दिल्ली हाईकोर्ट ने एक किरायेदार द्वारा दायर नियमित प्रथम अपील (आरएफए) को खारिज कर दिया है, जिसमें निचली अदालत के उस फैसले और डिक्री को चुनौती दी गई थी जिसके तहत संपत्ति का कब्जा वापस करने, किराये के बकाये के भुगतान और मध्यवर्ती लाभ (Mesne Profits) देने का आदेश दिया गया था।
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की एकल पीठ ने फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 122 (जो पूर्ववर्ती भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 116 के समरूप है) के तहत, यदि किसी किरायेदार को मकान मालिक द्वारा किसी संपत्ति का कब्जा सौंपकर किरायेदार के रूप में रखा गया है, तो वह किरायेदार बाद में मकान मालिक के मालिकाना हक (Title) को चुनौती देने का कोई कानूनी अधिकार नहीं रखता।
मामले की पृष्ठभूमि
इस कानूनी विवाद की शुरुआत मोहम्मद अनीस (वादी/प्रत्यर्थी) द्वारा अपनी किरायेदार सुश्री यासमीन (प्रतिवादी/अपीलकर्ता) के खिलाफ दायर एक दीवानी मुकदमे (CS DJ No. 555/2019) से हुई थी। यह मुकदमा नई दिल्ली के दरियागंज स्थित बाजार दिल्ली गेट की संपत्ति संख्या 3286 की चौथी मंजिल पर स्थित 100 वर्ग गज के परिसर (तीन बेडरूम, एक बैठक, रसोई और बाथरूम) के कब्जे की बहाली, किराये के बकाये और कब्जे के हर्जाने के लिए दायर किया गया था।
वादी के अनुसार, सुश्री यासमीन को 1 अगस्त 2013 को 11 महीने की निश्चित अवधि के लिए 16,000 रुपये प्रति माह के किराये (बिजली और पानी के शुल्क को छोड़कर) पर इस संपत्ति में किरायेदार के रूप में रखा गया था। इसके समर्थन में 2 अगस्त 2013 को एक लीज डीड (किरायानामा) भी निष्पादित की गई। 1 जुलाई 2014 को लीज की अवधि समाप्त हो जाने के बाद भी किरायेदार ने संपत्ति खाली नहीं की। हालांकि, इसके बाद दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति से किराया बढ़ाकर 17,000 रुपये प्रति माह कर दिया गया था।
मकान मालिक का आरोप था कि किरायेदार ने किराये के भुगतान में अनियमितता बरती और 1 जुलाई 2016 से किराए का भुगतान नहीं किया, साथ ही बिजली का 38,880 रुपये का बिल भी बकाया रखा। इस पर मकान मालिक ने 20 फरवरी 2017 को एक कानूनी नोटिस भेजकर किरायेदारी समाप्त कर दी और संपत्ति का कब्जा वापस मांगा।
किरायेदार ने 2 मार्च 2017 को इस नोटिस का जवाब देते हुए मोहम्मद अनीस के मालिकाना हक से ही इनकार कर दिया और दावा किया कि उसने यह संपत्ति किसी मोहम्मद असद खान नामक व्यक्ति से खरीदी है। इस विवाद के बाद मोहम्मद अनीस ने अदालत का रुख किया। 19 मार्च 2026 को निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने मकान मालिक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए किरायेदार को कब्जा वापस करने, 16,000 रुपये प्रति माह की दर से किराये का बकाया चुकाने और 17,000 रुपये प्रति माह की दर से मध्यवर्ती लाभ (7% वार्षिक साधारण ब्याज के साथ) देने का आदेश दिया। किरायेदार ने इस डिक्री के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
दोनों पक्षों के मुख्य तर्क
अपीलकर्ता (किरायेदार सुश्री यासमीन) की दलीलें
अपीलकर्ता ने निचली अदालत के फैसले को मुख्य रूप से निम्नलिखित आधारों पर चुनौती दी:
