अपंजीकृत गिफ्ट डीड संपत्ति विवादों में अधिकार या मालिकाना हक का आधार नहीं बन सकती: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 100 के तहत दायर एक दूसरी नियमित अपील (Second Regular Appeal) को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि एक गैर-पंजीकृत गिफ्ट डीड (unregistered gift deed) किसी भी संपत्ति में कोई अधिकार, मालिकाना हक (title) या हित पैदा नहीं कर सकती है। जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने निचली अदालतों के सर्वसम्मत फैसलों को बरकरार रखते हुए कहा कि अपीलकर्ता संपत्ति पर अपना कब्जा या मालिकाना हक साबित करने में विफल रही और इस मामले में कानून का कोई ठोस सवाल (substantial question of law) शामिल नहीं था।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता सूरज मुखी ने अपने देवरों—कप्तान सिंह, हरि प्रकाश और रामे के खिलाफ स्थायी और अनिवार्य निषेधाज्ञा (permanent and mandatory injunction) की मांग करते हुए एक दीवानी मुकदमा (सिविल सूट संख्या 297/2018) दायर किया था।

याचिका के अनुसार, सूरज मुखी ने दावा किया कि वह दिल्ली के बिजवासन गांव की लाल डोरा आबादी में खसरा नंबर 141 के अंतर्गत आने वाले 50 वर्ग गज के एक निर्मित मकान (सूट प्रॉपर्टी) की मालकिन हैं और उस पर उनका कब्जा है। उनके दिवंगत पति विजय सिंह राणा प्रतिवादियों के सगे भाई थे।

उनका दावा था कि यह संपत्ति उनके ससुर स्वर्गीय श्री भरतू सिंह ने 20 अगस्त 1986 को निष्पादित जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (GPA), गिफ्ट डीड, हलफनामे और वसीयत के माध्यम से उन्हें और उनके दिवंगत पति को उपहार में दी थी। भरतू सिंह का निधन 1 जुलाई 1989 को और उनके पति का निधन 12 सितंबर 2000 को हुआ था।

अपीलकर्ता ने कहा कि भरतू सिंह ने अपने जीवनकाल में ही एक पारिवारिक समझौते के माध्यम से अपनी सभी संपत्तियों का बंटवारा कर दिया था, जिसके बाद उनके भाई अलग रहने लगे थे। अपीलकर्ता के अनुसार, जब वह 18 अक्टूबर 2018 को संपत्ति पर गईं, तो प्रतिवादियों ने वहां आकर मालिकाना हक का दावा किया और उनके साथ झगड़ा किया। इस संबंध में पुलिस को भी सूचित किया गया, लेकिन पुलिस ने इसे दीवानी विवाद बताते हुए उन्हें सिविल कोर्ट जाने की सलाह दी। इसके बाद 22 अक्टूबर 2018 को फिर से विवाद हुआ और उन्हें बेदखल करने की धमकी दी गई। प्रतिवादियों द्वारा ढहाई गई दीवार का पुनर्निर्माण करने से इनकार करने के बाद, अपीलकर्ता ने निषेधाज्ञा के लिए अदालत का रुख किया।

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पक्षकारों की दलीलें

प्रतिवादियों का पक्ष: प्रतिवादियों ने लिखित बयान दाखिल कर स्पष्ट किया कि अपीलकर्ता न तो संपत्ति की मालकिन हैं और न ही उस पर उनका कोई कब्जा है। उन्होंने आरोप लगाया कि अपीलकर्ता ने नकली और मनगढ़ंत दस्तावेज तैयार किए हैं।

