सुप्रीम कोर्ट ने ‘स्पिरिचुअल रीजनरेशन मूवमेंट फाउंडेशन ऑफ इंडिया’ (Spiritual Regeneration Movement Foundation of India) की जमीनों की कथित अवैध और धोखाधड़ीपूर्ण बिक्री की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) गठित करने का निर्देश दिया है। यह सोसायटी महर्षि महेश योगी द्वारा स्थापित की गई थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस अंतरिम आदेश को चुनौती देने वाली अपील पर सुनवाई करते हुए, जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने चार्जशीट दाखिल करने पर लगी रोक को हटा दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह के “ब्लैंकेट ऑर्डर” (blanket orders) जांच एजेंसियों की वैधानिक शक्तियों में बाधा डालते हैं।
इस मामले में मुख्य कानूनी सवाल इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा पारित उस अंतरिम आदेश की वैधता पर था, जिसमें पुलिस को जांच जारी रखने की अनुमति तो दी गई थी, लेकिन भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 193(3) के तहत पुलिस रिपोर्ट (चार्जशीट) जमा करने से रोक दिया गया था। मामले के शिकायतकर्ता ने इस रोक को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए जांच अधिकारी को जांच पूरी कर रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया। संगठित भूमि घोटालों की गंभीरता को देखते हुए, कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को एक SIT गठित करने का आदेश दिया, जिसमें रजिस्ट्रार ऑफ सोसाइटीज को भी सदस्य बनाया जाएगा ताकि विभिन्न राज्यों में सोसायटी की जमीनों के लेन-देन की समग्र जांच की जा सके।
मामले की पृष्ठभूमि
‘स्पिरिचुअल रीजनरेशन मूवमेंट फाउंडेशन ऑफ इंडिया’ की स्थापना 1963 में हुई थी और देश के विभिन्न हिस्सों में इसकी काफी फ्रीहोल्ड संपत्तियां हैं। संस्थापक महर्षि महेश योगी के निधन के बाद, प्रबंधन को लेकर दो समूहों के बीच विवाद शुरू हो गया। इसमें एक पक्ष अजय प्रकाश श्रीवास्तव का है और दूसरा पक्ष जी. राम चंद्रमोहन का है।
कोर्ट ने इस मामले से जुड़े कई मुकदमों का उल्लेख किया, जिनमें शामिल हैं:
- दीवानी मुकदमे: छत्तीसगढ़ (तखतपुर) और दिल्ली (साकेत कोर्ट) में अवैध बिक्री विलेखों (sale deeds) के खिलाफ स्टे और डिक्लेरेशन सूट।
- विभिन्न FIR: छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश (नोएडा) में धोखाधड़ी और जालसाजी (IPC की धारा 420, 467, 468, 471 और 120B) के तहत दर्ज कई मामले।
मौजूदा मामला नोएडा सेक्टर 39 थाने में दर्ज FIR नंबर 642/2025 से संबंधित है। आरोप है कि जी. राम चंद्रमोहन और अन्य ने जाली दस्तावेजों के आधार पर ‘मैसर्स सिंहवाहिनी इंफ्राप्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड’ को सोसायटी की जमीन बेची। इस कंपनी के एक निदेशक (प्रतिवादी नंबर 2) ने हाईकोर्ट में FIR रद्द करने की याचिका दायर की थी, जिस पर हाईकोर्ट ने चार्जशीट दाखिल करने पर रोक लगा दी थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता (शिकायतकर्ता) की दलील थी कि कोर्ट के आदेशों और कई लंबित FIR के बावजूद, अनधिकृत व्यक्ति जाली दस्तावेजों के आधार पर बार-बार सोसायटी की जमीनें बेच रहे हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जमीनें फ्रीहोल्ड हैं, न कि लीजहोल्ड।
