मालदा में न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाने का मामला: सुप्रीम कोर्ट ने एनआईए को चार्जशीट दाखिल करने की दी अनुमति

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में सात न्यायिक अधिकारियों को भीड़ द्वारा अवैध रूप से बंधक बनाने के “सनसनीखेज” मामले में जांच पूरी होने के बाद चार्जशीट दाखिल करने की अनुमति दे दी है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम पांचोली की तीन न्यायाधीशों वाली पीठ ने यह निर्देश एनआईए द्वारा जांच की प्रगति पर दी गई जानकारी के बाद दिया। अदालत ने इस दौरान राज्य में चुनावी ड्यूटी पर तैनात सैकड़ों न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया।

यह घटना 1 अप्रैल की रात की है, जब मालदा में एक उग्र भीड़ ने तीन महिलाओं और एक पांच साल के बच्चे सहित सात न्यायिक अधिकारियों को नौ घंटे से अधिक समय तक अवैध रूप से कैद में रखा था। इस दौरान अधिकारियों को भोजन और पानी तक नसीब नहीं हुआ।

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कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा इस “खौफनाक” घटना का विवरण देते हुए लिखे गए पत्र पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान (suo motu) लिया था। ये अधिकारी ‘विशेष गहन संशोधन’ (SIR) प्रक्रिया के हिस्से के रूप में वहां तैनात थे, जहां वे मतदाता सूची से बाहर किए गए 60 लाख से अधिक लोगों की आपत्तियों का निपटारा कर रहे थे।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर और चुनाव आयोग की शिकायत के बाद इस मामले की जांच एनआईए को सौंपी गई थी।

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शुक्रवार की सुनवाई के दौरान, एनआईए की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने जांच की वर्तमान स्थिति पर एक नई स्टेटस रिपोर्ट पेश की। उन्होंने पीठ को बताया कि आने वाले हफ्तों में जांचकर्ता पूरी तरह से जांच में व्यस्त रहेंगे।

अदालत ने इन दलीलों को स्वीकार करते हुए कहा, “एनआईए सक्षम क्षेत्राधिकार वाली अदालत में चार्जशीट दाखिल करने के लिए स्वतंत्र होगी।” साथ ही, एजेंसी को फिलहाल अगली स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने से भी छूट दे दी गई है।

सुप्रीम कोर्ट इस मामले में भीड़ के पीछे के असल उद्देश्यों और राजनीतिक संलिप्तता की गहराई से जांच कर रहा है। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने सवाल किया कि क्या गिरफ्तार किए गए लोगों का कोई राजनीतिक बैकग्राउंड है। उन्होंने स्पष्ट किया कि “इस मामले को तार्किक निष्कर्ष तक ले जाना जरूरी है।”

न्यायपालिका की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए, पीठ ने 13 अप्रैल को यह स्पष्ट कर दिया था कि पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया में लगे सभी न्यायिक अधिकारियों को प्रदान किया गया सुरक्षा घेरा आगामी विधानसभा चुनाव संपन्न होने तक जारी रहेगा। सुप्रीम कोर्ट की पूर्व अनुमति के बिना इस सुरक्षा को नहीं हटाया जा सकता।

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