सिटिंग जज पर टिप्पणी के मामले में वकील के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही रोकने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उन आदेशों के खिलाफ दायर अपीलों को खारिज कर दिया है, जिसमें एक वकील के विरुद्ध आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू की गई थी। शीर्ष अदालत ने कहा कि किसी सिटिंग जज (कार्यरत न्यायाधीश) के खिलाफ व्यक्तिगत और निराधार आरोप लगाने से “न्याय प्रशासन में जनता के विश्वास को ठेस पहुँचती है।”

यह मामला अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 19 के तहत दायर किया गया था। इसमें बॉम्बे हाईकोर्ट की पांच-सदस्यीय पीठ द्वारा पारित उन आदेशों को चुनौती दी गई थी, जिसमें सिटिंग जज (“जस्टिस X”) को प्रतिवादी के रूप में शामिल करने की वकील की मांग को ठुकरा दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कार्यवाही में हस्तक्षेप करने से मना करते हुए हाईकोर्ट को स्वतंत्र रूप से सुनवाई जारी रखने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद की शुरुआत तब हुई जब अपीलकर्ता ने एक क्लाइंट की ओर से क्रिमिनल रिट पिटीशन संख्या 1612/2025 दायर की थी। 2 अप्रैल 2025 को इस मामले की सुनवाई “जस्टिस X” की सदस्यता वाली खंडपीठ के सामने होनी थी। हालांकि, सुनवाई से ठीक एक दिन पहले 1 अप्रैल 2025 को अपीलकर्ता ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की। इसमें उन्होंने आरोप लगाया कि “जस्टिस X” को इस मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए क्योंकि उनकी बहन उस एफआईआर (FIR) में आरोपी थी, जो उनके क्लाइंट ने दर्ज कराई थी।

4 अप्रैल 2025 को “जस्टिस X” ने हाईकोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर इस घटनाक्रम की जानकारी दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि इन आरोपों ने उनकी निजी और न्यायिक छवि को धूमिल किया है। मुख्य न्यायाधीश ने इस पर स्वतः संज्ञान (suo motu) लिया और आपराधिक अवमानना याचिका संख्या 1/2025 दर्ज की गई।

कार्यवाही के दौरान, अपीलकर्ता ने “जस्टिस X” को पक्षकार बनाने के लिए आवेदन (I.A. No. 3297/2025) किया। हाईकोर्ट ने 17 सितंबर 2025 को इसे खारिज करते हुए कहा कि मुख्य न्यायाधीश को सूचना देने वाला व्यक्ति ‘शिकायतकर्ता’ या ‘जरूरी पक्ष’ नहीं बन जाता। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने आवेदन में की गई अपमानजनक टिप्पणियों पर संज्ञान लेते हुए एक दूसरी अवमानना याचिका (No. 4/2025) भी दर्ज करने का आदेश दिया।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता-अवमाननाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि हाईकोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र का “अत्यधिक” उपयोग किया है। वकील की दलीलें इस प्रकार थीं:

  • यह टिप्पणियां एक “सच्चे कानूनी बचाव” (bona fide legal defence) का हिस्सा थीं।
  • पी.एन. दूदा बनाम पी. शिव शंकर (1988) मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि सी.के. दफ्तरी जैसे पुराने फैसले अब प्रभावी नहीं रह गए हैं।
  • इन रे: सी.एस. कर्णन (2017) मामले के आधार पर यह कहा गया कि सार्वजनिक हित में और प्रमाणित सत्य के आधार पर जज के खिलाफ लगाए गए आरोप स्वतः अवमानना की श्रेणी में नहीं आते।
  • हाईकोर्ट द्वारा अन्य 16 वकीलों के खिलाफ पेशेवर दुराचार (professional misconduct) की टिप्पणी को भी अवैध बताया गया, क्योंकि यह अधिकार केवल बार काउंसिल के पास है।
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हाईकोर्ट की ओर से पेश वकील ने अपीलों का विरोध किया और कहा कि न्याय के उचित प्रशासन को सुनिश्चित करने के लिए ये आदेश आवश्यक थे।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि न्यायिक स्वतंत्रता संवैधानिक ढांचे की एक “बुनियादी और अनिवार्य विशेषता” है। अदालत ने कहा:

“न्यायपालिका की ताकत और वैधता आदेश देने की क्षमता में नहीं, बल्कि इसकी निष्पक्षता और संस्थागत स्वतंत्रता में जनता के विश्वास पर टिकी है।”

शांति भूषण बनाम सुप्रीम कोर्ट (2018) मामले का जिक्र करते हुए बेंच ने कहा कि जनता का भरोसा ही न्यायिक समीक्षा की आधारशिला है। वकील के आचरण पर अदालत ने टिप्पणी की:

“किसी लंबित न्यायिक विवाद को सार्वजनिक मंच पर ले जाना और उसे सनसनीखेज बनाना या जजों को बदनाम करना, एक वकील से अपेक्षित अनुशासन के बिल्कुल विपरीत है।”

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अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक फैसलों की तर्कसंगत आलोचना की जा सकती है, लेकिन जज की ईमानदारी या मंशा पर बिना ठोस आधार के सवाल उठाना गलत है।

अदालत का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने इस स्तर पर हाईकोर्ट की कार्यवाही में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं पाया। अदालत ने हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि वह इस मामले में उठने वाले सभी कानूनी पहलुओं और बचावों पर स्वतंत्र रूप से विचार करे और सुनवाई जल्द पूरी करे। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी ये टिप्पणियां केवल अपीलों के निपटारे के लिए प्रथम दृष्टया (prima facie) दी गई हैं और ये हाईकोर्ट के अंतिम फैसले को प्रभावित नहीं करेंगी।

सभी अपीलों को खारिज कर दिया गया और लंबित आवेदनों का निपटारा किया गया।

केस विवरण

  • केस का शीर्षक: नीलेश सी. ओझा बनाम हाईकोर्ट ऑफ जुडीकेचर एट बॉम्बे थ्रू सेक्रेटरी एवं अन्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 5673-5674 / 2025
  • पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता
  • दिनांक: 20 अप्रैल, 2026

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