नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में हाईकोर्ट ने बरकरार रखी 10 साल की सजा; कहा- उम्र तय करने के लिए स्कूल के दस्तावेज विश्वसनीय प्रमाण

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने नाबालिग से दुष्कर्म के दोषी व्यक्ति की अपील को खारिज करते हुए उसकी 10 साल की कठोर कारावास की सजा को बरकरार रखा है। जस्टिस आशीष नैथानी की एकल पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष ने बिना किसी संदेह के अपना केस साबित किया है।

कोर्ट ने अपने फैसले में एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु को रेखांकित किया कि पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत पीड़िता की उम्र निर्धारित करने के लिए स्कूल रिकॉर्ड एक वैध और विश्वसनीय साक्ष्य हैं। अदालत ने यह भी साफ किया कि यौन हमले के मामलों में केवल मेडिकल रिपोर्ट में चोट के निशान न होना या कोई निर्णायक मेडिकल राय न होना, पीड़िता के विश्वसनीय बयान को झुठला नहीं सकता।

यह मामला ऊधम सिंह नगर जिले का है, जहां एक व्यक्ति पर नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म करने का आरोप लगा था। अक्टूबर 2021 में, जिला अदालत ने आरोपी को यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत दोषी करार देते हुए 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। दोषी ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उसकी मुख्य दलील यह थी कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी।

अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि पीड़िता की उम्र से संबंधित मेडिकल जांच की अनुपस्थिति ने मामले को कमजोर कर दिया है। बचाव पक्ष का दावा था कि स्कूल के रिकॉर्ड में जन्मतिथि दर्ज करने का कोई ठोस आधार नहीं दिखाया गया। इसके अलावा, बचाव पक्ष ने एफआईआर (FIR) की विश्वसनीयता और पीड़िता की गवाही पर भी सवाल उठाए। उन्होंने दलील दी कि पीड़िता के शरीर पर चोट के निशान न होना आरोपों की सच्चाई पर संदेह पैदा करता है।

जस्टिस आशीष नैथानी ने सबूतों का गहन विश्लेषण करने के बाद इन दलीलों को खारिज कर दिया। उम्र के विवाद पर कोर्ट ने कहा कि ट्रायल के दौरान पेश किए गए स्कूल रिकॉर्ड का अपना साक्ष्य मूल्य (evidentiary value) होता है और उम्र निर्धारण के लिए उन पर भरोसा किया जा सकता है। बेंच ने इस बात पर गौर किया कि बचाव पक्ष स्कूल रिकॉर्ड को चुनौती देने के लिए कोई भी ठोस सबूत या खंडन पेश करने में असमर्थ रहा।

मेडिकल साक्ष्यों की भूमिका स्पष्ट करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में मेडिकल रिपोर्ट केवल ‘संवैधानिक’ (corroborative) प्रकृति की होती है। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि यदि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय और सच्ची पाई जाती है, तो केवल शारीरिक चोटों की कमी या किसी निर्णायक मेडिकल राय के अभाव में यौन उत्पीड़न के मामले को खारिज नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष का मामला पूरी तरह मजबूत है और इसमें हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है। अदालत ने जिला कोर्ट द्वारा अक्टूबर 2021 में दिए गए सजा के आदेश की पुष्टि की। इस फैसले के साथ ही दोषी की 10 साल की कठोर कारावास की सजा प्रभावी रहेगी।

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