‘खुद को सुपर CJI न समझें’: ₹37,000 करोड़ के घोटाले में सुप्रीम कोर्ट ने अपनी ही रजिस्ट्री की आलोचना की

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अपने ही प्रशासनिक विंग (रजिस्ट्री) के प्रति कड़ा रुख अपनाते हुए तीखी टिप्पणी की। अदालत ने रजिस्ट्री के अधिकारियों पर अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करने का आरोप लगाया और कहा कि वे खुद को “सुपर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया” समझने लगे हैं।

चीफ जस्टिस सूर्या कांत और जस्टिस जोयमालया बागची की बेंच ने ₹37,000 करोड़ के निवेश धोखाधड़ी मामले में न्यायिक आदेश का पालन न करने पर गहरी नाराजगी जताई। कोर्ट ने इस प्रशासनिक चूक की जांच के लिए अब एक औपचारिक ‘फैक्ट-फाइंडिंग’ जांच के आदेश दिए हैं।

‘सुपर चीफ जस्टिस’ वाली टिप्पणी

यह मामला आयुषी मित्तल (उर्फ आयुषी अग्रवाल) की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया, जो ₹37,000 करोड़ के बड़े निवेश घोटाले में आरोपी है। बेंच ने गौर किया कि 23 मार्च को दिए गए आदेश के बावजूद, रजिस्ट्री ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) को नोटिस जारी नहीं किया था।

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सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्या कांत ने कहा, “रजिस्ट्री बहुत ही खराब (nasty) व्यवहार कर रही है। बहुत ही खराब रजिस्ट्री… यहां बैठा हर कोई खुद को सुपर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया समझता है।”

सीजेआई ने सवाल उठाया कि प्रशासनिक अधिकारी खुद से यह कैसे तय कर सकते हैं कि बेंच ने ईडी और अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी करने का आदेश नहीं दिया था, जिससे न्यायिक प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न हुई।

₹37,000 करोड़ की धोखाधड़ी का मामला

याचिकाकर्ता आयुषी मित्तल, उनके पति और उनकी कंपनी पर एक बड़े निवेश घोटाले की साजिश रचने का आरोप है। बचाव पक्ष का दावा है कि निवेशकों को धन का एक बड़ा हिस्सा वापस कर दिया गया है, हालांकि ईडी ने वर्तमान में विभिन्न बैंक खातों में जमा कई सौ करोड़ रुपये फ्रीज कर रखे हैं।

23 मार्च की पिछली सुनवाई में, कोर्ट ने राजस्थान सरकार की उस मौखिक प्रार्थना को स्वीकार कर लिया था जिसमें ईडी को पक्षकार बनाने की मांग की गई थी। इसका उद्देश्य यह पता लगाना था कि क्या याचिकाकर्ता और उनके विस्तारित परिवार की सभी चल और अचल संपत्तियों को सही तरीके से कुर्क (Attach) किया गया है।

संपत्ति के पूर्ण खुलासे के बिना जमानत नहीं

बेंच ने अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि जब तक सभी संपत्तियों का “व्यापक विवरण” उपलब्ध नहीं कराया जाता, तब तक जमानत याचिका के गुण-दोष पर विचार नहीं किया जाएगा।

कोर्ट ने याचिकाकर्ता के कानूनी प्रतिनिधि को एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिसमें निम्नलिखित की अचल संपत्तियों की जानकारी मांगी गई है:

  • याचिकाकर्ता और उनके पति।
  • उनके बच्चे और माता-पिता।
  • उनके भाई-बहन और सास-ससुर।
  • कंपनी के निदेशक, प्रबंधक और प्रमुख कर्मचारी।
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बेंच ने स्पष्ट किया, “जब तक ऐसे पूर्ण विवरण प्रदान नहीं किए जाते, हम गुण-दोष के आधार पर जमानत की याचिका पर विचार नहीं करेंगे।”

जांच के आदेश

इस आंतरिक व्यवस्था में हुई चूक को सुधारने के लिए, सुप्रीम कोर्ट ने रजिस्ट्रार ज्यूडिशियल को यह जांचने का काम सौंपा है कि 23 मार्च के आदेश की अनदेखी क्यों की गई। बेंच ने अपने नए आदेश में स्पष्ट किया कि प्रवर्तन निदेशालय के निदेशक को तुरंत नोटिस तामील किया जाना चाहिए।

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मामले की अगली सुनवाई मई में होगी, जिसमें हलफनामे और आंतरिक जांच की रिपोर्ट पेश की जाएगी।

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