इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्य मुकुंदानंद ब्रह्मचारी के विरुद्ध दायर अवमानना याचिका को खारिज कर दिया है। शुक्रवार को हुई सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति दिनेश पाठक की पीठ ने स्पष्ट किया कि जमानत की शर्तों के कथित उल्लंघन के मामले में अवमानना की कार्रवाई के बजाय उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।
अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि यदि याचिकाकर्ता को लगता है कि आरोपी पक्ष की ओर से अग्रिम जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया जा रहा है, तो उन्हें अवमानना याचिका के स्थान पर ‘जमानत निरस्त’ (Cancellation of Bail) करने की अर्जी दाखिल करनी चाहिए।
न्यायमूर्ति दिनेश पाठक ने आदेश में टिप्पणी की, “यदि प्रतिवादी जमानत की शर्तों का उल्लंघन कर रहे हैं, तो आवेदक अदालत द्वारा दी गई अग्रिम जमानत को रद्द करने के लिए आवेदन कर सकता है।”
यह याचिका आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज द्वारा दायर की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने उच्च न्यायालय के उन आदेशों की जानबूझकर अवहेलना की है, जो उन्हें अग्रिम जमानत देते समय लागू किए गए थे। उल्लेखनीय है कि यह मामला प्रयागराज में दर्ज एक पॉक्सो (POCSO) मामले से जुड़ा है, जिसमें स्वामी को पहले अग्रिम जमानत मिल चुकी है।
याचिकाकर्ता का दावा था कि जमानत मिलने के बावजूद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद लगातार बैठकें आयोजित कर रहे हैं और सार्वजनिक बयान दे रहे हैं, जो सीधे तौर पर अदालती पाबंदियों का उल्लंघन है। इसी आधार पर उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की मांग की गई थी।
इस मामले की कानूनी प्रक्रिया में पहले एक बदलाव भी देखा गया। शुरुआत में इस याचिका पर सुनवाई न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल की बेंच में होनी थी, लेकिन उन्होंने इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग (Recuse) कर लिया था। इसके बाद मुख्य न्यायाधीश ने मामले को न्यायमूर्ति दिनेश पाठक की पीठ के समक्ष नामित किया, जिन्होंने अब इस पर अपना फैसला सुनाया है।
अदालत के इस फैसले से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को फिलहाल बड़ी राहत मिली है, हालांकि याचिकाकर्ता के पास अब जमानत रद्द करने की मांग के साथ पुनः अदालत का दरवाजा खटखटाने का विकल्प खुला है।