तथ्यों के आधार पर प्रतिवादियों ने दलील दी कि कई साल पहले एक पारिवारिक समझौते में यह संपत्ति उनके पिता के हिस्से में आई थी और वे अपने जन्म से ही इस पर काबिज हैं। उन्होंने तर्क दिया कि अपीलकर्ता का साइट प्लान गलत है और संपत्ति को सही ढंग से परिभाषित नहीं किया गया है। उनके अनुसार, संपत्ति केवल एक जर्जर कमरा है जिसमें कोई शौचालय, स्नानघर या रसोई घर नहीं है, और वे इसका उपयोग मवेशियों का चारा तथा घरेलू सामान रखने के लिए करते हैं। उन्होंने इस बात से पूरी तरह इनकार किया कि भरतू सिंह ने कभी भी यह संपत्ति अपीलकर्ता या उनके दिवंगत पति को उपहार में दी थी।

प्रस्तुत किए गए साक्ष्य: अपीलकर्ता ने खुद को गवाह PW1 के रूप में पेश किया और साइट प्लान, जीपीए, गिफ्ट डीड, वसीयत और अन्य दस्तावेजों (Ex. PW1/A से PW1/J) को प्रदर्शित किया। उन्होंने गवाह PW2 दिनेश सेजवाल का भी परीक्षण कराया, जिन्होंने 22 अगस्त 1986 के जीपीए, गिफ्ट डीड और वसीयत पर अपने पिता के हस्ताक्षरों की पहचान की।

दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने प्रतिवादी संख्या 1 कप्तान सिंह को DW1 के रूप में परीक्षित कराया। उन्होंने नोटरी सेल के अधिकारियों (DW2 और DW3) को भी गवाह के रूप में बुलाया। DW2 ने गवाही दी कि नोटरी के रूप में एम.एल. सूद नाम का कोई व्यक्ति नामांकित नहीं था। हालांकि, DW3 ने रिकॉर्ड पेश करते हुए दिखाया कि मोहन लाल सूद को 20 जनवरी 1977 से 19 जनवरी 1992 तक की अवधि के लिए लाइसेंस जारी किया गया था और नोटरी रजिस्टर में उनका रिकॉर्ड मौजूद था।

निचली अदालतों के निष्कर्ष

सिविल जज ने 30 नवंबर 2022 को इस मुकदमे को खारिज कर दिया था। ट्रायल कोर्ट ने माना कि अपीलकर्ता द्वारा पेश किए गए जीपीए, गिफ्ट डीड, हलफनामा और वसीयत अपंजीकृत थे, इसलिए वे संपत्ति का मालिकाना हक स्थानांतरित करने में अप्रभावी हैं। अदालत ने यह भी निष्कर्ष निकाला कि संपत्ति पर अपीलकर्ता के कब्जे को साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं था, क्योंकि उन्होंने केवल 1992 का एक 26 साल पुराना बिजली बिल पेश किया था।

इसके अलावा, ट्रायल कोर्ट ने कहा कि मालिकाना हक पर संशय (cloud) होने के बावजूद अपीलकर्ता ने घोषणा (declaration) की मांग नहीं की थी और वह यह साबित करने में भी विफल रहीं कि दीवार को प्रतिवादियों द्वारा गिराया गया था।

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प्रथम अपीलीय अदालत (ADJ) ने भी सिविल जज के इन निष्कर्षों पर सहमति व्यक्त की और 9 दिसंबर 2025 को अपील को खारिज कर दिया।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

अपीलकर्ता ने अपनी चुनौती के आधार में तर्क दिया था कि भले ही गिफ्ट डीड अपंजीकृत थी, लेकिन पंजीकरण अधिनियम की धारा 49 के प्रावधान के तहत इसका उपयोग समवर्ती/सहायोगी उद्देश्यों (collateral purposes) के लिए किया जा सकता था। इसके लिए उन्होंने बलराम सिंह बनाम केलो देवी (2022) के फैसले पर भरोसा जताया। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने निषेधाज्ञा के मुकदमे में मालिकाना हक का मुद्दा तय करके गलती की है, जिसके लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले अनातुला सुधाकर बनाम बुची रेड्डी (AIR 2008 SC 2033) का हवाला दिया।

अपीलकर्ता के इन तर्कों को खारिज करते हुए जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने कहा:

“विद्वान सिविल जज ने सही अवलोकन किया था कि एक अपंजीकृत गिफ्ट डीड वादी के पक्ष में कोई अधिकार, मालिकाना हक या हित नहीं बना सकती है।”

