‘हम सरकार नहीं चला रहे’: एलपीजी किल्लत पर दिल्ली हाईकोर्ट का दखल से इनकार, पश्चिम एशिया युद्ध को बताया वजह

दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को देश में घरेलू एलपीजी सिलेंडरों की कथित “भारी कमी” को लेकर दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने कहा कि संसाधनों की आपूर्ति सुनिश्चित करना सरकार के कार्यक्षेत्र का मामला है। अदालत ने मौजूदा संकट के लिए पश्चिम एशिया में जारी युद्ध की स्थिति को एक प्रमुख कारण बताया।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका आर्थिक नीतियों, जैसे किसी वस्तु के आयात, निर्यात या वितरण के संबंध में ऐसे निर्देश जारी नहीं कर सकती जिनका कोई ठोस परिणाम न निकले, विशेषकर तब जब केंद्र सरकार ने संकट से निपटने के लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम (Essential Commodities Act) के तहत पहले ही विभिन्न आदेश जारी कर रखे हैं।

याचिकाकर्ता ने घरेलू एलपीजी सिलेंडरों की अनुपलब्धता के कारण उत्पन्न गंभीर संकट का हवाला देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिका में आरोप लगाया गया था कि सिलेंडरों की कमी से करोड़ों परिवार प्रभावित हो रहे हैं और कालाबाजारी के कारण सिलेंडर ₹5,000 तक की ऊंची कीमतों पर बेचे जा रहे हैं। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि अदालत सरकार को नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने का आदेश (mandamus) दे, एलपीजी के निर्यात पर रोक लगाए और स्थिति की निगरानी के लिए एक न्यायिक समिति का गठन करे।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि केंद्र सरकार अपने नागरिकों को बुनियादी कुकिंग फ्यूल उपलब्ध कराने के कर्तव्य में विफल रही है। उन्होंने दावा किया कि भारत के 75% परिवार एलपीजी पर निर्भर हैं और यहां तक कि हाईकोर्ट की कैंटीन भी इस कमी का शिकार हुई है।

इस पर हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता से पूछा कि वह ऐसा कौन सा कानून दिखा सकते हैं जो सरकार पर यह “कर्तव्य” थोपता है कि वह वैश्विक संसाधनों की कमी के बावजूद हर परिवार को नियमित रूप से सिलेंडरों की आपूर्ति सुनिश्चित करे।

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पीठ ने कार्यपालिका के कार्यों में हस्तक्षेप की मांग करने पर याचिकाकर्ता की कड़ी आलोचना की। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की, “क्या हम सरकार चला रहे हैं? हम ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं करते।”

वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की जटिलताओं का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा:

“ये ऐसे मामले हैं जिनसे कार्यपालिका को निपटना है, जिसमें न केवल मांग बल्कि आपूर्ति पक्ष की समस्याओं और मौजूदा परिस्थितियों पर विचार करना होता है। ऐसी स्थिति में ‘मैंडेमस’ जारी नहीं किया जा सकता। आप हमसे वैसे ही निर्देश मांग रहे हैं जैसे ‘गरीबी मिटाओ’। ऐसे मामलों में सरकार या तेल कंपनियों का दायित्व उपलब्ध संसाधनों पर निर्भर करता है।”

निर्यात पर रोक लगाने की मांग पर पीठ ने कहा कि आर्थिक नीतियां न्यायिक समीक्षा का विषय नहीं हैं:

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“आप क्या कह रहे हैं? क्या हम यहां यह तय करने के लिए बैठे हैं कि किसी वस्तु का निर्यात किया जाना चाहिए, आयात किया जाना चाहिए, उसे जमा किया जाना चाहिए या गोदामों में रखा जाना चाहिए या जारी किया जाना चाहिए? ये कार्यपालिका के कार्य हैं। ये आर्थिक नीतियां हैं। हम इन सब पर इतने सरल तरीके से विचार नहीं कर सकते।”

कोर्ट ने देश में एलपीजी उपयोगकर्ताओं के प्रतिशत के दावे को भी खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता देश की “विशालता” से वाकिफ नहीं हैं, क्योंकि आज भी दूर-दराज के इलाकों में लोग पारंपरिक ईंधन का उपयोग कर रहे हैं। हाईकोर्ट कैंटीन के संबंध में कोर्ट ने बताया कि वहां पीएनजी (PNG) कनेक्शन की व्यवस्था कर दी गई है।

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हाईकोर्ट ने याचिका को यह कहते हुए बंद कर दिया कि स्थिति किसी से छिपी नहीं है और सरकार द्वारा जो भी संभव कदम उठाए जा सकते थे, वे पहले ही उठाए जा चुके हैं। न्यायिक समिति बनाने के अनुरोध को खारिज करते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ता को संबंधित अधिकारियों के समक्ष अपनी बात रखने की छूट दी। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि ऐसी कोई शिकायत या प्रतिवेदन दिया जाता है, तो अधिकारी उस पर विचार करेंगे।

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