पति पर बोझ डालने के लिए काम न करने वाली उच्च शिक्षित पत्नी भरण-पोषण की हकदार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक एम.डी. स्त्री रोग विशेषज्ञ (Gynecologist) पत्नी द्वारा अपने न्यूरोसर्जन पति से भरण-पोषण की मांग करने वाली अपील को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि कोई योग्य व्यक्ति अपनी विशेषज्ञता के माध्यम से कमाई करने में सक्षम है, लेकिन केवल जीवनसाथी पर बोझ डालने के लिए ऐसा करने से बचता है, तो हिंदू विवाह अधिनियम (HMA), 1955 की धारा 24 के तहत भरण-पोषण देने से इनकार किया जा सकता है।

जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सरन की खंडपीठ पत्नी और उनके तीन बच्चों द्वारा दायर प्रथम अपील पर सुनवाई कर रही थी। यह अपील ट्रायल कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ थी जिसमें पत्नी के भरण-पोषण के आवेदन को आंशिक रूप से खारिज कर दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला पति द्वारा दायर तलाक की याचिका से शुरू हुआ था। दोनों पक्ष प्रयागराज के निवासी हैं और उच्च शिक्षित चिकित्सा पेशेवर हैं—अपीलकर्ता एक स्त्री रोग विशेषज्ञ (एम.डी.) हैं और प्रतिवादी एक न्यूरोसर्जन हैं। उनके तीन बच्चे (दो बेटियां और एक बेटा) हैं।

अपीलकर्ताओं ने ट्रायल कोर्ट के 7 अप्रैल, 2025 के आदेश को चुनौती दी थी। ट्रायल कोर्ट ने बच्चों के भरण-पोषण के लिए धारा 26 के तहत आवेदन स्वीकार कर लिया था (जिसके तहत पति 60,000 रुपये प्रति माह दे रहा है), लेकिन धारा 24 के तहत पत्नी के भरण-पोषण के दावे को खारिज कर दिया था।

पक्षों के तर्क

अपीलकर्ता पत्नी के वकील ने तर्क दिया कि वह वर्तमान में काम नहीं कर रही हैं क्योंकि पति द्वारा मामला दर्ज किए जाने के बाद उन्हें अस्पताल से हटा दिया गया था। यह भी तर्क दिया गया कि वह अपने पति से उसी जीवन स्तर को बनाए रखने के लिए सहायता प्राप्त करने की हकदार हैं, जिसका वह अलगाव से पहले आनंद ले रही थीं।

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दूसरी ओर, प्रतिवादी पति के वकील ने कहा कि वह बच्चों के लिए भरण-पोषण की राशि का भुगतान पूरी निष्ठा से कर रहे हैं। उन्होंने तर्क दिया कि अपीलकर्ता एक प्रशिक्षित विशेषज्ञ स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं जो उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में पति से भी अधिक कमाने में सक्षम हैं। उन्होंने बताया कि ट्रायल कोर्ट ने उनकी योग्यता के आधार पर ही उनके आवेदन को खारिज किया था क्योंकि वह अपना भरण-पोषण करने में पूरी तरह सक्षम हैं।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने पाया कि यह निर्विवाद है कि अपीलकर्ता एम.डी. (गाइनेकोलॉजी) की डिग्री के साथ एक पोस्ट-ग्रेजुएट हैं। अपीलकर्ता द्वारा पेश किए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ‘चतुर्भुज बनाम सीताबाई (2008 AIR SC 530)’ पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उस मामले में पत्नी बेरोजगार थी और पति के पास पर्याप्त साधन थे, जबकि वर्तमान मामले के तथ्य पूरी तरह अलग हैं।

हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा:

“जहाँ एक योग्य व्यक्ति अपनी विशेषज्ञता के उपयोग से पर्याप्त कमाई करने में सक्षम है और फिर भी केवल अपने पति पर बोझ डालने के लिए ऐसा करने से बचता है, ऐसी स्थिति में अदालतें धारा 24 के तहत भरण-पोषण से इनकार कर सकती हैं।”

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हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उन निष्कर्षों का भी उल्लेख किया, जिनमें दिखाया गया था कि अपीलकर्ता का आयकर रिटर्न (ITR) 31 लाख रुपये प्रति वर्ष से अधिक की कमाई दर्शाता था।

निर्णय

हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता के इस तर्क को खारिज कर दिया कि वह “वर्तमान में काम नहीं कर रही हैं” और कहा कि वह “अपनी विशेषज्ञता के क्षेत्र में शानदार कमाई करने में सक्षम हैं।” परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश में कोई त्रुटि नहीं पाई और अपील को खारिज कर दिया।

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केस विवरण:

  • केस शीर्षक: डॉ गरिमा दुबे और 3 अन्य बनाम डॉ सौरभ आनंद दुबे
  • केस संख्या: प्रथम अपील संख्या 594 वर्ष 2025 (FIRST APPEAL No. 594 of 2025)
  • पीठ: जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सरन
  • दिनांक: 21 अप्रैल, 2026

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