सुप्रीम कोर्ट ने ‘ट्रांसफर’ और ‘कैडर परिवर्तन’ के बीच कानूनी अंतर स्पष्ट किया; उत्तराखंड कैडर आवंटन विवाद में कर्मचारी के पक्ष में सुनाया फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड में कैडर परिवर्तन की मांग करने वाले एक कर्मचारी की अपील स्वीकार कर ली है। कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2018 के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें कर्मचारी की याचिका खारिज कर दी गई थी। कोर्ट ने माना कि अपीलकर्ता अपने मूल चयन विकल्प, निवास स्थान (डोमिसाइल) और अपने मानसिक रूप से दिव्यांग बेटे की स्थिति के आधार पर उत्तराखंड कैडर पाने का हकदार है।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता, राजेंद्र सिंह बोरा, 1995 में उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग द्वारा आयोजित ‘कंबाइंड लोअर सबोर्डिनेट सर्विस’ परीक्षा में शामिल हुए थे। उन्होंने 900 में से 672 अंक प्राप्त किए थे और ‘पहाड़ी क्षेत्र’ (अब उत्तराखंड) में तैनाती का विकल्प चुना था। हालांकि, आवेदन पत्र के साथ बी.एड की मार्कशीट संलग्न न करने के कारण उन्हें शुरुआत में नियुक्ति नहीं दी गई, जबकि उन्होंने इंटरव्यू के समय इसे प्रस्तुत कर दिया था।

लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, 2004 में हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने उनकी याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि दूरदराज के इलाकों से आने वाले उम्मीदवारों के प्रति “अति-तकनीकी दृष्टिकोण” (hyper-technical view) नहीं अपनाना चाहिए। राज्य की अपील 2009 में खारिज होने के बाद, उन्हें अंततः 2011 में नियुक्त किया गया, जो जून 1997 से काल्पनिक (notional) रूप से प्रभावी थी। नियुक्ति के बाद, उन्होंने उत्तराखंड कैडर में स्थानांतरण के लिए कई आवेदन दिए, लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने उन पर कोई कार्रवाई नहीं की।

2018 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनकी याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि एक बार उत्तर प्रदेश सेवा आवंटित होने के बाद, उत्तराखंड में ट्रांसफर का प्रश्न ही नहीं उठता।

कोर्ट का विश्लेषण: ट्रांसफर बनाम कैडर परिवर्तन

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमी कापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने हाईकोर्ट के निष्कर्षों से असहमति जताई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘ट्रांसफर’ और ‘कैडर परिवर्तन’ दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं।

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कोर्ट ने कहा:

“ट्रांसफर का अर्थ एक ही कैडर या सेवा के भीतर कर्मचारी की तैनाती के स्थान में परिवर्तन से है। व्यक्ति उसी सेवा संरचना का हिस्सा बना रहता है… इसके विपरीत, कैडर में बदलाव में एक कैडर से दूसरे कैडर में स्थानांतरण शामिल होता है और इसलिए, यह उस ढांचे को ही बदल देता है जिसके भीतर कर्मचारी की सेवा विनियमित होती है। यह केवल स्थान परिवर्तन नहीं है बल्कि एक संरचनात्मक परिवर्तन है जो वरिष्ठता, पदोन्नति के अवसरों और लागू सेवा शर्तों को प्रभावित कर सकता है।”

पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि जहां ट्रांसफर प्रशासनिक सुविधा का मामला है, वहीं कैडर परिवर्तन कर्मचारी की “सेवा पहचान” (service identity) के पुनर्गठन से जुड़ा है।

कैडर आवंटन के मानदंड

सुप्रीम कोर्ट ने कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि कैडर आवंटन तीन मानदंडों पर आधारित होता है: विकल्प (option), निवास (domicile) और वरिष्ठता।

अदालत ने पाया कि अपीलकर्ता इन आधारों पर पात्र थे:

  1. विकल्प और निवास: उन्होंने मूल रूप से पहाड़ी कैडर चुना था और वे वर्तमान उत्तराखंड के निवासी हैं।
  2. चिकित्सा आधार (Medical Hardship): आवंटन नीति में उन परिवारों के लिए अपवाद है जहाँ परिवार का सदस्य ‘मानसिक बीमारी’ से ग्रस्त हो। अपीलकर्ता का बेटा संज्ञानात्मक रूप से दिव्यांग (cognitively challenged) है, जो नीति के तहत कर्मचारी को उसके चुने हुए विकल्प के अनुसार आवंटन का अधिकार देता है।
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राज्य की उदासीनता पर कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हुए विलंब पर “गहरी पीड़ा” व्यक्त की। कोर्ट ने कहा कि 1997 में पात्र होने के बावजूद अपीलकर्ता को 2011 में नियुक्ति मिली और 2026 तक वह अपने अधिकारों के लिए लड़ रहा है।

जस्टिस करोल ने टिप्पणी की:

“यह राज्य की ओर से घोर उदासीनता (apathy) के अलावा और कुछ नहीं है… यदि हम नियुक्ति तक के शुरुआती कुछ वर्षों को छोड़ भी दें, तो भी 22 साल बीत चुके हैं। वह पूरा समय जब परिवार के करीब रहना उनके बेटे के पालन-पोषण में बड़ा सहारा होता, उन्होंने कम से कम 2011 से परिवार से दूर बिताया है।”

अदालत का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वे अपीलकर्ता का उत्तराखंड राज्य में कैडर पुन: आवंटन “तत्काल” सुनिश्चित करें। कोर्ट ने उनकी वरिष्ठता और सभी प्रासंगिक लाभों को सुरक्षित रखने का भी आदेश दिया।

इसके अतिरिक्त, कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 1,00,000 रुपये का जुर्माना (costs) लगाया, जिसे चार सप्ताह के भीतर अपीलकर्ता को भुगतान करना होगा। कोर्ट ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से यह भी अनुरोध किया कि वे लंबे समय से लंबित सेवा विवादों की पहचान करें और उन्हें जल्द से जल्द निपटाने का प्रयास करें।

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मामले का विवरण:

  • मामले का शीर्षक: राजेंद्र सिंह बोरा बनाम भारत संघ एवं अन्य
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या ___ / 2026 (SLP (C) संख्या 29304/2018 से उत्पन्न)
  • पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमी कापम कोटिश्वर सिंह
  • अदालत का फैसला: 22 अप्रैल, 2026

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