इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी भी नाबालिग बच्चे के मामले में उसका कल्याण और सर्वोत्तम हित ही सर्वोपरि है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे का हित माता-पिता के कानूनी अधिकारों सहित अन्य सभी विचारों से ऊपर होना चाहिए। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने 10 वर्षीय बालक की कस्टडी उसकी मां को सौंपने का आदेश दिया है, क्योंकि बच्चे का पिता गंभीर रूप से शराब का आदी, शारीरिक रूप से अस्वस्थ और आर्थिक रूप से दूसरों पर निर्भर पाया गया।
यह मामला एक महिला द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका के जरिए कोर्ट पहुँचा था। गौतम बुद्ध नगर की रहने वाली याचिकाकर्ता मां, जो पेशे से एक योग्य चिकित्सा पेशेवर है, ने मेरठ में अपने पिता के पास रह रहे अपने नाबालिग बेटे की कस्टडी मांगी थी। मामले का मुख्य कानूनी बिंदु यह तय करना था कि माता-पिता के बीच चल रहे आपसी विवाद के बीच बच्चे के भविष्य और उसके सर्वोत्तम हितों की रक्षा कौन बेहतर तरीके से कर सकता है।
याचिकाकर्ता मां ने कोर्ट में दलील दी कि वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर है और अपने बेटे की उच्च शिक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि उन्होंने शैक्षणिक सत्र 2026-2027 के लिए शिमला के प्रतिष्ठित ‘बिशप कॉटन स्कूल’ में कक्षा 5 में बच्चे का प्रवेश सुनिश्चित कर लिया है, जिसके लिए उन्होंने लगभग 17 लाख रुपये का खर्च भी वहन किया है।
दूसरी ओर, पिता ने बच्चे को अपने पास रखने की मांग की। हालांकि, सुनवाई के दौरान सामने आए रिकॉर्ड से पता चला कि पिता लंबे समय से शराब की लत से जूझ रहा है और उसका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं है। कोर्ट को बताया गया कि 12 जनवरी, 2025 को पिता का लिवर ट्रांसप्लांट हुआ था। इसके अलावा, यह भी सामने आया कि वह आर्थिक रूप से अपनी मां (बच्चे की दादी) पर निर्भर है, जिन्होंने उसके इलाज का सारा खर्च उठाया था।
मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति संदीप जैन ने इस कानूनी सिद्धांत पर जोर दिया कि कस्टडी के मामलों में बच्चे का हित ही सबसे महत्वपूर्ण होता है।
कोर्ट ने कहा, “यह कानून का एक सुस्थापित सिद्धांत है कि नाबालिग की कस्टडी से संबंधित मामलों में, बच्चे का कल्याण और सर्वोत्तम हित ही सर्वोपरि विचार है, जिसे माता-पिता के कानूनी अधिकारों सहित अन्य सभी विचारों पर प्राथमिकता मिलनी चाहिए।”
जज ने व्यक्तिगत रूप से नाबालिग बच्चे से बातचीत की और उपलब्ध साक्ष्यों का अध्ययन करने के बाद पिता की जीवनशैली और स्वास्थ्य पर गंभीर चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने अपने आदेश में दर्ज किया:
“रिकॉर्ड से पता चलता है कि पिता पुरानी शराब की लत से पीड़ित है, उसका लिवर ट्रांसप्लांट हो चुका है… और वह आर्थिक रूप से दूसरों पर निर्भर है। ऐसी परिस्थितियों में, नाबालिग की कस्टडी पिता को सौंपना बच्चे के समग्र कल्याण, स्थिरता और दीर्घकालिक विकास के लिए अनुकूल नहीं होगा।”
कोर्ट ने यह भी माना कि मां द्वारा की गई शिक्षा की व्यवस्था बच्चे के उज्ज्वल भविष्य के लिए बेहतर है।
गुरुवार को याचिका का निपटारा करते हुए हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि नाबालिग की कस्टडी तत्काल प्रभाव से मां को सौंप दी जाए। हालांकि, कोर्ट ने बच्चे के पिता के साथ भावनात्मक जुड़ाव को बनाए रखने के लिए पिता को मुलाकात का अधिकार (Visitation Rights) भी दिया है।
कोर्ट ने आदेश दिया कि दोनों माता-पिता महीने में एक बार, संयुक्त रूप से या व्यक्तिगत रूप से, शिमला स्थित स्कूल परिसर में एक सौहार्दपूर्ण माहौल में बच्चे से मिल सकेंगे। कोर्ट ने बिशप कॉटन स्कूल, शिमला के हेडमास्टर को निर्देश दिया है कि वे इस मुलाकात में बिना किसी बाधा के सहयोग करें।

