बंगाल चुनाव: मतदाता सूची से नाम हटाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट का दखल से इनकार, कहा- पहले ट्रिब्यूनल जाएं

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ दायर एक याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। चीफ जस्टिस सूर्या कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने इस याचिका को ‘समय से पहले’ करार दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रभावित मतदाताओं को पहले से स्थापित अपीलीय ट्रिब्यूनल के पास अपनी शिकायतें लेकर जाना चाहिए।

पश्चिम बंगाल में 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को दो चरणों में मतदान होना है, जबकि वोटों की गिनती 4 मई को होगी।

यह याचिका कुरैशा यास्मीन और 12 अन्य लोगों द्वारा दायर की गई थी। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि चुनाव आयोग ने स्पेशल इंस्टीट्यूशनल रिवीजन (SIR) के दौरान बिना उचित प्रक्रिया अपनाए उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए हैं। याचिका में यह भी कहा गया कि इन फैसलों के खिलाफ की गई अपीलों पर समय पर सुनवाई नहीं हो रही है। उनके वकील ने मतदाता सूची को ‘फ्रीज’ करने की तारीख बढ़ाने की मांग की और सुनवाई की सुस्त रफ्तार पर चिंता जताई।

चुनाव आयोग की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट डी.एस. नायडू ने कोर्ट को बताया कि वर्तमान में लगभग 30 से 34 लाख अपीलें लंबित हैं, जो प्रशासनिक स्तर पर एक बड़ी चुनौती है।

सुनवाई के दौरान जस्टिस जोयमालया बागची ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया में वोट के अधिकार को बेहद अहम बताया। उन्होंने कहा, “जिस देश में आप पैदा हुए हैं, वहां वोट देने का अधिकार केवल संवैधानिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि एक भावनात्मक स्तंभ भी है। यह लोकतंत्र का हिस्सा होने और सरकार चुनने में मदद करने के बारे में है।”

बेंच ने संज्ञान लिया कि कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने इस समस्या के समाधान के लिए पहले ही 19 विशेष ट्रिब्यूनल गठित कर दिए हैं। इन ट्रिब्यूनल्स की कमान हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों और जजों के हाथों में है, जिन्होंने सोमवार से ही अपीलों पर सुनवाई शुरू कर दी है।

अदालत ने अपीलों की भारी संख्या पर चिंता जताई। बेंच ने नोट किया कि हर ट्रिब्यूनल के पास एक लाख से अधिक मामले लंबित हैं। हालांकि, कोर्ट ने पूर्व जजों पर काम का बोझ बढ़ाने वाली किसी समय-सीमा को तय करने से मना कर दिया।

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जस्टिस बागची ने कहा, “हमें उचित प्रक्रिया के अधिकारों की रक्षा करने की आवश्यकता है। मतदाता को दो संवैधानिक अधिकारियों के बीच नहीं पिसना चाहिए।” कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह इस स्तर पर चुनाव प्रक्रिया में कोई बाधा नहीं डालेगा। चीफ जस्टिस ने जोर देकर कहा कि न्यायिक हस्तक्षेप का उद्देश्य चुनाव को बढ़ावा देना है, न कि उसे रोकना। बेंच ने अंत में कहा कि जब तक मतदाताओं का एक बहुत बड़ा हिस्सा बाहर न हो जाए या चुनाव प्रक्रिया पर भौतिक रूप से असर न पड़े, तब तक चुनाव को रोका नहीं जा सकता।

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