सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को धार्मिक प्रथाओं को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं की कानूनी स्थिति (standing) को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठाए। कोर्ट ने विशेष रूप से यह पूछा कि क्या उत्तर भारत में रहने वाला कोई गैर-आस्तिक व्यक्ति, किसी सुदूर मंदिर में प्रवेश के अधिकार का दावा कर सकता है।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ जजों की संविधान पीठ वर्तमान में सबरीमाला मंदिर सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के खिलाफ भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे की जांच कर रही है। सुनवाई के दौरान, पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि मंदिर में प्रवेश के अधिकार का फैसला करते समय “श्रद्धालु” और “गैर-श्रद्धालु” के बीच अंतर करना आवश्यक है।
यह टिप्पणी सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह की दलीलों के दौरान आई, जो बिंदु अमिनी और कनकदुर्गा का प्रतिनिधित्व कर रही थीं। ये वही दो महिलाएं हैं जिन्होंने 2018 के फैसले के बाद मंदिर में प्रवेश किया था।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने याचिकाकर्ताओं के मंदिर से भौगोलिक और व्यक्तिगत जुड़ाव पर सवाल उठाया। जस्टिस ने टिप्पणी की, “इस अधिकार का दावा कौन कर रहा है? क्या कोई श्रद्धालु इस अधिकार का दावा कर रहा है या किसी के कहने पर कोई गैर-श्रद्धालु? एक व्यक्ति जिसका इस मंदिर से कोई लेना-देना नहीं है और वह उत्तर भारत में कहीं है, जबकि यह मंदिर दक्षिण भारत में है। क्या प्रवेश के अधिकार का दावा करने वाले व्यक्ति की स्थिति पर भी विचार किया जाना चाहिए।”
जस्टिस नागरत्ना ने संविधान के अनुच्छेद 26(b) के तहत धार्मिक संप्रदायों की विविधता के सम्मान पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा, “हम इसलिए मजबूत हैं क्योंकि हम विविध हैं। विविधता ही हमारी ताकत है… उस सुरक्षा को देकर ही देश में एकता बनी रहती है। इसलिए, विविधता का सम्मान करें।”
एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने तर्क दिया कि 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं का बहिष्कार अस्पृश्यता (Untouchability) का ही एक आधुनिक रूप है। उन्होंने रेखांकित किया कि उनके द्वारा प्रतिनिधित्व की जा रही महिलाओं में से एक अनुसूचित जाति से है, और उन्हें मंदिर प्रवेश से रोकना अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का उन्मूलन) का उल्लंघन है।
जयसिंह ने कहा, “आज हमें बताया जाता है कि गैर-जाति हिंदू सबरीमाला में प्रवेश कर सकते हैं, लेकिन महिलाएं नहीं।” उन्होंने तर्क दिया कि जहां अनुच्छेद 17 ने सभी पुरुषों को जाति की परवाह किए बिना प्रवेश की अनुमति दी है, वहीं महिलाओं को उनके “सबसे रचनात्मक और उपजाऊ” वर्षों के दौरान अब भी रोका जा रहा है।
उन्होंने अनुच्छेद 25(1) के तहत पूजा के अधिकार को मौलिक अधिकार बताते हुए कहा, “इस अवधि के दौरान एक महिला की स्थिति क्या है?… आप मुझे आधा जीवन जीने के लिए नहीं कह सकते। यह कहना कि 10 से 50 वर्ष के बीच न जिएं, और फिर 10 से पहले और 50 के बाद जिएं, यह अधिकारों से वंचित करने जैसा है।”
यह सुनवाई सितंबर 2018 के फैसले के बाद उपजे विवादों से संबंधित है, जिसमें पांच जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत से सबरीमाला मंदिर में रजस्वला आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगे सदियों पुराने प्रतिबंध को हटा दिया था। हाईकोर्ट के पुराने फैसलों के विपरीत, सुप्रीम कोर्ट ने तब इस प्रथा को असंवैधानिक माना था।
जयसिंह ने कोर्ट को बताया कि 2018 के फैसले के बावजूद राज्य का सहयोग संतोषजनक नहीं रहा है। उन्होंने बताया कि उनके मुवक्किलों द्वारा ‘दर्शन’ करने के बाद कुछ समूहों ने ‘शुद्धिकरण’ समारोह आयोजित किया। उन्होंने आरोप लगाया, “ये केवल दो महिलाएं थीं जो ऊपर चढ़ने और ‘दर्शन’ करने में सफल रहीं। तब से कोई और सफल नहीं हुआ क्योंकि राज्य ने सुरक्षा देने से इनकार कर दिया है।”
नौ जजों की पीठ ने पहले ही यह नोट किया था कि किसी न्यायिक मंच के लिए किसी धार्मिक संप्रदाय की प्रथा को “अनिवार्य” या “गैर-अनिवार्य” घोषित करने के मापदंड परिभाषित करना अत्यंत कठिन है। कोर्ट फिलहाल व्यक्तिगत मौलिक अधिकारों और धार्मिक संप्रदायों के सामूहिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।

