दिल्ली हाईकोर्ट ने रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल के उस फैसले को खारिज कर दिया है, जिसमें मृतक के पास यात्रा टिकट न मिलने और घटना को ‘अप्रिय घटना’ (untoward incident) न मानने के आधार पर मुआवजे के दावे को रद्द कर दिया गया था। जस्टिस मनोज कुमार ओहरी ने टिप्पणी की कि ट्रिब्यूनल ने सबूतों के आकलन में “अत्यधिक कठोर मानक” और “हाइपर-तकनीकी दृष्टिकोण” अपनाया है। कोर्ट ने कहा कि ट्रिब्यूनल ने उस लाभकारी कानून की अनदेखी की जिसका उद्देश्य रेल दुर्घटनाओं के पीड़ितों को तत्काल राहत प्रदान करना है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 16 अगस्त, 2019 को श्री देवेंद्र सिंह की मृत्यु से संबंधित है। अपीलकर्ताओं के अनुसार, सिंह रक्षाबंधन के अवसर पर अलीगढ़ में अपनी बहन से मिलने गए थे और ट्रेन संख्या 54461 से वापस लौट रहे थे। राजघाट नरौरा और डिबाई रेलवे स्टेशन के बीच चलती ट्रेन से अचानक गिरने के कारण उन्हें घातक चोटें आईं और मौके पर ही उनकी मृत्यु हो गई।
रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल ने 13 मई, 2025 को इस दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि मृतक के पास कोई टिकट नहीं मिला, इसलिए उन्हें ‘bona fide passenger’ (वैध यात्री) नहीं माना जा सकता। साथ ही ट्रिब्यूनल ने इसे रेलवे अधिनियम, 1989 के तहत ‘अप्रिय घटना’ मानने से भी इनकार कर दिया था।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं की दलीलें: अपीलकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि जीआरपी (GRP) की कार्यवाही और पंचनामे के दस्तावेज स्पष्ट करते हैं कि मृतक का शव “रेलवे ट्रैक के पास” मिला था। उन्होंने चंदर पाल सिंह (AW-2) की गवाही पर जोर दिया, जिन्होंने बताया था कि वे मृतक के साथ स्टेशन गए थे और उनके सामने ही टिकट खरीदा गया था। यह भी कहा गया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दर्ज चोटें चलती ट्रेन से गिरने की स्थिति से मेल खाती हैं।
प्रतिवादी (रेलवे) की दलीलें: भारत सरकार की ओर से पेश वकील ने ट्रिब्यूनल के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने दलील दी कि तलाशी के दौरान मृतक के पास कोई यात्रा टिकट नहीं मिला। रेलवे ने डीआरएम (DRM) रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि लोको पायलट ने किसी भी अप्रिय घटना की सूचना नहीं दी थी, इसलिए घटना की परिस्थितियां संदिग्ध हैं।
कोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ
हाईकोर्ट ने मुख्य रूप से दो बिंदुओं पर विचार किया: क्या यह एक ‘अप्रिय घटना’ थी और क्या मृतक एक वैध यात्री थे।
‘अप्रिय घटना’ पर कोर्ट का रुख: कोर्ट ने पाया कि मृतक का शव ट्रैक के बिल्कुल पास मिला था, जो इस बात को नकारता है कि वे ट्रैक पार करते समय ट्रेन की चपेट में आए थे। कोर्ट ने 2024 की डीआरएम रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा कि यह घटना के पांच साल बाद तैयार की गई थी। भोला बनाम भारत संघ मामले का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने कहा:
“ऐसी विलंबित जांच, जो घटना के काफी समय बाद और दावा कार्यवाही शुरू होने के बाद की गई हो, समकालीन आधार (contemporaneous basis) की कमी रखती है और इसे उचित साक्ष्य मूल्य नहीं दिया जा सकता…”
शव मिलने में हुई देरी पर कोर्ट ने श्री सुरेंद्र प्रसाद वर्मा बनाम भारत संघ मामले का उल्लेख किया और कहा कि केवल शव मिलने में देरी होना आकस्मिक गिरावट (accidental fall) के मामले को गलत ठहराने का आधार नहीं हो सकता।
‘वैध यात्री’ होने पर स्पष्टीकरण: टिकट न मिलने के मुद्दे पर कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के भारत संघ बनाम रीना देवी मामले के ऐतिहासिक फैसले का जिक्र किया। कोर्ट ने कहा कि दावेदार हलफनामे के जरिए अपनी बात रख सकता है, जिसके बाद जिम्मेदारी रेलवे पर आ जाती है कि वह इसे गलत साबित करे। कोर्ट ने कहा:
“…केवल टिकट की बरामदगी न होना, अपने आप में मुआवजा देने से इनकार करने के लिए निर्णायक नहीं माना जा सकता।”
कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि मृतक के शरीर पर ‘राखी’ मिली थी, जो इस गवाही की पुष्टि करती है कि वे अपनी बहन से मिलने गए थे।
सख्त दायित्व (Strict Liability): जस्टिस ओहरी ने जोर दिया कि रेलवे अधिनियम की धारा 124-ए एक कल्याणकारी प्रावधान है। भारत संघ बनाम प्रभाकरन विजया कुमार मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया:
“…एक बार जब ‘अप्रिय घटना’ का होना स्थापित हो जाता है, तो रेलवे की जिम्मेदारी सख्त (strict liability) होती है, जब तक कि मामला वैधानिक अपवादों के अंतर्गत न आए।”
कोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रिब्यूनल ने परिस्थितियों को नजरअंदाज करते हुए केवल अनुमानों पर भरोसा करने की गलती की है। अदालत ने ट्रिब्यूनल के आदेश को रद्द कर दिया और मामले को वापस ट्रिब्यूनल को भेजते हुए निर्देश दिया कि दो महीने के भीतर मुआवजे की राशि का निर्धारण और वितरण किया जाए। सभी पक्षों को 11 मई, 2026 को ट्रिब्यूनल के समक्ष पेश होने का निर्देश दिया गया है।
मामले का विवरण:
- केस टाइटल: श्रीमती राज कुमारी एवं अन्य बनाम भारत संघ
- केस नंबर: FAO 352/2025
- पीठ: जस्टिस मनोज कुमार ओहरी
- दिनांक: 27 अप्रैल, 2026

