एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत आपराधिक दायित्व व्यक्तिगत है और यह चेक जारी करने वाले की मृत्यु के साथ समाप्त हो जाता है; कानूनी उत्तराधिकारी उत्तरदायी नहीं: कलकत्ता हाईकोर्ट

कलकत्ता हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट (NI Act), 1881 की धारा 138 के तहत आपराधिक दायित्व पूरी तरह से व्यक्तिगत (intuitu personae) होता है। कोर्ट ने कहा कि चेक जारी करने वाले की मृत्यु के बाद इसे उसके कानूनी प्रतिनिधि या उत्तराधिकारी पर स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। जस्टिस उदय कुमार ने एक मृतक के भाई के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए कहा कि नागरिक ऋण (civil debt) तो किसी संपदा (estate) से वसूला जा सकता है, लेकिन “अपराध” कोई ऐसी विरासत नहीं है जिसे किसी को सौंपा जा सके।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद शिकायतकर्ता गुलाम सहारिया और तपन कुमार डे (अब मृतक) के बीच एक व्यावसायिक लेनदेन से शुरू हुआ था। आरोप था कि तपन ने राशन डीलर के रूप में अपने व्यवसाय के लिए शिकायतकर्ता से ₹27,00,000/- का ऋण लिया था और इसके भुगतान के लिए 1 फरवरी, 2022 को एक चेक जारी किया था। हालांकि, 3 फरवरी, 2022 को तपन की मृत्यु हो गई।

चेक जारी करने वाले की मृत्यु के बावजूद, शिकायतकर्ता ने 6 अप्रैल, 2022 को चेक बैंक में पेश किया, जो “अपर्याप्त धन” के कारण अनादृत (dishonour) हो गया। इसके बाद, शिकायतकर्ता ने मृतक के भाई गौतम डे को “कानूनी प्रतिनिधि” और “बिजनेस एसोसिएट” मानते हुए कानूनी नोटिस भेजा। जब गौतम डे ने भुगतान से इनकार कर दिया, तो उनके खिलाफ एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत शिकायत दर्ज की गई। बहरामपुर के न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 4 अगस्त, 2023 को गौतम डे की डिस्चार्ज याचिका खारिज कर दी थी, जिसके खिलाफ यह पुनरीक्षण आवेदन (revisional application) हाईकोर्ट में दायर किया गया।

पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता की ओर से: गौतम डे का प्रतिनिधित्व करते हुए वकील सोमनाथ अधिकारी ने तर्क दिया कि यह कार्यवाही कानूनी रूप से गलत है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता न तो चेक का “हस्ताक्षरकर्ता” (signatory) था और न ही उस बैंक खाते का धारक। उन्होंने जोर देकर कहा कि धारा 138 के अपराध के लिए आवश्यक प्रक्रियाओं की श्रृंखला—विशेष रूप से चेक जारी करने वाले को नोटिस—पूरी नहीं की जा सकी क्योंकि चेक पेश करने से पहले ही उसकी मृत्यु हो चुकी थी। उन्होंने अल्का खांडू अवहाद बनाम अमर श्यामप्रसाद मिश्रा (2021) और गंगा प्रसाद रत्नाकर बनाम फणींद्र कुमार चंद्रा (2023) जैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया।

विपक्षी दल की ओर से: शिकायतकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील प्रतीप कुमार चटर्जी ने तर्क दिया कि एक “अंगीकार पत्र” के आधार पर याचिकाकर्ता व्यवसाय में सक्रिय रूप से शामिल था। उन्होंने एनआई एक्ट की धारा 29 का हवाला देते हुए कहा कि कानूनी प्रतिनिधि मृतक के दायित्वों के लिए उत्तरदायी है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि समन मामलों में एक बार प्रक्रिया शुरू होने के बाद “डिस्चार्ज” का कोई चरण नहीं होता है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने इस मामले में कानूनी दायित्व की प्रकृति को लेकर चार मुख्य प्रश्नों पर विचार किया।

