साक्ष्यों के अभाव और जांच में खामियों के चलते ताड़मेटला मुठभेड़ मामले में बरी किए गए आरोपियों की रिहाई बरकरार: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने CRPF जवानों पर हुए बड़े हमले के मामले में कई व्यक्तियों को बरी करने के फैसले को बरकरार रखा है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में प्रत्यक्ष साक्ष्यों की कमी, अधूरी परिस्थितिजन्य साक्ष्य की कड़ी और जांच में गंभीर प्रक्रियात्मक खामियों का उल्लेख किया है। 76 सुरक्षाकर्मियों की शहादत जैसे गंभीर अपराध के बावजूद, चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष बिना किसी उचित संदेह के दोष सिद्ध करने में विफल रहा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 4 अप्रैल से 7 अप्रैल, 2010 के बीच की घटना से जुड़ा है। CRPF की 62वीं बटालियन के 82 सदस्यों का दल राज्य पुलिस के साथ सुकमा जिले के चिंतालनार के पहाड़ी जंगलों में ‘एरिया डोमिनेशन पेट्रोल’ पर था। 6 अप्रैल, 2010 की सुबह ताड़मेटला गांव के पास नक्सलियों ने पुलिस बल पर घात लगाकर हमला किया।

आरोप है कि हमलावरों ने भारी गोलाबारी और विस्फोटकों का इस्तेमाल किया, जिसमें CRPF के 75 जवान और राज्य पुलिस का एक सदस्य शहीद हो गया। अभियोजन के अनुसार, नक्सलियों ने हथियार लूट लिए और घटनास्थल पर टिफिन बम भी लगाए थे। इस मामले में IPC की धारा 148, 120B, 396 (76 मामलों में), आर्म्स एक्ट की धारा 25, 27 और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 3, 5 के तहत आरोप पत्र दाखिल किया गया था। 7 जनवरी, 2013 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, दक्षिण बस्तर ने आरोपियों को बरी कर दिया था, जिसे राज्य सरकार ने इस अपील के माध्यम से चुनौती दी थी।

पक्षों की दलीलें

राज्य/अपीलकर्ता: महाधिवक्ता श्री विवेक शर्मा और उप महाधिवक्ता डॉ. सौरभ पांडे ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने आरोपी बरसे लखमा के धारा 164 Cr.P.C. के तहत दिए गए इकबालिया बयान पर उचित विचार नहीं किया। उन्होंने कहा कि कोर्ट ने बम निरोधक दस्ते द्वारा निष्क्रिय किए गए पाइप बमों और विस्फोटकों की जब्ती को भी नजरअंदाज किया। राज्य ने धारा 311 Cr.P.C. के तहत उस आवेदन के खारिज होने को भी चुनौती दी, जिसमें सात घायल CRPF जवानों (चश्मदीदों) के परीक्षण की अनुमति मांगी गई थी।

प्रतिवादी: आरोपियों की ओर से अधिवक्ता श्री ईश्वर जायसवाल ने ट्रायल कोर्ट के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने दलील दी कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्य अपर्याप्त थे और दोषारोपण के लिए कोई ठोस सामग्री न होने के कारण बरी करने का फैसला बिल्कुल सही था।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन ने 43 गवाहों का परीक्षण किया और 156 दस्तावेज पेश किए। हालांकि, बेंच ने जांच में कई महत्वपूर्ण कमियां पाईं:

  1. गवाहों का मुकरना: कोर्ट ने कहा कि “अभियोजन के सभी गवाह अपने बयानों से मुकर गए (होस्टाइल हो गए)” और किसी भी गवाह ने आरोपियों की पहचान इस अपराध के दोषियों के रूप में नहीं की।
  2. परिस्थितिजन्य साक्ष्य: शरद बिरधीचंद सारडा बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सिद्धांतों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि साक्ष्य की कड़ी अधूरी रही। बेंच ने कहा, “परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला अधूरी रही और यह आरोपी का किसी भी आतंकवादी संगठन या राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों के साथ सीधा या अप्रत्यक्ष संबंध स्थापित करने में विफल रही।”
  3. जब्ती में खामियां: हालांकि घटनास्थल से विस्फोटक मिले थे, लेकिन वे आरोपियों के कब्जे से बरामद नहीं हुए थे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि “FSL रिपोर्ट, जो यह प्रमाणित करती कि जब्त सामग्री विस्फोटक है, पेश ही नहीं की गई, जिससे जब्ती का साक्ष्य बेअसर हो गया।”
  4. प्रक्रियात्मक चूक: हाईकोर्ट ने आर्म्स एक्ट के तहत आवश्यक ‘प्रॉसिक्यूशन सेंक्शन’ (अभियोजन स्वीकृति) के रिकॉर्ड की अनुपस्थिति और आरोपियों की ‘शिनाख्ती परेड’ (TIP) न कराए जाने पर भी सवाल उठाए।
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जांच की गुणवत्ता पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“यह अत्यंत खेदजनक है कि राज्य ने नक्सलियों द्वारा किए गए इस क्रूर हमले के बावजूद आरोपियों के खिलाफ ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य जुटाने के प्रभावी कदम नहीं उठाए… जांच दोषपूर्ण प्रतीत होती है क्योंकि इसमें आर्म्स एक्ट के तहत आवश्यक स्वीकृति का कोई रिकॉर्ड नहीं है और न ही आरोपियों की शिनाख्ती परेड कराई गई।”

फैसला

हाईकोर्ट ने राज्य की अपील को खारिज करते हुए कहा कि यद्यपि 76 जवानों की शहादत “गहरी त्रासदी और राष्ट्रीय चिंता का विषय है,” लेकिन कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्यों के अभाव में सजा बरकरार नहीं रखी जा सकती।

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हाईकोर्ट ने भविष्य में गंभीर अपराधों की जांच में उच्च मानक सुनिश्चित करने के लिए मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक (DGP) को कड़े निर्देश जारी किए हैं। इनमें फॉरेंसिक और तकनीकी साक्ष्यों का तत्काल संग्रहण, ‘चेन ऑफ कस्टडी’ का सही रखरखाव और समय पर शिनाख्ती परेड आयोजित करना शामिल है।

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: स्टेट ऑफ छत्तीसगढ़ बनाम ओयामी गंगा एवं अन्य
  • केस नंबर: ACQA No. 85 of 2014
  • बेंच: चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल
  • तारीख: 05.05.2026

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