तमिलनाडु की राजनीति में एक अहम कानूनी मोड़ पर, सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मद्रास हाई कोर्ट के उस अंतरिम आदेश पर रोक लगा दी है, जिसने ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ (TVK) के विधायक आर. श्रीनिवासा सेतुपति को विधानसभा की महत्वपूर्ण कार्यवाहियों में हिस्सा लेने से रोक दिया था। शीर्ष अदालत की इस दखल के बाद सेतुपति अब सदन में होने वाले किसी भी फ्लोर टेस्ट या विश्वास मत में पूरी तरह शामिल हो सकेंगे।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए मद्रास हाई कोर्ट की प्रक्रिया पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने हाई कोर्ट के रुख को ‘अत्याचारी’ (atrocious) करार दिया।
पीठ ने टिप्पणी की कि जब हाई कोर्ट खुद इस बात को स्वीकार कर रहा है कि चुनाव से जुड़े विवादों के लिए ‘चुनाव याचिका’ (Election Petition) ही उचित कानूनी उपाय है, तो उसने अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका पर सुनवाई क्यों की? सुप्रीम कोर्ट ने न केवल विधायक पर लगी पाबंदियों को हटाया, बल्कि हाई कोर्ट में इस मामले से जुड़ी अन्य सभी लंबित कार्यवाहियों पर भी रोक लगा दी है।
यह पूरा मामला शिवगंगा जिले की तिरुपत्तूर (नंबर 185) विधानसभा सीट से जुड़ा है। यहां टीवीके के सेतुपति ने बेहद कड़े मुकाबले में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के नेता और पूर्व मंत्री के.आर. पेरियाकरुप्पन को सिर्फ एक वोट के अंतर से हराया था।
इस करीबी हार को पेरियाकरुप्पन ने अदालत में चुनौती दी थी, जिसके बाद हाई कोर्ट ने सेतुपति के अधिकारों को सीमित करते हुए उन्हें निम्नलिखित कार्यों से रोक दिया था:
- विधानसभा में मतदान करना या फ्लोर टेस्ट में शामिल होना।
- अविश्वास प्रस्ताव या विश्वास मत की प्रक्रिया का हिस्सा बनना।
- ऐसी किसी भी कार्यवाही में शामिल होना जहाँ सदन की संख्या बल का परीक्षण हो।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब राज्य की राजनीति में काफी हलचल है। बुधवार को ही सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली टीवीके सरकार ने विधानसभा में विश्वास मत जीता है।
सुप्रीम कोर्ट ने अब के.आर. पेरियाकरुप्पन और अन्य प्रतिवादियों को सेतुपति की याचिका पर जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। फिलहाल के लिए, शीर्ष अदालत के इस फैसले ने तिरुपत्तूर के विधायक की विधायी शक्तियों को सुरक्षित कर लिया है।