- उनका दावा था कि 2 अगस्त 2013 की लीज डीड पूरी तरह से जाली और मनगढ़ंत है। मोहम्मद असद खान ने उनके हस्ताक्षर खाली कागजों पर लिए थे, जिनका बाद में दुरुपयोग किया गया। वैकल्पिक रूप से उन्होंने यह भी कहा कि बिजली कनेक्शन लगवाने के बहाने उनसे इन कागजात पर दस्तखत कराए गए थे।
- उनका तर्क था कि ट्रायल कोर्ट ने केवल हस्ताक्षरों को स्वीकार किए जाने को लीज डीड की सामग्री की स्वीकारोक्ति मानकर गलती की है। वादी ने इस डीड के दो स्वतंत्र गवाहों या नोटरी पब्लिक का परीक्षण अदालत में नहीं कराया।
- चूंकि मकान मालिक और किरायेदार का संबंध ही विवादित है, इसलिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 122 के तहत ‘विबंध’ (Estoppel) का सिद्धांत इस मामले में लागू नहीं किया जा सकता।
- मकान मालिक का मालिकाना हक (जो 1 जून 2013 के मौखिक दान और बाद में 27 दिसंबर 2018 को निष्पादित पंजीकृत गिफ्ट डीड पर आधारित था) साबित नहीं हुआ है, क्योंकि दानकर्ता वसीउद्दीन या गवाहों को अदालत में पेश नहीं किया गया।
- उनके पति मोहम्मद खलील ने मोहम्मद असद खान को बड़ी रकम दी थी और 26 मई 2015 को निष्पादित एक बंधकनामे (Mortgage Deed) के तहत यह संपत्ति उनके पति को सौंपी गई थी।
अपीलकर्ता ने यह साबित करने के लिए कि सबूत पेश करने का पूरा दायित्व वादी पर था, निम्नलिखित न्यायिक मिसालों का हवाला दिया:
- हरीश मनसुखानी बनाम अशोक जैन, 2009 (109) DRJ (DB)
- सुनील डांग बनाम आर.एल. गुप्ता, CS(OS) 1617/2007
- मेसर्स ज्ञान चंद एंड ब्रदर्स एंड अनदर बनाम रतन लाल उर्फ रतन सिंह, (2013) 2 S.C.R 601
प्रत्यर्थी (मकान मालिक मोहम्मद अनीस) की दलीलें
वादी/मकान मालिक ने अपने जवाब में इन तर्कों का खंडन करते हुए कहा कि:
- वह इस संपत्ति के वैध मालिक हैं। उनके पास पूर्व मालिक वसीउद्दीन (जो उनके रिश्तेदार और मित्र थे) द्वारा दिए गए मौखिक दान के मूल दस्तावेज हैं, जिसे बाद में 2018 में पंजीकृत गिफ्ट डीड के माध्यम से औपचारिक रूप दिया गया था।
- किरायेदार के पति और मोहम्मद असद खान के बीच 26 मई 2015 को निष्पादित कथित बंधकनामा विवादित संपत्ति से संबंधित नहीं है, बल्कि वह दरियागंज के छत्ता लाल मियन स्थित एक अन्य संपत्ति (संख्या 534, दूसरी मंजिल) से संबंधित है।
- इसके अलावा, कथित बंधकनामा अपंजीकृत और बिना स्टांप का होने के कारण कानून की नजर में पूरी तरह से अमान्य है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ
हाईकोर्ट ने अपने विश्लेषण में किरायेदार (प्रतिवादी गवाह – DW-1) के जिरह (Cross-examination) के दौरान दिए गए बयानों को बेहद महत्वपूर्ण माना। अदालत ने पाया कि सुश्री यासमीन ने जिरह के दौरान खुद ऐसी स्पष्ट स्वीकारोक्तियाँ की थीं, जिससे उनका पूरा बचाव ही खारिज हो गया।
अदालत ने किरायेदार के उस बयान को उद्धृत किया जिसमें उन्होंने स्वीकार किया था:
“यह सही है कि वादी ही विवादित संपत्ति का मकान मालिक और मालिक है… यह सही है कि विवादित संपत्ति का भौतिक कब्जा 01.06.2013 को वादी के पास था। (स्वेच्छा से कहा) वादी ने उक्त तिथि को मुझे विवादित संपत्ति का कब्जा सौंप दिया था… यह सही है कि वादी द्वारा मुझे 01.08.2013 को विवादित संपत्ति का कब्जा सौंपा गया था।”
