ग्राम न्यायालय CrPC के तहत फैमिली कोर्ट के भरण-पोषण आदेशों में बदलाव या उन्हें लागू नहीं कर सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि सिविल जज (जूनियर डिवीजन) रैंक के अधिकारी की अध्यक्षता वाला ग्राम न्यायालय, उच्च न्यायिक सेवा (HJS) कैडर के फैमिली कोर्ट जज द्वारा पारित आदेशों की समीक्षा, उनमें संशोधन या उनके निष्पादन (execution) की कार्यवाही करने के लिए सक्षम नहीं है।

जस्टिस हरवीर सिंह की एकल पीठ ने कहा कि इस तरह की व्यवस्था न्यायिक पदानुक्रम में अलग-अलग रैंक के अधिकारियों द्वारा एक ही विषय पर अधिकार क्षेत्र का उपयोग करने से “असंगति, न्यायिक अनुचितता और ओवरलैपिंग” की स्थिति पैदा करती है।

इस मामले में मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या ग्राम न्यायालय के पास उन मामलों में CrPC की धारा 127 और 128 (भरण-पोषण में संशोधन और निष्पादन से संबंधित) के तहत आवेदनों पर निर्णय लेने का अधिकार क्षेत्र है, जहां मूल भरण-पोषण आदेश फैमिली कोर्ट के प्रिंसिपल जज या एडिशनल प्रिंसिपल जज द्वारा पारित किया गया हो।

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि हालांकि ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 के तहत ग्राम न्यायालयों को भरण-पोषण के मामलों में अधिकार क्षेत्र प्राप्त है, लेकिन वे फैमिली कोर्ट के उच्च रैंक वाले अधिकारियों के आदेशों के “ऊपर” अपनी शक्तियों का प्रयोग नहीं कर सकते।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद की शुरुआत 6 मार्च, 2019 को प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट, बिजनौर द्वारा पारित एक आदेश से हुई थी, जिसमें याचिकाकर्ता अमित कुमार राणा को अपनी पत्नी (प्रतिवादी संख्या 2) को CrPC की धारा 125 के तहत 3,000 रुपये प्रति माह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।

बाद में, याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में एक पुनरीक्षण (revision) याचिका दायर की, जिसमें कोर्ट ने बकाया राशि के भुगतान पर रोक लगा दी लेकिन मासिक भुगतान जारी रखने का निर्देश दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने धारा 127 Cr.PC के तहत एक आवेदन दायर कर भरण-पोषण आदेश को वापस लेने की मांग की, जिसमें दावा किया गया कि उसकी पत्नी ने 26 जनवरी, 2020 को दूसरी शादी कर ली है।

जब यह आवेदन एडिशनल प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट के समक्ष लंबित था, तभी फरवरी 2024 में जिला जज द्वारा जारी प्रशासनिक आदेशों के बाद सभी भरण-पोषण के मामले नवनिर्मित ग्राम न्यायालय, धामपुर को स्थानांतरित कर दिए गए। नतीजतन, ग्राम न्यायालय ने 1 अक्टूबर, 2024 और 25 मार्च, 2025 को आदेश पारित कर याचिकाकर्ता को 2019 के आदेश का पालन करने का निर्देश दिया और रिकवरी वारंट जारी कर दिया।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील की दलील: याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की अध्यक्षता वाला ग्राम न्यायालय उस मामले पर निर्णय लेने के लिए सक्षम नहीं है जो पहले से ही उच्च न्यायिक सेवा के अधिकारी यानी फैमिली कोर्ट जज द्वारा तय किया जा चुका है। उन्होंने दलील दी कि फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 की धारा 7(2) और 8(b) के तहत जहां फैमिली कोर्ट स्थापित है, वहां मजिस्ट्रेट का अधिकार क्षेत्र समाप्त हो जाता है।

प्रतिवादी संख्या 2 के वकील की दलील: प्रतिवादी ने तर्क दिया कि ग्राम न्यायालय को यह अधिकार क्षेत्र विधायिका द्वारा ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 के माध्यम से दिया गया है। उन्होंने कहा कि चूंकि अधिकार क्षेत्र कानूनी रूप से स्थानांतरित किया गया था, इसलिए ग्राम न्यायालय द्वारा पारित आदेश कानून और अधिनियम की पहली अनुसूची के प्रावधानों के अनुरूप थे।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों के पदानुक्रम और दोनों अधिनियमों के विरोधाभासी प्रावधानों का विश्लेषण किया। कोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट में उच्च न्यायिक सेवा (HJS) कैडर के अधिकारी होते हैं, जबकि ग्राम न्यायालय का नेतृत्व जूनियर डिवीजन रैंक के अधिकारी करते हैं।

कोर्ट ने टिप्पणी की:

“जूनियर डिवीजन रैंक का एक न्यायिक अधिकारी, जो उच्च न्यायिक सेवा कैडर के रैंक से बहुत नीचे है, जिला जज/प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट के रैंक वाले अधिकारी द्वारा पारित आदेश की समीक्षा, उसे वापस लेने या उस पर निर्णय लेने की शक्ति नहीं रख सकता।”

असंगति पर चर्चा करते हुए जस्टिस हरवीर सिंह ने कहा:

“इस व्यवस्था ने न केवल अव्यवस्था पैदा की है, बल्कि न्यायिक पदानुक्रम में दो अलग-अलग न्यायिक अधिकारियों द्वारा एक ही विषय (CrPC के अध्याय IX) पर अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने से विसंगति, न्यायिक अनुचितता और ओवरलैपिंग की स्थिति भी पैदा हुई है।”

