तमिलनाडु चुनाव 2026: मद्रास हाईकोर्ट का बड़ा कदम, सीएम जोसेफ विजय और चुनाव आयोग को ‘भ्रष्ट आचरण’ और बच्चों के इस्तेमाल के आरोपों पर नोटिस

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के खत्म होने के बाद राज्य की राजनीति में एक बड़ा कानूनी मोड़ आ गया है। मद्रास हाईकोर्ट ने मुख्यमंत्री और ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ (TVK) के संस्थापक सी जोसेफ विजय को नोटिस जारी किया है। इसके साथ ही कोर्ट ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) और राज्य के अन्य शीर्ष राजनीतिक दिग्गजों से चुनाव के दौरान कथित तौर पर हुए ‘भ्रष्ट चुनावी आचरण’ पर जवाब तलब किया है।

यह नोटिस गुरुवार को हाईकोर्ट की अवकाशकालीन पीठ (Vacation Bench) के जस्टिस जी आर स्वामीनाथन और जस्टिस वी लक्ष्मीनारायणन ने जारी किया। अदालत कुड्डालोर जिले की एडवोकेट एल वासुकी द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि चुनाव आयोग को चुनाव प्रचार में बच्चों के अनुचित इस्तेमाल और बड़े पैमाने पर हुई वोट-रिश्वतखोरी के आरोपों की तत्काल और पारदर्शी जांच करने का निर्देश दिया जाए।

मामले के मुख्य बिंदु:

  • नोटिस पाने वाले पक्ष: टीवीके (TVK) संस्थापक और मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय, भारत निर्वाचन आयोग (ECI), तमिलनाडु के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO), डीएमके (DMK) अध्यक्ष एम के स्टालिन और एआईएडीएमके (AIADMK) महासचिव एडप्पादी के पलानीस्वामी।
  • कानूनी आधार: याचिका में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के उल्लंघन के साथ-साथ भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के हनन का आरोप लगाया गया है।
  • अगली सुनवाई: मद्रास हाईकोर्ट की अवकाशकालीन पीठ इस मामले पर अगली सुनवाई 29 मई 2026 को करेगी।
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चुनावी फायदे के लिए बच्चों को ‘भावनात्मक हथियार’ बनाने का आरोप

एडवोकेट वासुकी की याचिका में टीवीके अध्यक्ष द्वारा 21 अप्रैल 2026 को चेन्नई के वाईएमसीए मैदान में आयोजित एक विशाल जनसभा के दौरान दिए गए चुनावी भाषण को मुख्य आधार बनाया गया है।

आरोप है कि मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने अपने भाषण में खुले तौर पर बच्चों से अपील की थी कि वे अपने माता-पिता पर एक खास पार्टी के पक्ष में मतदान करने के लिए भावनात्मक दबाव या मानसिक आग्रह का प्रयोग करें।

यह भाषण मुख्यधारा के मीडिया सहित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर काफी वायरल हुआ और इस पर तीखी बहस छिड़ गई। याचिकाकर्ता का दावा है कि इस भाषण के बाद इंटरनेट पर कई ऐसे वीडियो और सामग्रियां सामने आईं, जिनमें बच्चे अपने माता-पिता को मतदान के विकल्पों को लेकर भावनात्मक रूप से प्रभावित करते नजर आए।

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याचिका के अनुसार, यह कृत्य जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123 के तहत आता है, जो लोकतांत्रिक चुनावी प्रक्रिया में मतदाताओं पर ‘अनुचित प्रभाव’ (undue influence) डालने को एक भ्रष्ट आचरण मानती है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इस गंभीर मामले पर चुनाव आयोग और मुख्य निर्वाचन अधिकारी को तुरंत संज्ञान लेना चाहिए था, जो कि नहीं लिया गया।

‘कैश-फॉर-वोट’ और मतदाता रिश्वतखोरी के आरोप

याचिका में केवल बच्चों के इस्तेमाल का ही नहीं, बल्कि राज्य के कई हिस्सों में वोट के बदले पैसे बांटने के गंभीर मामलों का भी जिक्र किया गया है।

याचिका में विशेष रूप से मायलापुर, अलंगुलम और थिरुमंगलम जैसे हाई-प्रोफाइल विधानसभा क्षेत्रों का उल्लेख किया गया है, जहां मतदाताओं को कथित तौर पर पैसे बांटने की शिकायतें और मीडिया रिपोर्ट्स सामने आई थीं। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि कुछ इलाकों में पैसे के असमान वितरण को लेकर स्थानीय लोगों द्वारा विरोध प्रदर्शन भी किए गए थे।

एडवोकेट वासुकी ने दलील दी कि इन धांधलियों के पर्याप्त वीडियो साक्ष्य, सोशल मीडिया सामग्री और डिजिटल सबूत पहले से ही सार्वजनिक डोमेन में मौजूद हैं, इसलिए चुनाव आयोग और मुख्य निर्वाचन अधिकारी इन घटनाक्रमों से अनभिज्ञता का दावा नहीं कर सकते।

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चुनाव प्रहरियों की ‘निष्क्रियता’ पर खड़े हुए संवैधानिक सवाल

याचिका में भारत निर्वाचन आयोग (ECI) और तमिलनाडु के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता का आरोप है कि इतने गंभीर मुद्दों के बावजूद चुनाव संस्थाओं की ओर से कोई प्रभावी या पारदर्शी जांच शुरू नहीं की गई।

दलील दी गई है कि चुनावी निष्पक्षता को प्रभावित करने वाले इन संवेदनशील आरोपों पर चुनाव प्रहरियों की “निष्क्रियता” सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत नागरिकों को मिलने वाले मौलिक अधिकारों का हनन करती है। साथ ही, यह भारतीय संविधान के ‘बुनियादी ढांचा सिद्धांत’ (basic structure doctrine) को भी कमजोर करती है।

मद्रास हाईकोर्ट के इस हस्तक्षेप के बाद, अब सभी की निगाहें 29 मई को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां चुनाव आयोग और विपक्षी दलों सहित मुख्यमंत्री को अपना रुख स्पष्ट करना होगा।

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