से साफ इनकार किया और खुद को पूरी तरह निर्दोष बताया। बचाव पक्ष द्वारा पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के एक आदेश (CRWP-1139/2023) की फोटोकॉपी और आठ तस्वीरें प्रस्तुत की गईं, लेकिन निचली अदालत ने अपुष्ट होने के कारण इन्हें साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया था।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और न्यायिक सिद्धांत
आरोपी को बरी किए जाने के फैसले की वैधता की जांच के लिए हाईकोर्ट ने बलात्कार के मामलों में पीड़िता की बिना पुष्टि वाली एकल गवाही की विश्वसनीयता से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का विश्लेषण किया।
लागू कानूनी मानक
अदालत ने सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट के राधू बनाम मध्य प्रदेश राज्य, (2007) 12 SCC 57 मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था:
“6. अब यह स्थापित कानून है कि बलात्कार के मामले में दोषसिद्धि पीड़िता की बिना पुष्टि वाली गवाही (uncorroborated evidence) के आधार पर भी की जा सकती है। अपराध की प्रकृति ऐसी होती है कि प्रत्यक्ष पुष्टिकारक साक्ष्य मिलना कठिन होता है… यदि पीड़िता शपथ पर यह बयान देती है कि उसके साथ जबरन यौन संबंध बनाए गए, तो सामान्यतः उसके बयान को स्वीकार किया जाना चाहिए… जब तक कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों से यह संकेत न मिले कि इसमें सहमति थी या पूरी घटना ही असंभावित या काल्पनिक थी।”
हालांकि, अदालत ने राजू बनाम मध्य प्रदेश राज्य, (2008) 15 SCC 133 के फैसले को भी रेखांकित किया, जिसमें न्यायालय को सचेत किया गया था कि हालांकि पीड़िता के बयान को बहुत महत्व दिया जाना चाहिए, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि उसके बयान को बिना किसी जांच के अंतिम सत्य (gospel truth) मान लिया जाए। पीड़िता के बयान का मूल्यांकन भी एक घायल गवाह (injured witness) की तरह ही निष्पक्षता से किया जाना चाहिए।
गवाहों की गवाही और विरोधाभासों का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष के गवाहों की विश्वसनीयता का सिलसिलेवार विश्लेषण किया:
- PW-2 (सिकंदर, पीड़िता का भाई): अदालत ने पाया कि घटना के समय सिकंदर पुणे में था। उसकी गवाही पूरी तरह से उसके पिता और पीड़िता से मिली जानकारी पर आधारित थी, जो कानून की नजर में ‘अनुश्रुत साक्ष्य’ (hearsay evidence) है और इसका कोई कानूनी मूल्य नहीं है।
- PW-3 (सती प्रसाद): इस गवाह ने जांच अधिकारी को दिए अपने बयान से पलटते हुए अदालत में गवाही दी कि उसने सुना था कि पीड़िता अपनी मर्जी से गई थी। इस प्रकार, इस गवाह ने भी अभियोजन का समर्थन नहीं किया।
- PW-1 (पीड़िता): मुख्य गवाह होने के नाते पीड़िता के बयान का अदालत ने गहन विश्लेषण किया। अदालत ने पाया कि पीड़िता की गवाही में बड़े विरोधाभास थे। कार, ट्रेन और बस से कई राज्यों की लंबी यात्रा के बावजूद उसने कभी भी जनता के बीच शोर नहीं मचाया। अदालत ने टिप्पणी की:
“…वह किसी भी समय जनता का ध्यान आकर्षित करने के लिए चिल्लाई नहीं; उसने एक शब्द भी नहीं कहा।”
अदालत ने रेखांकित किया कि अकबरपुर रेलवे स्टेशन और दिल्ली से चंडीगढ़ के बीच एक सार्वजनिक ढाबे पर रुकने के बावजूद पीड़िता चुप रही। इसके अलावा, शोर मचाने का दावा उसने पहली बार जिरह (cross-examination) के दौरान किया, जबकि CrPC की धारा 164 के तहत दर्ज उसके बयान में इस बात का कोई उल्लेख नहीं था।
उम्र और सहमति का विश्लेषण
चिकित्सीय साक्ष्यों के अनुसार, डॉ. पी. एन. यादव (PW-9) ने एक्स-रे रिपोर्ट के आधार पर पीड़िता की उम्र 17 से 18 वर्ष के बीच आंकी थी। चिकित्सा विज्ञान के नियमों के अनुसार उम्र के निर्धारण में दो वर्ष के अंतर (variance) की गुंजाइश को देखते हुए अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि घटना के समय पीड़िता वयस्क (18 वर्ष से अधिक) थी।
खंडपीठ ने कहा कि पीड़िता का दोपहर के समय अपने माता-पिता को बिना बताए घर से जाना और उसके बाद का आचरण यह दर्शाता है कि उसका आरोपी के साथ पहले से संबंध था, न कि यह किसी अज्ञात व्यक्ति द्वारा किया गया अपहरण था।
मेडिकल पुष्टिकरण का अभाव
डॉ. सरिता प्रसाद (PW-4) द्वारा की गई चिकित्सकीय जांच में पीड़िता के निजी अंगों या शरीर पर कोई बाहरी चोट नहीं पाई गई। जांच अधिकारी संत कुमार सिंह (PW-7) ने भी अपने बयान में स्वीकार किया कि मेडिकल रिपोर्ट से बलात्कार के आरोप की पुष्टि नहीं हुई थी।
‘स्टर्लिंग विटनेस’ (अचूक गवाह) की कसौटी
पीड़िता की विश्वसनीयता का आकलन करते हुए हाईकोर्ट ने राय संदीप बनाम राज्य (NCT दिल्ली), (2012) 8 SCC 21 के ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया, जिससे “स्टर्लिंग विटनेस” को परिभाषित करते हुए कहा गया था:
“…ऐसा गवाह अत्यंत उच्च कोटि और क्षमता का होना चाहिए जिसका बयान पूरी तरह से अकाट्य हो। अदालत बिना किसी हिचकिचाहट के उसके बयान को उसके अंकित मूल्य पर स्वीकार करने की स्थिति में हो… ऐसे गवाह के बयानों में कोई टालमटोल या भटकाव नहीं होना चाहिए। वह किसी भी हद तक की जाने वाली तीखी जिरह का सामना करने में सक्षम होना चाहिए…”
खंडपीठ ने माना कि वर्तमान मामले में पीड़िता की गवाही इस कसौटी पर पूरी तरह विफल रही, क्योंकि घटना के तरीके और आरोपी की संलिप्तता को लेकर उसके बयानों में भारी विसंगतियां थीं।
न्यायालय का निर्णय
हाईकोर्ट ने माना कि आरोपी अमित शहानी को बरी करने का ट्रायल कोर्ट का निर्णय रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों के आधार पर एक संभावित, तार्किक और सुविचारित दृष्टिकोण था। निर्णय में किसी भी प्रकार की अवैधता, त्रुटि या विकृति न पाते हुए, खंडपीठ ने अपील को खारिज कर दिया। मामले में मुकदमे के खर्च (costs) को लेकर कोई आदेश जारी नहीं किया गया।
केस का विवरण
- केस शीर्षक: इन्फॉर्मेंट/कॉम्प्लेनेंट (विक्टिम X) बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
- केस नंबर: क्रिमिनल अपील U/S 372 Cr.P.C. No. 64 of 2026
- खंडपीठ: माननीय न्यायमूर्ति अब्दुल मोइन और माननीय न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव
- फैसले की तिथि: 21 मई 2026

