क्रॉस-रिपोर्ट की जांच में विफलता ने जांच को किया दूषित: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दशकों पुराने हत्या के मामले में आरोपियों को किया बरी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के एक मामले में वर्ष 1987 में दी गई सजा को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि आरोपियों द्वारा दर्ज कराई गई क्रॉस-रिपोर्ट की जांच न करना पुलिस की जांच को “दूषित और एकतरफा” बनाता है। जस्टिस चंद्र धारी सिंह और जस्टिस देवेंद्र सिंह-I की खंडपीठ ने अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालत के फैसले में गंभीर प्रक्रियात्मक खामियों और तथ्यात्मक त्रुटियों को रेखांकित किया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह अपील शाहजहांपुर के सत्र न्यायाधीश द्वारा सत्र परीक्षण संख्या 403/1986 में 29 अप्रैल, 1987 को पारित निर्णय के खिलाफ दायर की गई थी। निचली अदालत ने अपीलकर्ताओं—चेत राम और रामेश्वर (राममु और मिश्री की मृत्यु के कारण उनकी अपील पहले ही समाप्त हो चुकी थी)—को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302/34 के तहत आजीवन कारावास और धारा 323/34 के तहत छह महीने के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, घटना 18 अगस्त, 1986 को शाम 5:00 बजे हुई थी। आरोप था कि आरोपियों ने 220 रुपये के कर्ज और जमीन की खेती को लेकर हुए विवाद में राजपाल पर लाठियों से हमला किया, जिसकी उसी रात मौत हो गई। इस मामले की एफआईआर (FIR) अगले दिन 19 अगस्त, 1986 को सुबह 8:15 बजे दर्ज की गई थी।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि यह एक ‘क्रॉस-केस’ का मामला था जिसमें आरोपियों ने आत्मरक्षा में बल का प्रयोग किया था। उन्होंने इस तथ्य पर जोर दिया कि अपीलकर्ता रामेश्वर ने 19 अगस्त, 1986 को रात 00:15 बजे (अभियोजन की एफआईआर से आठ घंटे पहले) एक रिपोर्ट (NCR) दर्ज कराई थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि राजपाल, बाबू राम और भिखारी लाल ने पहले उन पर हमला किया था।

वहीं, राज्य सरकार की ओर से पेश अपर शासकीय अधिवक्ता ने निचली अदालत के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने दलील दी कि साक्ष्यों का सही मूल्यांकन किया गया है और अपीलकर्ताओं की सजा पूरी तरह उचित है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

साक्ष्यों की समीक्षा के बाद, हाईकोर्ट ने जांच और निचली अदालत के तर्क में कई महत्वपूर्ण कमियां पाईं:

  1. क्रॉस-रिपोर्ट की जांच न करना: जांच अधिकारी (PW-4) ने स्वीकार किया कि उसने रामेश्वर द्वारा दर्ज कराई गई NCR की जांच नहीं की और गिरफ्तारी के बाद आरोपियों का मेडिकल परीक्षण कराने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। हाईकोर्ट ने कहा: “साक्ष्यों के अवलोकन से यह स्पष्ट है कि अपीलकर्ता-रामेश्वर द्वारा दर्ज कराई गई रिपोर्ट पर कोई जांच नहीं की गई… इस मामले में जांच दूषित और एकतरफा है।”
  2. अभियोजन की कहानी पर संदेह: अभियोजन ने दावा किया कि बारिश और बाढ़ के कारण 7 किलोमीटर की दूरी तय करने में उन्हें 15 घंटे लगे। कोर्ट ने इस स्पष्टीकरण को “निगलने में बहुत कठिन” (too hard to swallow) पाया, क्योंकि आरोपी पक्ष उसी मौसम में चार घंटे के भीतर रिपोर्ट दर्ज कराने थाने पहुंच गया था।
  3. चोटों के संबंध में तथ्यात्मक त्रुटि: निचली अदालत ने गलत तरीके से दर्ज किया था कि केवल एक आरोपी का मेडिकल परीक्षण हुआ था। हाईकोर्ट ने पाया कि बचाव पक्ष के गवाह (DW-1) ने वास्तव में तीन आरोपियों—चेत राम, मिश्री और रामेश्वर—का परीक्षण किया था, जिनके शरीर पर ताजी चोटें पाई गई थीं।
  4. आत्मरक्षा के अधिकार की अनदेखी: कोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत आरोपियों के बयानों को समझने में गलती की। जहां निचली अदालत ने अपीलकर्ताओं को हमलावर माना, वहीं हाईकोर्ट के अनुसार साक्ष्य यह संकेत देते हैं कि उन्होंने मृतक के पक्ष द्वारा किए गए हमले से खुद को बचाने के लिए जवाबी कार्रवाई की थी।
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अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि निचली अदालत क्रॉस-केस के सही परिप्रेक्ष्य की जांच करने में विफल रही। कोर्ट ने कहा कि जांच के दूषित होने और आत्मरक्षा की विश्वसनीय दलील के कारण अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ संदेह से परे अपराध साबित नहीं कर सका।

अदालत ने 29 अप्रैल, 1987 के आदेश को रद्द करते हुए अपील स्वीकार कर ली। चेत राम और रामेश्वर के बेल बॉन्ड रद्द कर दिए गए और उनकी जमानतें डिस्चार्ज कर दी गईं।

मामले का विवरण:

  • केस शीर्षक: राममु और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 1441/1987
  • पीठ: जस्टिस चंद्र धारी सिंह और जस्टिस देवेंद्र सिंह-I
  • दिनांक: 10 अप्रैल, 2026

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