सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदंड से जुड़े मामलों में एक ऐतिहासिक आदेश जारी करते हुए ‘मिटिगेशन रिपोर्ट’ (राहतकारी परिस्थितियों की रिपोर्ट) एकत्र करने की प्रक्रिया में आमूल-चूल बदलाव किए हैं। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने फांसी की सजा पाने वाले दो दोषियों की सजा पर रोक लगाते हुए यह स्पष्ट किया कि सजा के निर्धारण से जुड़ी अहम जानकारियां ट्रायल के शुरुआती चरणों में ही अदालतों के सामने आनी चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि
यह कार्यवाही पटना हाईकोर्ट के 22 जनवरी 2026 के उस फैसले से उत्पन्न हुई है, जिसमें ‘डेथ रेफरेंस’ (Death Reference No. 2/2024) और क्रिमिनल अपील के तहत दो दोषियों की फांसी की सजा की पुष्टि की गई थी। इस फैसले के विरुद्ध दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की। अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए सजा के निष्पादन पर अंतरिम रोक लगा दी और संबंधित रिकॉर्ड तलब किए।
अदालत का विश्लेषण: सजा निर्धारण की प्रक्रिया में सुधार की आवश्यकता
अदालत ने पाया कि सुधार और पुनर्वास के संवैधानिक लक्ष्यों के बावजूद, एक व्यवस्थित ढांचे की कमी के कारण मृत्युदंड के मामलों में दोषियों की वास्तविक स्थिति का आकलन नहीं हो पाता है। मनोज बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2023) 2 SCC 353 के नजीर का हवाला देते हुए, पीठ ने जोर दिया कि ट्रायल कोर्ट को सजा सुनाने से पहले ही राहतकारी परिस्थितियों (Mitigating Circumstances) पर गहराई से विचार करना चाहिए ताकि सजा केवल “प्रतिशोधात्मक” (retributive) न रह जाए।
पीठ ने इस “चिंताजनक प्रवृत्ति” पर विशेष रूप से गौर किया कि अक्सर ऐसी रिपोर्ट पहली बार सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर ही मांगी जाती हैं। अदालत ने टिप्पणी की:
“यह स्थिति एक ऐसी विचित्र विडंबना पैदा करती है जिसमें इस तरह की महत्वपूर्ण सामग्री पहली बार केवल इस अदालत के समक्ष अपील के चरण में मांगी जाती है। इससे जानकारी जुटाने में लंबा अंतराल और टालने योग्य देरी होती है, जबकि यह जानकारी सजा के प्रश्न पर समयबद्ध और सूचित निर्णय लेने के लिए अत्यंत आवश्यक है।”
इसके अतिरिक्त, अदालत ने उल्लेख किया कि कई मामलों में कानूनी बचाव का स्तर अपर्याप्त होता है और ट्रायल के दौरान राहतकारी साक्ष्य जुटाने के गंभीर प्रयास नहीं किए जाते, जिससे अदालतें एक संतुलित न्याय प्रक्रिया से वंचित रह जाती हैं।
अदालत का निर्णय और अनिवार्य दिशा-निर्देश
अदालत ने वर्तमान मामले के लिए विशिष्ट आदेश देने के साथ-साथ भविष्य के लिए निम्नलिखित अनिवार्य दिशा-निर्देश जारी किए हैं:
मामले से जुड़े विशिष्ट निर्देश:
- सजा पर रोक: अपील के अंतिम निस्तारण तक दोषियों की फांसी की सजा का निष्पादन स्थगित रहेगा।
- जेल और प्रोबेशन रिपोर्ट: बिहार सरकार और बक्सर जेल अधीक्षक को 16 सप्ताह के भीतर दोषियों के आचरण, जेल में किए गए कार्यों की प्रकृति और प्रोबेशन अधिकारी की रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।
- मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन: बक्सर जेल अधीक्षक को सरकारी मेडिकल अस्पताल के माध्यम से दोषियों का मनोवैज्ञानिक परीक्षण कराने का निर्देश दिया गया है।
- विशेषज्ञ जांच: अदालत ने देविका रावत और सना वोहरा (मिटिगेशन विशेषज्ञ) को बक्सर जेल में दोषियों के साथ कई व्यक्तिगत साक्षात्कार करने और 20 सप्ताह के भीतर ‘मिटिगेशन इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट’ प्रस्तुत करने की अनुमति दी है।
मृत्युदंड के मामलों के लिए सामान्य दिशा-निर्देश:
- ट्रायल कोर्ट की अनिवार्यता: दोषी करार दिए जाने के बाद और सजा सुनाने से पहले, ट्रायल कोर्ट को अनिवार्य रूप से राहतकारी और गंभीर परिस्थितियों की रिपोर्ट मंगानी होगी।
- हाईकोर्ट का दायित्व: यदि ट्रायल कोर्ट के स्तर पर ऐसी रिपोर्ट रिकॉर्ड में नहीं है, तो हाईकोर्ट डेथ रेफरेंस स्वीकार करते समय अनिवार्य रूप से ऐसी रिपोर्ट तलब करेगा।
- समर्पित कानूनी टीम: प्रत्येक डेथ रेफरेंस मामले में लीगल सर्विसेज कमेटी एक समर्पित टीम नियुक्त करेगी, जिसमें एक सीनियर काउंसिल और कम से कम 7 साल का अनुभव रखने वाले दो वकील शामिल होंगे, चाहे दोषी के पास निजी वकील ही क्यों न हो।
- NALSA के लिए कार्ययोजना: राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) को राहतकारी परिस्थितियों की जांच के लिए व्यापक गाइडलाइन्स बनाने और फील्डवर्क के लिए विशेषज्ञों की टीम नियुक्त करने का निर्देश दिया गया है।
रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया है कि वह इस आदेश की प्रति तत्काल सभी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों को अनुपालन हेतु प्रेषित करे। मामले की अगली सुनवाई 20 सप्ताह बाद होगी।
केस विवरण
- केस का शीर्षक: अमन सिंह और अन्य बनाम बिहार राज्य
- केस संख्या: क्रिमिनल अपील (SLP (Crl) Diary No. 24574 of 2026 से उत्पन्न)
- पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई
- तारीख: 27 अप्रैल, 2026

