“चौबीसों घंटे दो सहायक”: सुप्रीम कोर्ट ने 100% विकलांग दुर्घटना पीड़ित के लिए आजीवन सहायता का निर्देश दिया

सुप्रीम कोर्ट ने एक सड़क दुर्घटना के शिकार 14 वर्षीय किशोर को दी जाने वाली मुआवजे की राशि में भारी वृद्धि करते हुए इसे ₹12,17,543 से बढ़ाकर ₹56,83,663 कर दिया है। जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने पाया कि पहले निर्धारित की गई काल्पनिक आय (notional income) काफी कम थी। इसके साथ ही, कोर्ट ने 100% स्थायी विकलांगता झेल रहे अपीलकर्ता के लिए चौबीसों घंटे दो सहायकों (attendants) की व्यवस्था करने का भी निर्देश दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 8 नवंबर, 2016 को हुई एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा है। अपीलकर्ता हंसराज, जिसकी उम्र उस समय 14 वर्ष थी, अपने मित्र के साथ मोटरसाइकिल पर पीछे बैठा था। पहले प्रतिवादी द्वारा मोटरसाइकिल को लापरवाही से चलाने के कारण वह एक ट्रैक्टर-ट्रॉली के पिछले हिस्से से टकरा गई। इस हादसे में हंसराज की गर्दन, सिर और रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोटें आईं और कई फ्रैक्चर हुए। उसे करीब 203 दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा।

इन चोटों के कारण वह 100% स्थायी रूप से विकलांग हो गया। इसके बाद, मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 166 के तहत मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) के समक्ष मुआवजे का दावा पेश किया गया। न्यायाधिकरण ने शुरू में ₹7,76,543 का मुआवजा दिया। अपील के बाद, राजस्थान हाईकोर्ट ने इसे बढ़ाकर ₹12,17,543 कर दिया। हालांकि, इस आंशिक वृद्धि से असंतुष्ट होकर अपीलकर्ता ने मुआवजे की राशि में और बढ़ोतरी के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि दुर्घटना के समय किशोर की उम्र और उसकी 100% विकलांगता को देखते हुए हाईकोर्ट द्वारा मानी गई ₹30,000 वार्षिक की काल्पनिक आय अपर्याप्त है। कुमारी लक्ष्मीश्री बनाम प्रबंध निदेशक, केएसआरसीटीसी डिपो, बेंगलुरु मामले का हवाला देते हुए वकील ने ₹10,000 मासिक आय का सुझाव दिया। इसके अलावा, यह भी कहा गया कि अपीलकर्ता को जीवन भर निरंतर सहायता की आवश्यकता है, इसलिए काजल बनाम जगदीश चंद और अन्य मामले के आधार पर सहायक शुल्क, मानसिक पीड़ा और भविष्य के चिकित्सा खर्चों में वृद्धि की जानी चाहिए।

दूसरी ओर, बीमा कंपनी ने अपील का विरोध किया और हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन किया। उनके अनुसार, काल्पनिक आय 2016 में राजस्थान में एक कुशल श्रमिक (skilled workman) की न्यूनतम मजदूरी (₹5,746 प्रति माह) के आधार पर होनी चाहिए। कंपनी का तर्क था कि हाईकोर्ट ने पहले ही उचित मुआवजा दिया है और अपीलकर्ता द्वारा मांगी गई राशि बहुत अधिक है।

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कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट द्वारा निर्धारित मुआवजा बढ़ाने योग्य है। काल्पनिक आय के निर्धारण पर पीठ ने कहा:

“हाईकोर्ट ने काल्पनिक वार्षिक आय ₹30,000 मानी है। यह राशि कम है। काल्पनिक आय का निर्धारण 2016 में राजस्थान राज्य में एक कुशल श्रमिक के लिए स्वीकार्य न्यूनतम मजदूरी के आधार पर किया जाना चाहिए।”

कोर्ट ने मासिक काल्पनिक आय ₹5,800 तय की और भविष्य की संभावनाओं (future prospects) के लिए 40% अतिरिक्त राशि जोड़ी। 18 के गुणक (multiplier) का उपयोग करते हुए, आय की हानि की कुल राशि ₹17,53,920 निर्धारित की गई।

सहायक शुल्क (attendant charges) के महत्वपूर्ण मुद्दे पर, कोर्ट ने काजल बनाम जगदीश चंद मामले के मिसाल का उल्लेख करते हुए कहा:

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“चूंकि अपीलकर्ता 100% स्थायी विकलांगता से पीड़ित है, इसलिए उसे चौबीसों घंटे दो सहायकों की सहायता की आवश्यकता होगी।”

एक अर्ध-कुशल श्रमिक (semi-skilled workman) की मजदूरी ₹5,000 प्रति माह मानते हुए, कोर्ट ने दो सहायकों के लिए ₹21,60,000 का मुआवजा दिया। इसके अलावा, “मानसिक पीड़ा और सुविधाओं की हानि” के लिए ₹10,00,000, “भविष्य के चिकित्सा खर्च” के लिए ₹3,00,000 और “विवाह की संभावनाओं की हानि” के लिए ₹3,00,000 की राशि प्रदान की गई।

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सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने 9 अप्रैल, 2024 के हाईकोर्ट के फैसले में संशोधन किया और अपीलकर्ता को कुल ₹56,83,663 का मुआवजा देने का आदेश दिया। यह राशि दावा याचिका दायर करने की तिथि से भुगतान होने तक 6% वार्षिक ब्याज के साथ दी जाएगी।

अपीलकर्ता की दीर्घकालिक देखभाल सुनिश्चित करने के लिए कोर्ट ने सहायक शुल्क (₹21,60,000) के वितरण के लिए विशेष निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने आदेश दिया कि इस राशि का 25% हिस्सा तुरंत अपीलकर्ता को दिया जाए, जबकि शेष 75% हिस्सा फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) में निवेश किया जाए। इस निवेश से प्रति वर्ष ₹1,50,000 की राशि अपीलकर्ता को दी जाएगी ताकि वह अपनी देखभाल का खर्च उठा सके, जबकि शेष राशि पर ब्याज मिलता रहे।

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: हंसराज बनाम मुकेश नाथ और अन्य
  • केस नंबर: सिविल अपील (SLP (C) No. 13122 of 2024 से उत्पन्न)
  • पीठ: जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर
  • दिनांक: 6 मई, 2026

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