इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने अस्पतालों में वेंटिलेटर की कमी और उनकी उपलब्धता को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अगर मरीजों को आपात स्थिति में जीवन रक्षक उपकरण समय पर नहीं मिलते, तो सरकार द्वारा पेश किए गए आंकड़ों का कोई मतलब नहीं रह जाता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य का ध्यान केवल नियमों को पूरा करने पर नहीं, बल्कि इस बात पर होना चाहिए कि वेंटिलेटर की कमी के कारण किसी की जान न जाए।
जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मनजीवे शुक्ला की खंडपीठ ने सरकार द्वारा पेश किए गए आंकड़ों की व्यावहारिक उपयोगिता पर सवाल उठाए। हाईकोर्ट ने पूछा कि क्या राज्य का कोई भी अस्पताल हलफनामे (affidavit) पर यह आश्वासन दे सकता है कि जरूरत पड़ने पर मरीज को तुरंत वेंटिलेटर उपलब्ध कराया जाएगा?
कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि ऐसा कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया जा सकता, तो वेंटिलेटर की संख्या के आंकड़े अर्थहीन हैं। खंडपीठ ने यह भी पाया कि राज्य में वेंटिलेटर की वास्तविक मांग का आकलन करने और उपचार के लिए आवश्यक उपकरणों की सटीक संख्या निर्धारित करने के लिए किसी प्रभावी तंत्र का अभाव है।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को अपनी स्वास्थ्य रणनीति पर पुनर्विचार करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) के उन न्यूनतम मानकों पर संतोष करना पर्याप्त नहीं है, जिसके तहत अस्पताल के कुल बेड का केवल 10-15 प्रतिशत वेंटिलेटर रखना अनिवार्य है।
साथ ही, बेंच ने जोर दिया कि सुपर-स्पेशियलिटी स्वास्थ्य सुविधाएं केवल लखनऊ तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। आम नागरिकों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं की समान पहुंच सुनिश्चित करने के लिए इन सुविधाओं का विस्तार अन्य जिलों में भी किया जाना अनिवार्य है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े अन्य गंभीर पहलुओं पर भी ध्यान केंद्रित किया:
- नियामक ढांचा: बेंच ने राज्य सरकार से पूछा कि क्या निजी अस्पतालों और क्लीनिकों द्वारा ली जाने वाली फीस और उनकी सेवाओं की निगरानी के लिए कोई प्रभावी रेगुलेटरी फ्रेमवर्क मौजूद है।
- वेतन विसंगति: कोर्ट ने सरकारी डॉक्टरों के कम वेतन पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इसी वजह से डॉक्टर निजी अस्पतालों की ओर पलायन कर रहे हैं, जिसका सीधा असर सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहा है।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए आवंटित कुल बजट का विवरण देने और चिकित्सा बुनियादी ढांचे की वर्तमान स्थिति पर विस्तृत रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं।
इस मामले में नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) और केंद्र सरकार को भी पक्षकार बनाते हुए नोटिस जारी किए गए हैं। मामले की अगली सुनवाई 25 मई को होगी।

