कोर्ट की अनुमति के बिना पुलिस नहीं कर सकती अग्रिम जांच; एक ही एफआईआर में दोबारा संज्ञान लेना गैरकानूनी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ पीठ) ने आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 और 201 के तहत दायर पूरक चार्जशीट और उसके बाद जारी संज्ञान आदेश को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोर्ट की पूर्व अनुमति के बिना केवल पुलिस अधीक्षक (SP) के प्रशासनिक निर्देशों पर की गई अग्रिम जांच गैरकानूनी और स्थापित कानूनी सिद्धांतों के विरुद्ध है। इसके अतिरिक्त, अदालत ने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट एक ही अपराध संख्या (केस क्राइम नंबर) के तहत दो बार संज्ञान नहीं ले सकते। नतीजतन, हाईकोर्ट ने आवेदन को स्वीकार करते हुए डिस्चार्ज अर्जी खारिज करने के निचली अदालत के आदेश को निरस्त कर दिया और बाद की सभी कार्यवाहियों को रद्द कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला जिला अंबेडकर नगर के थाना मालीपुर में दर्ज एफआईआर संख्या 0139/2021 से जुड़ा है, जो शुरुआत में आईपीसी की धारा 379 और 328 के तहत दर्ज की गई थी। प्रारंभिक जांच के बाद, एक सह-आरोपी के खिलाफ धारा 379, 411, 413, और 120B/34 के तहत चार्जशीट दाखिल की गई थी, जबकि अन्य आरोपियों के खिलाफ धारा 379, 328, 411, 302, 201, 120-B, और 34 के तहत चार्जशीट दायर की गई थी।

आवेदक सैयद मोहम्मद हमजा एफआईआर में नामजद नहीं था और उसके खिलाफ प्रारंभिक चार्जशीट में धारा 302 के तहत आरोप नहीं थे। मजिस्ट्रेट ने 24 दिसंबर 2021 को मामले का पहला संज्ञान लिया। लेकिन इस बीच, 14 अप्रैल 2022 को पुलिस अधीक्षक, अंबेडकर नगर ने जांच अधिकारी को अग्रिम जांच (फर्दर इन्वेस्टिगेशन) के निर्देश दिए। इस प्रशासनिक निर्देश के बाद 29 अप्रैल 2023 को एक पूरक चार्जशीट (संख्या 149-A/2021) दाखिल की गई, जिसमें आवेदक पर धारा 302 और 201 के तहत आरोप लगाए गए। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, अंबेडकर नगर ने इस बाद की चार्जशीट के आधार पर 3 फरवरी 2026 को दूसरी बार संज्ञान लिया।

आवेदक ने इन मुद्दों को उठाते हुए निचली अदालत में डिस्चार्ज अर्जी दाखिल की, जिसे अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (कोर्ट नंबर 1, अंबेडकर नगर) ने 13 फरवरी 2026 को खारिज कर दिया। इसके बाद, ट्रायल कोर्ट ने 26 फरवरी 2026 को आवेदक के खिलाफ आरोप तय करने की प्रक्रिया शुरू की। इन कार्यवाहियों से व्यथित होकर आवेदक ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

पक्षों की दलीलें

आवेदक के वकील की दलीलें

आवेदक के विद्वान वकील ने दलील दी कि पुलिस संबंधित ट्रायल कोर्ट की स्पष्ट अनुमति के बिना अग्रिम जांच की कार्रवाई शुरू नहीं कर सकती थी। यह प्रस्तुत किया गया कि केवल पुलिस अधीक्षक के आदेश पर की गई जांच पूरी तरह से त्रुटिपूर्ण और कानूनी रूप से अमान्य थी।

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अपनी दलीलों के समर्थन में, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रमोद कुमार और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026 SCC OnLine SC 156) मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया, विशेष रूप से इसके पैराग्राफ 33 को रेखांकित किया:

“इन निर्णयों के माध्यम से इस न्यायालय द्वारा स्थापित कानूनी स्थिति के आलोक में, यह कहना सुरक्षित है कि किसी मामले में अग्रिम जांच का निर्देश देने की शक्ति पूरी तरह से संबंधित मजिस्ट्रेट/अदालत के विवेक पर निर्भर करती है। यदि पुलिस/जांच एजेंसी की यह राय है कि मामले के पूर्ण तथ्यों और सच्चाई को सामने लाने के लिए किसी विशेष मामले में अग्रिम जांच आवश्यक है, तो उनके लिए यह अनिवार्य है कि वे मजिस्ट्रेट/अदालत के समक्ष एक उचित आवेदन दायर करें, न कि स्वयं अग्रिम जांच का आदेश जारी करें। एक बार जब जांच एजेंसी द्वारा ऐसा आवेदन दायर कर दिया जाता है, तो मजिस्ट्रेट/अदालत मामले के तथ्यों और परिस्थितियों तथा जांच एजेंसी द्वारा दिखाए गए कारणों के आलोक में अपने न्यायिक विवेक का प्रयोग करेगी, ताकि यह निर्णय लिया जा सके कि CrPC की धारा 173(8) के दायरे में अग्रिम जांच का आदेश दिया जाना चाहिए या नहीं।”