व्यक्तिगत दायित्व पर: जस्टिस उदय कुमार ने गौर किया कि धारा 138 एक विशिष्ट “सांविधिक अपराध” है, जहां दंडात्मक परिणाम केवल उस व्यक्ति से जुड़े होते हैं जो चेक पर हस्ताक्षर करता है और खाता बनाए रखता है। कोर्ट ने कहा:

“आपराधिक कानून के क्षेत्र में… आपराधिक दायित्व व्यक्तिगत होता है; यह अपराधी के साथ ही पैदा होता है और उसकी मृत्यु के साथ ही समाप्त हो जाता है।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘एक्शन पर्सनैलिस मोरिटुर कम परसोना’ (व्यक्तिगत कार्रवाई व्यक्ति के साथ ही समाप्त हो जाती है) का सिद्धांत यहां पूरी तरह लागू होता है। एनआई एक्ट की धारा 29 सिविल कानून में ऋण वसूली की अनुमति देती है, लेकिन इसे आपराधिक कार्यवाही में लागू नहीं किया जा सकता।

गैर-हस्ताक्षरकर्ता की स्थिति पर: अल्का खांडू अवहाद मामले का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि संयुक्त दायित्व (joint liability) के मामलों में भी उस व्यक्ति पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता जिसने चेक पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। कोर्ट ने कहा:

“व्यक्तियों के बीच लेनदेन में, ‘हस्ताक्षरकर्ता का नियम’ पूर्ण है… याचिकाकर्ता की ‘बिजनेस एसोसिएट’ की स्थिति उसे अपने भाई के खाते से भुगतान अधिकृत करने की कानूनी क्षमता नहीं देती है।”

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प्रक्रियात्मक श्रृंखला पर: कोर्ट ने पाया कि चेक जारी करने वाले की मृत्यु के साथ ही वैधानिक आवश्यकताएं टूट गई थीं। चूंकि चेक बैंक में पेश किए जाने से पहले ही तपन की मृत्यु हो चुकी थी, इसलिए बैंक का भुगतान करने का अधिकार समाप्त हो गया था। इसके अलावा, कानून किसी उत्तराधिकारी पर आपराधिक नोटिस की “वैकल्पिक तामील” को मान्यता नहीं देता है।

मजिस्ट्रेट की प्रक्रिया पर: हाईकोर्ट ने तकनीकी आधार पर डिस्चार्ज याचिका खारिज करने के मजिस्ट्रेट के फैसले की आलोचना की। कोर्ट ने कहा कि हालांकि मजिस्ट्रेट समन वापस नहीं ले सकता, लेकिन ऐसी कार्यवाही को जारी रखना जो शुरुआत से ही कानूनी रूप से गलत हो, “कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग” है।

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फैसला

हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण आवेदन को स्वीकार करते हुए गौतम डे के खिलाफ कार्यवाही को रद्द कर दिया।

  1. कोर्ट ने कहा कि धारा 138 के तहत आपराधिक दायित्व किसी उत्तराधिकारी को विरासत में नहीं मिलता।
  2. 4 अगस्त, 2023 के आदेश को रद्द कर दिया गया, जिसके तहत डिस्चार्ज याचिका खारिज की गई थी।
  3. याचिकाकर्ता को उसके बेल बांड से मुक्त कर दिया गया।
  4. ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया कि वह मृतक तपन कुमार डे के खिलाफ कार्यवाही को समाप्त (abatement) घोषित करे।

हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता उत्तराधिकार कानून के तहत मृतक की संपत्ति के खिलाफ ऋण वसूली के लिए सिविल मुकदमा दायर करने के लिए स्वतंत्र है।

केस विवरण:

  • केस टाइटल: गौतम डे बनाम गुलाम सहारिया
  • केस नंबर: CRR 3672 OF 2023 (साथ में CRAN 2 OF 2024)
  • बेंच: जस्टिस उदय कुमार
  • तारीख: 28 अप्रैल, 2026

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