इसके अलावा, किरायेदार ने यह भी माना था कि लीज डीड पर उनके ही हस्ताक्षर हैं और डीड के निष्पादन के समय उनके पति, एक प्रॉपर्टी डीलर और मोहम्मद असद खान भी वहां मौजूद थे।
किरायेदार द्वारा खाली कागज पर हस्ताक्षर लेने या धोखाधड़ी के विरोधाभासी दावों को खारिज करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:
“यह स्पष्ट है कि प्रतिवादी द्वारा लीज डीड पर अपने स्वीकार किए गए हस्ताक्षरों को स्पष्ट करने के लिए परस्पर विरोधी दलीलें दी गईं। इतना ही नहीं, उनकी उपरोक्त स्वीकारोक्ति स्पष्ट रूप से स्थापित करती है कि यह संपत्ति वादी से 11 महीने की अवधि के लिए किराये पर ली गई थी।”
किरायेदार के विबंध (Tenant Estoppel) के कानून पर स्पष्टता देते हुए न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने कहा:
“अपीलकर्ता, जिसे प्रत्यर्थी द्वारा किरायेदार के रूप में इस संपत्ति में प्रवेश कराया गया था, अपनी किरायेदार की स्थिति को चुनौती देने से कानूनी रूप से विबंधित (Estopped) है… विद्वान जिला न्यायाधीश ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 122 का बिल्कुल सही संदर्भ दिया है, जो यह प्रावधान करती है कि यदि किसी किरायेदार को मकान मालिक द्वारा संपत्ति का कब्जा दिया गया है, तो वह बाद में मकान मालिक के मालिकाना हक को चुनौती नहीं दे सकता।”
इसके अलावा, किरायेदार द्वारा पेश किए गए बंधकनामे (Mortgage Deed) के बचाव को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यह दस्तावेज विवादित संपत्ति के लिए पूरी तरह अप्रासंगिक था:
“सबसे पहली बात तो यह है कि उक्त दस्तावेज के सरसरी तौर पर देखने से ही पता चलता है कि वह संपत्ति संख्या 534, छत्ता लाल मियां, दरियागंज, नई दिल्ली के बिना छत के अधिकारों वाली दूसरी मंजिल (70 वर्ग गज) से संबंधित था, न कि इस विवादित संपत्ति से।”
अदालत ने आगे जोड़ा कि चूंकि यह बंधकनामा अपंजीकृत था, इसलिए यह संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 59 और पंजीकरण अधिनियम, 1908 की धारा 17 और 49 के तहत कानूनी रूप से साक्ष्य के रूप में स्वीकार किए जाने योग्य नहीं था।
न्यायालय का निर्णय
निचली अदालत के निष्कर्षों की पुष्टि करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि वादी और प्रतिवादी के बीच मकान मालिक-किरायेदार का संबंध पूरी तरह से साबित हो चुका है। अदालत ने आदेश दिया कि किरायेदार 1 जुलाई 2016 से 16 मार्च 2017 तक 16,000 रुपये प्रति माह की दर से किराये के बकाये और 17 मार्च 2017 से वास्तविक कब्जा सौंपने तक 17,000 रुपये प्रति माह की दर से मध्यवर्ती लाभ (Mesne Profits) का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी है। इस राशि पर 7% प्रति वर्ष की दर से साधारण ब्याज भी देय होगा।
अपील में कोई ठोस कानूनी आधार न पाते हुए, दिल्ली हाईकोर्ट ने इस नियमित प्रथम अपील (RFA) को सभी लंबित आवेदनों सहित खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
- मामले का शीर्षक: सुश्री यासमीन बनाम मोहम्मद अनीस (Ms. Yasmeen v. Mohd Anis)
- केस नंबर: RFA 511/2026, CM APPL. 33202/2026, CM APPL. 33203/2026, CM APPL. 33204/2026
- न्यायालय पीठ: न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा
- फैसले की तारीख: 23 मई, 2026

