अयोग्य उम्मीदवार की नियुक्ति बरकरार नहीं रखी जा सकती: सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस कांस्टेबल की बर्खास्तगी के आदेश को बहाल किया

उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट और राज्य लोक सेवा अधिकरण (ट्रिब्यूनल) के फैसलों को रद्द करते हुए उत्तर प्रदेश पुलिस के एक कांस्टेबल की बर्खास्तगी के आदेश को बहाल कर दिया है। उक्त कांस्टेबल ‘नॉक नी’ (घुटनों का आपस में टकराना) की समस्या के कारण चिकित्सीय रूप से अनफिट पाया गया था। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति बुनियादी पात्रता मानदंडों को पूरा नहीं करता, वह सार्वजनिक पद पर अपनी नियुक्ति बरकरार नहीं रख सकता, भले ही अधिकारियों ने पुनर्नियुक्ति के दौरान अपनी जिम्मेदारी निभाने में चूक की हो।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला साल 2005 का है, जब प्रतिवादी अजय कुमार मलिक को उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल के पद पर चुना गया था। भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताओं की शिकायतों के बाद एक जांच समिति का गठन किया गया और अभ्यर्थियों का मेडिकल टेस्ट दोबारा कराया गया। 2007 में प्रतिवादी को ‘नॉक नी डिफॉर्मिटी’ के कारण चिकित्सीय रूप से अयोग्य घोषित कर दिया गया, जिसके चलते उसकी नियुक्ति रद्द कर दी गई।

प्रतिवादी ने इसे इलाहाबाद हाईकोर्ट में रविशंकर यादव बनाम यूपी राज्य के मामले में चुनौती दी। हाईकोर्ट के निर्देश पर बने नए मेडिकल बोर्ड ने जनवरी 2009 में फिर से प्रतिवादी को अनफिट पाया। इस बीच, राज्य सरकार द्वारा की गई सामूहिक नियुक्तियों को रद्द करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2009 में एक अंतरिम आदेश के जरिए प्रभावित उम्मीदवारों को अस्थायी नियुक्ति देने का निर्देश दिया था।

साल 2013 में, प्रतिवादी ने एक अन्य अनफिट उम्मीदवार नितिन कुमार उपाध्याय के साथ समानता (parity) का दावा करते हुए अधिकारियों से संपर्क किया और उसे 9 दिसंबर 2013 को अस्थायी रूप से बहाल कर दिया गया। हालांकि, बाद की जांच में यह खुलासा हुआ कि प्रतिवादी पहले दो बार मेडिकल में अनफिट हो चुका था, जिसके बाद 17 मई 2017 को पुलिस अधीक्षक, जालौन ने उसे बर्खास्त कर दिया। इस बर्खास्तगी को ट्रिब्यूनल और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया है।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता (उत्तर प्रदेश राज्य): राज्य की ओर से तर्क दिया गया कि “धोखाधड़ी सब कुछ खत्म कर देती है” (विष्णु वर्धन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 2025)। यह दलील दी गई कि प्रतिवादी ने उन उम्मीदवारों के समान लाभ प्राप्त किया जिन्होंने खुद तथ्यों को गलत तरीके से पेश कर नियुक्तियां हासिल की थीं। राज्य ने कहा कि कानून में “नकारात्मक समानता” (negative equality) की कोई अवधारणा नहीं है।

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प्रतिवादी (अजय कुमार मलिक): प्रतिवादी के वकील ने तर्क दिया कि उन पर “तथ्यों को छिपाने” का आरोप लगाया गया था, जिसे ट्रिब्यूनल ने साबित नहीं माना। उन्होंने दावा किया कि 2013 की बहाली के समय उन्होंने अपनी शारीरिक स्थिति का खुलासा किया था। यह भी तर्क दिया गया कि 2005 में नियुक्ति के समय वे फिट थे और यह समस्या सेवा के दौरान विकसित हुई, इसलिए उन्हें दिव्यांग व्यक्ति अधिनियम, 1995 की धारा 47(1) के तहत संरक्षण मिलना चाहिए।

न्यायालय का विश्लेषण

न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की पीठ ने ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट के तर्क को त्रुटिपूर्ण पाया।

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1. महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने पर: न्यायालय ने पाया कि प्रतिवादी को पता था कि उसकी नियुक्ति पहले दो बार इसी आधार पर रद्द हो चुकी है। कोर्ट ने कहा, “हमारी राय में ऐसा कृत्य जानबूझकर तथ्यों को छिपाने से कम नहीं है… यह ‘सप्रेसियो वेरी’ और ‘सजेस्टियो फाल्सी’ (सत्य को छिपाना और झूठ को बढ़ावा देना) के दायरे में आता है।”

2. अधिकारियों की भूमिका पर: अदालत ने पुलिस अधीक्षक, जालौन की भी आलोचना की जिन्होंने पात्रता की जांच किए बिना बहाली कर दी। कोर्ट ने कहा, “यह इस बात पर रोशनी डालता है कि वरिष्ठ अधिकारी आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में किस तरह व्यवहार करते हैं… जिम्मेदारी और सावधानी की कमी न केवल व्यवस्था की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाती है, बल्कि जनहित के भी विरुद्ध है।”

3. पात्रता ही बुनियादी आवश्यकता: पीठ ने कहा कि वर्दीधारी सेवाओं में नियुक्ति की जांच बड़ी जिम्मेदारी के साथ की जानी चाहिए। निर्णय के अनुसार, “पात्रता की कमी मामले की जड़ तक जाती है और गलत तरीके से की गई नियुक्ति को तब बरकरार नहीं रखा जा सकता, जब प्रासंगिक तारीख पर अयोग्यता का तथ्य सामने आ जाए।”

न्यायालय का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की अपीलों को स्वीकार करते हुए कांस्टेबल की सेवा समाप्ति (बर्खास्तगी) के मूल आदेश को बहाल कर दिया।

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हालांकि, न्याय के संतुलन के लिए कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश दिए:

  1. प्रतिवादी ने जितनी अवधि तक वास्तव में कार्य किया है, उस दौरान दिए गए वेतन की वसूली नहीं की जाएगी।
  2. यदि वास्तविक सेवा अवधि का कोई बकाया वेतन है, तो उसे चार सप्ताह के भीतर 6% ब्याज के साथ चुकाया जाए।
  3. राज्य को निर्देश दिया गया कि वह नितिन कुमार उपाध्याय (यदि सेवा में है) के मामले पर भी पात्रता मानदंडों के आधार पर तीन महीने के भीतर पुनर्विचार करें।

अदालत ने अपीलकर्ताओं द्वारा निर्धारित सीमा से अधिक लंबी लिखित दलीलें दाखिल करने पर आपत्ति जताई और राज्य को ‘सुप्रीम कोर्ट बार क्लर्क एसोसिएशन वेलफेयर फंड ट्रस्ट’ में 5,000 रुपये जमा करने का आदेश दिया।

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य बनाम अजय कुमार मलिक
  • केस नंबर: सिविल अपील संख्या ____/2026 (एसईएलपी (सी) संख्या 11145-11146/2025 से उत्पन्न)
  • पीठ: न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया
  • दिनांक: 20 अप्रैल, 2026

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