हाईकोर्ट ने उल्लेख किया कि अपीलकर्ता द्वारा प्रस्तुत वसीयत (Ex. PW1/E) के संबंध में:

“इसे साक्ष्य अधिनियम की धारा 68 के अनुसार साबित नहीं किया गया था, और इसलिए इसे साक्ष्य में नहीं माना जा सकता था।”

संपत्ति के मालिकाना हक पर विवाद होने की स्थिति में घोषणा (declaration) की आवश्यकता पर हाईकोर्ट ने अनातुला सुधाकर के सिद्धांत को लागू करने के निचली अदालत के निर्णय को सही ठहराया:

“विद्वान सिविल जज ने अनातुला सुधाकर (उपरोक्त) पर भी सही भरोसा किया कि जब किसी व्यक्ति के मालिकाना हक पर संशय हो, तो कोई भी निषेधाज्ञा तब तक नहीं दी जा सकती, जब तक कि वह व्यक्ति मालिकाना हक के संबंध में घोषणा की मांग न करे। वादी का कब्जा सुरक्षित रखने का दावा मालिकाना हक पर आधारित था, जो साबित नहीं हुआ।”

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भौतिक कब्जे के मुद्दे पर, हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के इस निष्कर्ष का समर्थन किया कि अपीलकर्ता वास्तविक कब्जे को साबित करने में विफल रही हैं। कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता ने जिरह के दौरान खुद स्वीकार किया था कि उनका साइट प्लान गलत था। इसके अलावा वह प्रतिवादियों के इस सबूत का खंडन नहीं कर सकीं कि संपत्ति बिना बुनियादी सुविधाओं वाला एक जर्जर कमरा है जिसका उपयोग चारा रखने के लिए किया जाता है।

दीवार के पुनर्निर्माण के संबंध में अनिवार्य निषेधाज्ञा की मांग पर हाईकोर्ट ने कहा:

“प्रतिवादियों द्वारा दीवार को ढहाए जाने का कोई भी सबूत वादी द्वारा पेश नहीं किए जाने के कारण दीवार के पुनर्निर्माण के निर्देश देने की मांग वाली अनिवार्य निषेधाज्ञा को खारिज कर दिया गया था। इसके अतिरिक्त, एक बार जब कब्जा ही स्थापित नहीं हुआ, तो सूट प्रॉपर्टी में दीवार को गिराने या उसके पुनर्निर्माण का सवाल ही नहीं उठता था।”

अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि दोनों निचली अदालतों ने तथ्यों के आधार पर यह सर्वसम्मत निष्कर्ष दिया है कि अपीलकर्ता के पास न तो मालिकाना हक के दस्तावेज हैं और न ही संपत्ति पर कब्जा है। हाईकोर्ट ने सीपीसी की धारा 100 के तहत अदालत के सीमित क्षेत्राधिकार को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया:

“दोनों अदालतों ने तथ्यों के आधार पर यह निष्कर्ष दर्ज किया है कि वादी के पास सूट प्रॉपर्टी का न तो कोई मालिकाना हक, दस्तावेज है और न ही कब्जा है। वास्तव में, चुनौती केवल तथ्यों के निष्कर्षों पर दी गई है, जो इस दूसरी नियमित अपील के दायरे से बाहर है।”

अदालत ने कहा कि इस अपील में कानून का कोई ठोस सवाल नहीं उठाया गया है। चूंकि दूसरी अपील में कोई योग्यता नहीं थी, इसलिए इसे लंबित आवेदनों सहित खारिज कर दिया गया।

मामले का विवरण

  • केस का शीर्षक: सूरज मुखी बनाम कप्तान सिंह व अन्य
  • केस संख्या: RSA 56/2026, CM APPL. 19173/2026 (न्यूट्रल साइटेशन: 2026:DHC:4419)
  • पीठ: जस्टिस नीना बंसल कृष्णा
  • फैसले की तारीख: 18 मई, 2026

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