35 साल की देरी: सुप्रीम कोर्ट ने 1989 के दंगे के मामले में पुलिस अधिकारी के खिलाफ कार्यवाही पर लगाई रोक

सुप्रीम कोर्ट ने एक पुलिस अधिकारी के खिलाफ 35 साल पुराने आपराधिक मामले में हस्तक्षेप करते हुए कार्यवाही पर रोक लगा दी है। यह मामला 1989 में हुए दंगों और मारपीट से जुड़ा है। कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि वह केवल अत्यधिक देरी के आधार पर ही इस मामले को रद्द करने के पक्ष में है, क्योंकि साढ़े तीन दशकों में अब तक अभियोजन पक्ष के एक भी गवाह का बयान दर्ज नहीं किया गया है।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने पुलिस अधिकारी कैलाश चंद्र कापरी की याचिका पर उत्तराखंड सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। कापरी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया था।

यह कानूनी विवाद साल 1989 का है, जब प्रयागराज के जीआरपी रामबाग थाने में एक एफआईआर दर्ज की गई थी। कैलाश चंद्र कापरी पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 147 (बलवा), 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना) और 504 (शांति भंग करने के इरादे से अपमान) के साथ-साथ रेलवे अधिनियम की धारा 120 के तहत आरोप लगाए गए थे।

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सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि इस मामले में कुल पांच लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई थी। इनमें से दो आरोपियों की मृत्यु हो चुकी है, जबकि दो अन्य को पहले ही बरी किया जा चुका है। अन्य आरोपियों के बरी होने का मुख्य कारण यह था कि अभियोजन पक्ष मौखिक साक्ष्य दर्ज कराने के लिए किसी भी गवाह को पेश करने में विफल रहा।

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि ट्रायल में इतनी लंबी देरी न्याय प्रक्रिया के उद्देश्यों के खिलाफ है। बेंच ने कहा कि बिना किसी प्रगति के 35 साल बीत जाना अपने आप में कार्यवाही खत्म करने का एक मजबूत आधार है।

बेंच ने कहा, “इस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, और विशेष रूप से इस बात को ध्यान में रखते हुए कि लगभग 35 वर्ष बीत चुके हैं, हम केवल इसी आधार पर कार्यवाही को रद्द करने के पक्ष में हैं।”

हालांकि, कोर्ट ने मामले को अंतिम रूप से रद्द करने से पहले राज्य सरकार का पक्ष सुनना जरूरी समझा है। फिलहाल कार्यवाही पर रोक लगाते हुए मामले की अगली सुनवाई 29 अप्रैल के लिए तय की गई है।

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