इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने 1989 के एक दहेज मृत्यु मामले में चार व्यक्तियों की सजा और दोषसिद्धि को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष एफआईआर दर्ज करने में हुई नौ दिनों की देरी का कोई ठोस कारण नहीं बता सका। इसके अलावा, चश्मदीद गवाहों के बयान मेडिकल रिपोर्ट से मेल नहीं खा रहे थे।
जस्टिस बृज राज सिंह ने हरदोई के चौथे एडिशनल सेशन्स जज द्वारा 1991 में पारित उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसके तहत आरोपियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498-A और 304-B के तहत सजा सुनाई गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 8 अगस्त 1989 का है, जब श्रीमती बिटाना की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो गई थी। बिटाना का विवाह लगभग ढाई साल पहले आरोपी विजय पाल से हुआ था। मृतका की मां (शिकायतकर्ता श्रीमती जगदेवी) का आरोप था कि दहेज में भैंस, साइकिल और मसहरी की मांग को लेकर बिटाना को प्रताड़ित किया जा रहा था।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि घटना की रात उन्हें बेटी की मौत की सूचना मिली। उन्होंने दावा किया कि लाला राम (गवाह संख्या-3) जैसे गवाहों ने आरोपियों को लाठी से गला घोंटते हुए देखा था। हालांकि, मौत 8 अगस्त को हुई और पंचनामा भी उसी दिन भर लिया गया, लेकिन एफआईआर 17 अगस्त 1989 को पुलिस अधीक्षक के हस्तक्षेप के बाद ही दर्ज की गई।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं के वकील श्री अजय कुमार सिंह ने तर्क दिया कि एफआईआर में नौ दिनों की देरी अभियोजन की कहानी को संदिग्ध बनाती है। उन्होंने पोस्टमार्टम रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि मौत का कारण “फांसी (hanging)” था और शरीर पर लिगेचर मार्क के अलावा कोई अन्य चोट नहीं पाई गई। यह तथ्य लाठी से गला घोंटने के अभियोजन के दावे का पूरी तरह खंडन करता है। साथ ही, उन्होंने दलील दी कि गवाह लाला राम और हरि सिंह का आरोपियों से पुराना कानूनी विवाद था, जिससे वे “द्वेषपूर्ण गवाह” की श्रेणी में आते हैं।
वहीं, सरकारी वकील (AGA) श्री पीयूष कुमार सिंह ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि सात गवाहों ने मामले की पुष्टि की है और अभियोजन की कहानी मेडिकल रिपोर्ट से समर्थित है, इसलिए कोर्ट को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने मुख्य रूप से तीन बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित किया: एफआईआर में देरी, गवाहों के बयानों में विरोधाभास और गवाहों की निष्पक्षता।
देरी के मुद्दे पर कोर्ट ने कहा कि जब मृतका के परिजन पंचनामे के समय मौजूद थे, तो रिपोर्ट दर्ज करने में नौ दिन क्यों लगे? रमैया उर्फ रामा बनाम कर्नाटक राज्य (2014) और बाबू बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2013) का संदर्भ देते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“अन्य साक्ष्यों के साथ देखने पर एफआईआर में देरी घातक नजर आती है… जो अभियोजन की कहानी की सत्यता को झकझोर देती है।”
मेडिकल साक्ष्य पर कोर्ट ने पाया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट गवाहों के मौखिक बयानों के विपरीत है। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“पूरा मामला विरोधाभासों के कारण बिखर गया है। गवाहों ने बाद में अपनी कहानी सिर्फ इसलिए बदल ली ताकि उसे अभियोजन के अनुकूल बनाया जा सके।”
कोर्ट ने गवाहों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए। राजू उर्फ बालचंद्रन बनाम तमिलनाडु राज्य (2012) और प्रह्लाद बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2024) का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि “दुश्मनी एक दोधारी तलवार है” और ऐसे गवाहों के बयानों की जांच बहुत सावधानी से की जानी चाहिए।
अदालत का निर्णय
कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य पेश करने में विफल रहा। धारा 498-A और 304-B के आवश्यक तत्व साबित नहीं हुए, क्योंकि मौत से पहले दहेज की मांग की कोई भी पूर्व रिपोर्ट दर्ज नहीं थी।
कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए 30 जुलाई 1991 के सजा के आदेश को रद्द कर दिया। विजय पाल, मदन पाल, जगन्नाथ और जगत राम के बेल बॉन्ड निरस्त कर उन्हें आरोप मुक्त कर दिया गया। अपील के दौरान ही दो अन्य आरोपियों, देश राज और श्रीमती राम देवी की मृत्यु हो चुकी थी।
केस विवरण
केस टाइटल: विजय पाल और अन्य बनाम राज्य
केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 392 ऑफ 1991
बेंच: जस्टिस बृज राज सिंह
तारीख: 21.04.2026

