“सुप्रीम कोर्ट में एंट्री बंद कर देंगे”: नेताजी को ‘राष्ट्र पुत्र’ घोषित करने वाली याचिका खारिज, याचिकाकर्ता को कोर्ट की कड़ी चेतावनी

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया, जिसमें नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज (INA) को भारत की आजादी दिलाने का आधिकारिक श्रेय देने की मांग की गई थी। याचिका को खारिज करते हुए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्या कांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच ने याचिकाकर्ता पिनाकपाणि मोहंती को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने इसे “लोकप्रियता हासिल करने” की कोशिश करार देते हुए याचिकाकर्ता के रवैये पर सख्त नाराजगी जताई।

इस याचिका में मांग की गई थी कि नेताजी को आधिकारिक तौर पर ‘नेशनल सन’ (राष्ट्र पुत्र) घोषित किया जाए और आजाद हिंद फौज से जुड़ी महत्वपूर्ण तिथियों को राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया जाए।

‘लापरवाह’ मुकदमेबाजी पर कोर्ट की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान बेंच ने मोहंती द्वारा बार-बार एक ही तरह की याचिकाएं दायर करने पर कड़ा एतराज जताया। चीफ जस्टिस सूर्या कांत ने याचिकाकर्ता के पुराने इतिहास का हवाला देते हुए मौखिक रूप से कहा, “सुप्रीम कोर्ट में एंट्री बंद कर देंगे।”

कोर्ट ने संज्ञान लिया कि मोहंती ने इससे पहले 2024 में भी नेताजी की मृत्यु की जांच की मांग करते हुए एक याचिका लगाई थी। उस समय जस्टिस सूर्या कांत और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने याचिकाकर्ता की मंशा पर सवाल उठाए थे और चुनाव के समय ऐसी याचिकाओं के पीछे के कारणों के बारे में पूछा था।

हालांकि मोहंती ने दावा किया कि वह मानवाधिकारों के लिए स्वतंत्र रूप से यह याचिकाएं दायर कर रहे हैं, लेकिन कोर्ट उनकी दलीलों से संतुष्ट नहीं दिखा। बेंच ने पाया कि महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू जैसी दिवंगत राष्ट्रीय हस्तियों के खिलाफ बिना किसी ठोस आधार के आरोप लगाए जा रहे हैं। कोर्ट ने सवाल किया कि किसी के भी खिलाफ इस तरह की लापरवाह बातें कैसे लिखी जा सकती हैं।

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नेताजी की अस्थियों और पिछले फैसलों का संदर्भ

यह फैसला सुप्रीम कोर्ट द्वारा टोक्यो के रेनकोजी मंदिर से नेताजी की अस्थियां वापस लाने की मांग वाली याचिका पर आए हालिया रुख के बाद आया है। उस मामले में वरिष्ठ वकील ए.एम. सिंघवी ने मांग की थी कि नेताजी की बेटी अनीता बोस फाफ को भारत में अंतिम संस्कार करने की अनुमति दी जाए।

उस समय चीफ जस्टिस की बेंच ने मामले को सुनने में अनिच्छा जाहिर करते हुए कहा था कि देश नेताजी के बलिदान का सम्मान करता है, लेकिन एक ही मुद्दे को बार-बार कोर्ट में लाना सही नहीं है। वह याचिका तब वापस ले ली गई थी जब कोर्ट ने सुझाव दिया कि अगर परिवार का कोई कानूनी उत्तराधिकारी कानूनी कार्रवाई चाहता है, तो उन्हें स्वयं आगे आना चाहिए।

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मौजूदा मामले में कोर्ट ने माना कि यह याचिका जनहित के बजाय केवल चर्चा बटोरने का प्रयास है। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि भविष्य में पिनाकपाणि मोहंती की ओर से जनहित के नाम पर दायर की जाने वाली किसी भी याचिका को स्वीकार न किया जाए।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता पहले भी इसी तरह के मामलों में विफल रहे हैं और बार-बार एक ही तरह के मुद्दे उठाना अदालत के समय की बर्बादी है।

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