इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 323 के साथ धारा 149 के तहत एक अपीलकर्ता की सजा को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब सजा पाने वाले व्यक्तियों की संख्या ‘गैरकानूनी सभा’ (unlawful assembly) के लिए आवश्यक न्यूनतम पांच सदस्यों से कम हो जाती है, तो धारा 149 के तहत प्रतिस्थानी दायित्व (vicarious liability) के आधार पर सजा को बरकरार नहीं रखा जा सकता।
मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति समित गोपाल ने इस बात पर जोर दिया कि आईपीसी की धारा 141 के तहत परिभाषित ‘गैरकानूनी सभा’ का अस्तित्व धारा 149 को लागू करने के लिए एक अनिवार्य शर्त है। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहता है कि सभा गैरकानूनी थी (जिसमें पांच या उससे अधिक व्यक्ति शामिल हों), तो धारा 149 के तहत आरोप स्वतः ही विफल हो जाएगा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 13 मार्च 1986 को जनपद बस्ती में हुई एक घटना से संबंधित है। शिकायतकर्ता रामदास उपाध्याय ने आरोप लगाया था कि भूमि विवाद के चलते राम पलट और छह अन्य लोगों ने उनके बेटे रघुवंश उपाध्याय पर हमला किया था। आरोप था कि लाठी-डंडों से लैस अभियुक्तों ने पीड़ितों के साथ मारपीट की और उनके कीमती सामान, जेवर और नगदी छीन लिए।
सत्र न्यायालय में सात अभियुक्तों के खिलाफ आईपीसी की धारा 147, 307/149 और 379 के तहत मुकदमा चला। सुनवाई के दौरान:
- एक अभियुक्त राजाराम की मृत्यु हो गई और उसके खिलाफ कार्यवाही समाप्त कर दी गई।
- चार अन्य अभियुक्तों (पारस नाथ, सुरेश, माता बदल और बिगरेल उर्फ जनार्दन) को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।
- शेष दो अभियुक्तों, राम पलट और बिग्रंछू को मुख्य आरोपों से तो बरी कर दिया गया, लेकिन बस्ती के पांचवें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने उन्हें 3 मई 1989 को धारा 323/149 के तहत दोषी ठहराया।
इसके बाद अभियुक्तों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अपील लंबित रहने के दौरान राम पलट की मृत्यु हो गई, जिसके बाद अपील केवल बिग्रंछू के लिए ही जारी रही।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि धारा 149 की सहायता से दी गई सजा पूरी तरह से अवैध है। उन्होंने दलील दी कि कानूनन एक गैरकानूनी सभा में कम से कम पांच व्यक्ति होने चाहिए। चूंकि चार अभियुक्त बरी हो चुके हैं और एक की मृत्यु हो गई, इसलिए केवल दो व्यक्तियों को धारा 323/149 के तहत दोषी ठहराना कानूनी रूप से गलत है।
राज्य की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता (ए.जी.ए.) ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि मूल रूप से सात लोगों को नामजद किया गया था। राज्य ने तर्क दिया कि घायल गवाह की मौजूदगी घटना की पुष्टि करती है और अभियुक्तों को सौंपी गई विशिष्ट भूमिकाओं के कारण उनकी सजा उचित है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण नजीरें
हाईकोर्ट ने अपना विश्लेषण आईपीसी की धारा 141 और धारा 149 की कानूनी सीमाओं पर केंद्रित किया। न्यायमूर्ति गोपाल ने टिप्पणी की:
“गैरकानूनी सभा के गठन के लिए मुख्य और महत्वपूर्ण तत्वों में से एक यह है कि उक्त सभा में 5 (पांच) या उससे अधिक व्यक्ति होने चाहिए।”
हाईकोर्ट ने धारा 149 की व्याख्या के लिए सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों का हवाला दिया:
- मोहन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1962): पांच जजों की बेंच ने कहा था कि जैसे ही पांच नामित व्यक्तियों में से दो को बरी कर दिया जाता है, सभा में केवल तीन सदस्य रह जाते हैं, जिसे कानूनन गैरकानूनी सभा नहीं माना जा सकता।
- सुबरन बनाम केरल राज्य (1993): सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पांच से कम सदस्यों वाली सभा गैरकानूनी नहीं है, इसलिए धारा 149 की मदद से सजा का आधार नहीं बन सकती।
- महेंद्र बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2022): कोर्ट ने दोहराया कि जब विशिष्ट नामजद सह-अभियुक्तों को बरी कर दिया जाता है, तो शेष अभियुक्तों पर धारा 149 लगाना तब तक संभव नहीं है जब तक कि उनकी संख्या पांच न हो।
हाईकोर्ट ने गौर किया कि इस मामले में अभियोजन पक्ष ने किसी अज्ञात व्यक्ति की संलिप्तता का आरोप नहीं लगाया था। चूंकि निचली अदालत ने छह में से चार लोगों को बरी कर दिया था, इसलिए केवल दो व्यक्ति ही शेष बचे थे।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चार सह-अभियुक्तों के बरी होने के बाद अपीलकर्ता पर धारा 149 लागू नहीं होती। फैसले में कहा गया:
“यह न्यायालय मानता है कि अभियुक्तों-अपीलकर्ताओं को धारा 149 आईपीसी की सहायता से दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि निचली अदालत द्वारा केवल दो (2) अभियुक्तों को दोषी ठहराया गया था। इस प्रकार यह न्यायालय पाता है कि विवादित निर्णय और आदेश पूरी तरह से अवैध है।”
परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए जीवित अपीलकर्ता बिग्रंछू को बरी कर दिया और उनके जमानत बांड रद्द करने के आदेश दिए।
मामले का विवरण:
- केस टाइटल: राम पलट एवं अन्य बनाम राज्य
- केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 1158/1989
- बेंच: न्यायमूर्ति समित गोपाल
- तारीख: 24 अप्रैल, 2026

