बिना पूर्ण सुनवाई और ‘समरी प्रोसीडिंग्स’ के जरिए पारित विदेशी फैसला भारत में लागू करने योग्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी विदेशी अदालत ने प्रतिवादी को अपना पक्ष रखने के लिए ‘फुल ट्रायल’ (पूर्ण सुनवाई) का अवसर दिए बिना केवल ‘समरी जजमेंट’ (संक्षिप्त फैसला) पारित किया है, तो वह सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC), 1908 की धारा 13 के तहत भारत में लागू नहीं किया जा सकता।

जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने मेसर ग्रीशम जीएमबीएच (अब एयर लिक्विड Deutschland GmbH) द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया। अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें इंग्लैंड की हाईकोर्ट के एक संक्षिप्त फैसले को भारत में निष्पादित (execute) करने से इनकार कर दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद 1995 के एक शेयर खरीद और सहयोग समझौते (SPCA) से शुरू हुआ था। इसमें अपीलकर्ता (एक जर्मन कंपनी) और प्रतिवादी (एक भारतीय कंपनी) ने भारत में एक संयुक्त उद्यम स्थापित करने का समझौता किया था। 1997 में, भारतीय कंपनी ने सिटीबैंक यूके से 7 मिलियन अमेरिकी डॉलर का विदेशी कर्ज (ECB) लिया, जिसकी गारंटी जर्मन कंपनी ने दी थी।

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 3 सितंबर 1997 को इस गारंटी को मंजूरी देते समय एक महत्वपूर्ण शर्त रखी थी: “गारंटी लागू होने की स्थिति में, भारतीय कंपनी पर किसी भी प्रकार की देनदारी नहीं आएगी।”

जब 2001 में भारतीय कंपनी कर्ज चुकाने में विफल रही, तो अपीलकर्ता ने बैंक को 4.78 मिलियन डॉलर का भुगतान किया और ‘सब्रोगेशन’ (अधिकार हस्तांतरण) के आधार पर भारतीय कंपनी से इस राशि की मांग की। भारतीय कंपनी ने यह कहते हुए भुगतान से इनकार कर दिया कि अपीलकर्ता ने समझौतों का उल्लंघन किया है और यह भुगतान उसी नुकसान की भरपाई (set-off) के रूप में माना जाना चाहिए।

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विदेशी फैसला और निष्पादन की कार्यवाही

अपीलकर्ता ने 2003 में इंग्लैंड की अदालत से एक ‘डिफ़ॉल्ट जजमेंट’ प्राप्त किया। बाद में इसे बदलकर ‘समरी जजमेंट’ की मांग की गई। प्रतिवादी ने अदालत के सामने तीन मौखिक समझौतों का बचाव रखा था, लेकिन इंग्लिश कोर्ट ने प्रतिवादी को बचाव की अनुमति (leave to defend) नहीं दी और 2006 में संक्षिप्त फैसला सुना दिया।

अपीलकर्ता ने इस फैसले को भारत में लागू करने के लिए धारा 44A CPC के तहत दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की। हाईकोर्ट की सिंगल जज बेंच ने शुरुआत में इसकी अनुमति दी, लेकिन डिवीजन बेंच ने इसे पलट दिया, जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से: वरिष्ठ वकील डॉ. ए.एम. सिंघवी ने तर्क दिया कि इंग्लिश कोर्ट का फैसला ‘मेरिट्स’ (गुण-दोष) पर आधारित था और प्रतिवादी को अपनी बात रखने का मौका मिला था। उन्होंने कहा कि आरबीआई की शर्तें केवल नियामक प्रकृति की थीं और उनका पालन भुगतान प्रेषण के समय किया जा सकता था।

प्रतिवादी की ओर से: वरिष्ठ वकील श्री पी. चिदंबरम ने दलील दी कि फैसला धारा 13(b) और (d) के तहत भारत में लागू नहीं हो सकता। उन्होंने जोर दिया कि इंग्लिश कोर्ट ने प्रतिवादी के मौखिक समझौतों के ठोस बचावों और आरबीआई की अनिवार्य शर्त की अनदेखी की। उन्होंने कहा कि बिना गवाहों की जांच और पूर्ण सुनवाई के दिया गया फैसला प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

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अदालत का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य रूप से इस बात पर गौर किया कि क्या बचाव की अनुमति दिए बिना पारित किया गया ‘समरी जजमेंट’ धारा 13(b) के तहत ‘मेरिट्स’ पर आधारित माना जा सकता है।

1. प्राकृतिक न्याय और मेरिट्स पर: अदालत ने पाया कि प्रतिवादी ने ‘ट्रायबल इश्यूज’ (विचारणीय मुद्दे) उठाए थे, जिनके समर्थन में बैलेंस शीट जैसे दस्तावेज़ मौजूद थे। इन दस्तावेज़ों पर अपीलकर्ता के नामित निदेशक के भी हस्ताक्षर थे।

अदालत ने कहा:

“विचारणीय मुद्दों की उपस्थिति में संक्षिप्त प्रक्रिया के जरिए फैसला सुनाना ‘मेरिट्स’ पर आधारित फैसला नहीं माना जा सकता… यह धारा 13(b) की अनिवार्यताओं का उल्लंघन है।”

पीठ ने यह भी कहा कि ‘डिफ़ॉल्ट जजमेंट’ से ‘समरी जजमेंट’ की ओर बढ़ना और प्रतिवादी को बचाव का मौका न देना निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का हनन है।

2. FERA और आरबीआई की मंजूरी: अदालत ने विदेशी मुद्रा विनिमय नियमन अधिनियम (FERA) की धारा 47(3) की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि कानूनी कार्यवाही शुरू करने और फैसले को लागू करने के बीच एक अंतर है।

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अदालत ने निष्कर्ष दिया:

“कानूनी कार्यवाही शुरू करने पर कोई रोक नहीं है, लेकिन डिक्री को लागू करने के लिए आवश्यक कदम उठाने से पहले केंद्र सरकार या आरबीआई की अनुमति अनिवार्य है।”

फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह विदेशी फैसला धारा 13 की विभिन्न उप-धाराओं (b, c, d, f) के तहत दोषपूर्ण है। पीठ ने कहा कि आरबीआई की अनिवार्य शर्तों के खिलाफ देनदारी तय करना भारतीय कानूनों के प्रतिकूल है।

पीठ ने स्पष्ट किया:

“ऊपर बताए गए कारणों के आधार पर, हमारी राय है कि इंग्लिश कोर्ट का फैसला धारा 44A CPC के तहत लागू करने योग्य नहीं है क्योंकि यह धारा 13 में दी गई अपवाद की श्रेणियों में आता है।”

इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपील को खारिज कर दिया।

केस विवरण केस शीर्षक:

मेसर ग्रीशम जीएमबीएच (अब एयर लिक्विड Deutschland GmbH) बनाम गोयल एमजी गैसेस प्राइवेट लिमिटेड

केस संख्या: सिविल अपील संख्या ___ / 2026 (SLP (C) संख्या 4774 / 2023 से उत्पन्न)

पीठ: जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे

दिनांक: 21 अप्रैल, 2026

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