प्रतिवादी नंबर 2 (खरीदार कंपनी के निदेशक) ने दलील दी कि यह एक दीवानी विवाद है और इसे आपराधिक रंग नहीं दिया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में प्रज्ञा प्रांजल कुलकर्णी बनाम महाराष्ट्र राज्य (2025) के फैसले का हवाला देते हुए चार्जशीट दाखिल करने पर रोक लगाई थी।
कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा प्रज्ञा प्रांजल कुलकर्णी मामले पर भरोसा करने को “पूरी तरह से अनुचित” बताया और कहा कि उस मामले के तथ्य वर्तमान मामले से बिल्कुल अलग थे। कोर्ट ने अनुच्छेद 226 (रिट अधिकार क्षेत्र) और BNSS की धारा 528 (क्वैशिंग पावर) के बीच के अंतर को स्पष्ट किया।
नीहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर (पी) लिमिटेड बनाम महाराष्ट्र राज्य (2021) का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“हाईकोर्ट द्वारा पारित इस तरह का ब्लैंकेट अंतरिम आदेश संज्ञेय अपराधों की जांच करने वाली जांच एजेंसी की शक्तियों को प्रभावित करता है, जो कि सीआरपीसी/बीएनएसएस के प्रावधानों के तहत पुलिस का वैधानिक अधिकार और कर्तव्य है।”
कोर्ट ने भू-माफियाओं द्वारा किए जा रहे संगठित अपराधों पर गहरी चिंता व्यक्त की। प्रतिभा मनचंदा बनाम हरियाणा राज्य (2023) के फैसले का जिक्र करते हुए पीठ ने कहा:
“भारत में भूमि घोटाले एक निरंतर समस्या रहे हैं, जिसमें धोखाधड़ी और अवैध गतिविधियां शामिल हैं। जालसाज अक्सर फर्जी टाइटल बनाते हैं या जाली सेल डीड तैयार करते हैं। ये घोटाले न केवल व्यक्तियों को वित्तीय नुकसान पहुँचाते हैं, बल्कि विकास परियोजनाओं में बाधा डालते हैं और सार्वजनिक विश्वास को भी ठेस पहुँचाते हैं।”
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए हैं:
- चार्जशीट: जांच अधिकारी को FIR नंबर 642/2025 में जांच पूरी कर BNSS की धारा 193(3) के तहत रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।
- SIT का गठन: उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव की देखरेख में एक SIT गठित की जाएगी। रजिस्ट्रार ऑफ सोसाइटीज इसके सदस्य होंगे जो सोसायटी की सभी जमीनों की पहचान करेंगे और यह पता लगाएंगे कि उन्हें कैसे हस्तांतरित किया गया।
- तथ्य-खोज रिपोर्ट (Fact-Finding Report): SIT को तीन महीने के भीतर अपनी जांच पूरी कर पुलिस को रिपोर्ट सौंपनी होगी। यदि धोखाधड़ी या आपराधिक मंशा पाई जाती है, तो संबंधित पुलिस थानों को संज्ञान लेना होगा।
- अंतरिम सुरक्षा: जब तक SIT अपनी रिपोर्ट नहीं सौंपती और जांच पूरी नहीं होती, तब तक प्रतिवादी नंबर 2 के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी, बशर्ते वह जांच में सहयोग करें।
- न्यायिक पर्यवेक्षण: SIT की रिपोर्ट हाईकोर्ट के समक्ष पेश की जाएगी, ताकि लंबित रिट याचिका पर अंतिम निर्णय लिया जा सके।
कोर्ट ने अंत में टिप्पणी की कि संस्थापक का यह उद्देश्य कभी नहीं था कि समूहों के बीच आपसी झगड़े हों और सोसायटी की कीमती संपत्ति को उसके उद्देश्यों के विपरीत निजी स्वार्थ के लिए बेचा जाए।
केस विवरण:
- केस टाइटल: श्रीकांत ओझा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
- केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर ___ ऑफ 2026 (SLP (Crl.) No. 3123/2026 से उत्पन्न)
- पीठ: जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर
- दिनांक: 12 मई, 2026