इसके अलावा, वकील ने तर्क दिया कि एक ही केस क्राइम नंबर के तहत मजिस्ट्रेट द्वारा 3 फरवरी 2026 को दूसरी बार संज्ञान लिया जाना कानूनन अनुमेय नहीं था। उन्होंने यह भी कहा कि निचली अदालत ने अपना न्यायिक विवेक लागू नहीं किया और डिस्चार्ज अर्जी खारिज करते समय आवेदक द्वारा उठाए गए तथ्यों और कानूनी सवालों की पूरी तरह अनदेखी की।

राज्य के वकील की दलीलें

राज्य के विद्वान वकील ने आवेदक की दलीलों का विरोध किया। हालांकि, वह यह साबित करने में विफल रहे कि अग्रिम जांच शुरू करने के लिए ट्रायल कोर्ट से कोई पूर्व अनुमति या आदेश लिया गया था। राज्य के वकील ने इस तथ्यात्मक स्थिति को स्वीकार किया कि अग्रिम जांच पूरी तरह से पुलिस अधीक्षक द्वारा जारी निर्देश के आधार पर की गई थी।

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कोर्ट का विश्लेषण

एकल-सदस्यीय पीठ के जस्टिस श्री प्रकाश सिंह ने रिकॉर्ड की जांच की और पाया कि आवेदक प्रारंभिक एफआईआर में नामजद नहीं था और पुलिस अधीक्षक, अंबेडकर नगर के प्रशासनिक आदेशों के तहत ही बाद की जांच की गई थी।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि अग्रिम जांच के संबंध में कानूनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट है:

“यह स्थापित कानून है कि अग्रिम जांच तभी की जा सकती है जब संबंधित ट्रायल कोर्ट द्वारा पूर्व अनुमति प्रदान की गई हो।”

कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि जब अग्रिम जांच के लिए आवेदन किया जाता है, तो मजिस्ट्रेट या ट्रायल कोर्ट को अपने विवेक का उपयोग करना चाहिए और कारण दर्ज करने चाहिए। प्रमोद कुमार (पूर्ववर्णित) मामले में निर्धारित कानून की पुष्टि करते हुए कोर्ट ने कहा:

“…अग्रिम जांच की प्रक्रिया शुरू करते समय ट्रायल कोर्ट की पूर्व अनुमति अनिवार्य है, और उस अनुमति में ट्रायल कोर्ट द्वारा अग्रिम जांच का निर्देश देने के कारणों का दर्ज होना आवश्यक है।”

दोहरे संज्ञान के मुद्दे पर कोर्ट ने संज्ञान लिया कि जब मुकदमा पहले से ही गति में था और आरोप तय किए जा रहे थे, तब एक पूरक चार्जशीट दाखिल की गई और मजिस्ट्रेट ने दोबारा संज्ञान लिया और मामले को सत्र न्यायालय में सुपुर्द कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा:

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“यह अदालत पाती है कि एक केस क्राइम नंबर के लिए मजिस्ट्रेट/ट्रायल कोर्ट द्वारा दो बार संज्ञान नहीं लिया जा सकता है। जहां तक वर्तमान मामले का संबंध है, संज्ञान दो बार लिया गया है, वह भी मुकदमे की कार्यवाही के दौरान, जो कानून के विपरीत है।”

डिस्चार्ज अर्जी पर पारित आदेश की समीक्षा करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने आवेदक द्वारा उठाए गए किसी भी कानूनी सवाल या अवैधता पर विचार नहीं किया। कोर्ट ने पाया कि उसमें “डिस्चार्ज के आवेदन में की गई अवैधता और लिए गए आधारों के संबंध में एक भी शब्द नहीं कहा गया था।” कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि डिस्चार्ज अर्जी पर आदेश बिना न्यायिक दिमाग का इस्तेमाल किए पारित किया गया था।

कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी द्वारा पेश की गई पूरक चार्जशीट दिनांक 29 अप्रैल 2023 और संज्ञान आदेश दिनांक 3 फरवरी 2026 को गैरकानूनी और त्रुटिपूर्ण पाया। तदनुसार, कोर्ट ने बाद की चार्जशीट और दूसरे संज्ञान आदेश को रद्द कर दिया।

इसके साथ ही, कोर्ट ने निचली अदालत के 13 फरवरी 2026 के उस आदेश को भी रद्द कर दिया जिसके तहत आवेदक की डिस्चार्ज अर्जी खारिज की गई थी। धारा 482 के तहत दायर अर्जी को स्वीकार कर लिया गया, हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट और जांच अधिकारी के लिए कानून के अनुसार आगे बढ़ने का विकल्प खुला है।

मामले का विवरण

  • मामले का शीर्षक: सैयद मोहम्मद हमजा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
  • मामला संख्या: धारा 482 के तहत आवेदन संख्या 2026 का 3474
  • पीठ: जस्टिस श्री प्रकाश सिंह
  • दिनांक: 15 मई, 2026

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