कोर्ट ने आगे कहा कि 16 दिसंबर, 2021 के एक पुराने सर्कुलर में ग्राम न्यायालय अधिनियम को प्रभावी बताया गया था, लेकिन वह “बहुमूल्य कानूनी उपचार” (remedy) के नुकसान पर विचार नहीं करता। ग्राम न्यायालय के आदेश के खिलाफ सत्र न्यायालय में अपील की जा सकती है, लेकिन यदि सत्र न्यायाधीश (फैमिली कोर्ट के रूप में) स्वयं आदेश पारित करते हैं, तो पक्षकार अपील का एक स्तर खो देता है।

अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने ग्राम न्यायालय, धामपुर द्वारा पारित 1 अक्टूबर, 2024 और 25 मार्च, 2025 के आदेशों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. आदेशों को रद्द करना: ग्राम न्यायालय के आदेशों को “फैमिली कोर्ट एक्ट के साथ असंगत” होने के कारण रद्द कर दिया गया।
  2. मूल आदेश की निरंतरता: 6 मार्च, 2019 का मूल भरण-पोषण आदेश तब तक प्रभावी रहेगा जब तक कि प्रतिवादी ने पुनर्विवाह नहीं कर लिया।
  3. स्थानांतरण पर रोक: फैमिली कोर्ट में दायर मामलों को ग्राम न्यायालय में केवल तभी स्थानांतरित किया जा सकता है जब पक्षों के अधिकारों को तय करने वाला कोई आदेश (जैसे अंतरिम भरण-पोषण) पारित न किया गया हो।
  4. लंबित आवेदन: कोर्ट ने विशेष रूप से स्पष्ट किया कि “CrPC की धारा 126(2), 127 और 128 के तहत तय किए जाने वाले फैमिली कोर्ट में लंबित मामलों को ग्राम न्यायालय में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता है।”

याचिका का निपटारा करते हुए कोर्ट ने कहा कि पक्षकार फैमिली कोर्ट योजना के ढांचे के भीतर कानून के तहत उपलब्ध किसी भी उपचार का लाभ उठा सकते हैं।

केस विवरण:

  • केस शीर्षक: अमित कुमार राणा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
  • केस संख्या: MATTERS UNDER ARTICLE 227 No. 9426 of 2025
  • पीठ: जस्टिस हरवीर सिंह
  • तिथि: 10 अप्रैल, 2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि सिविल जज (जूनियर डिवीजन) रैंक के अधिकारी की अध्यक्षता वाला ग्राम न्यायालय, उच्च न्यायिक सेवा (HJS) कैडर के फैमिली कोर्ट जज द्वारा पारित आदेशों की समीक्षा, उनमें संशोधन या उनके निष्पादन (execution) की कार्यवाही करने के लिए सक्षम नहीं है।

जस्टिस हरवीर सिंह की एकल पीठ ने कहा कि इस तरह की व्यवस्था न्यायिक पदानुक्रम में अलग-अलग रैंक के अधिकारियों द्वारा एक ही विषय पर अधिकार क्षेत्र का उपयोग करने से “असंगति, न्यायिक अनुचितता और ओवरलैपिंग” की स्थिति पैदा करती है।

इस मामले में मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या ग्राम न्यायालय के पास उन मामलों में CrPC की धारा 127 और 128 (भरण-पोषण में संशोधन और निष्पादन से संबंधित) के तहत आवेदनों पर निर्णय लेने का अधिकार क्षेत्र है, जहां मूल भरण-पोषण आदेश फैमिली कोर्ट के प्रिंसिपल जज या एडिशनल प्रिंसिपल जज द्वारा पारित किया गया हो।

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हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि हालांकि ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 के तहत ग्राम न्यायालयों को भरण-पोषण के मामलों में अधिकार क्षेत्र प्राप्त है, लेकिन वे फैमिली कोर्ट के उच्च रैंक वाले अधिकारियों के आदेशों के “ऊपर” अपनी शक्तियों का प्रयोग नहीं कर सकते।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद की शुरुआत 6 मार्च, 2019 को प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट, बिजनौर द्वारा पारित एक आदेश से हुई थी, जिसमें याचिकाकर्ता अमित कुमार राणा को अपनी पत्नी (प्रतिवादी संख्या 2) को CrPC की धारा 125 के तहत 3,000 रुपये प्रति माह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।

बाद में, याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में एक पुनरीक्षण (revision) याचिका दायर की, जिसमें कोर्ट ने बकाया राशि के भुगतान पर रोक लगा दी लेकिन मासिक भुगतान जारी रखने का निर्देश दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने धारा 127 Cr.PC के तहत एक आवेदन दायर कर भरण-पोषण आदेश को वापस लेने की मांग की, जिसमें दावा किया गया कि उसकी पत्नी ने 26 जनवरी, 2020 को दूसरी शादी कर ली है।

जब यह आवेदन एडिशनल प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट के समक्ष लंबित था, तभी फरवरी 2024 में जिला जज द्वारा जारी प्रशासनिक आदेशों के बाद सभी भरण-पोषण के मामले नवनिर्मित ग्राम न्यायालय, धामपुर को स्थानांतरित कर दिए गए। नतीजतन, ग्राम न्यायालय ने 1 अक्टूबर, 2024 और 25 मार्च, 2025 को आदेश पारित कर याचिकाकर्ता को 2019 के आदेश का पालन करने का निर्देश दिया और रिकवरी वारंट जारी कर दिया।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील की दलील: याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की अध्यक्षता वाला ग्राम न्यायालय उस मामले पर निर्णय लेने के लिए सक्षम नहीं है जो पहले से ही उच्च न्यायिक सेवा के अधिकारी यानी फैमिली कोर्ट जज द्वारा तय किया जा चुका है। उन्होंने दलील दी कि फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 की धारा 7(2) और 8(b) के तहत जहां फैमिली कोर्ट स्थापित है, वहां मजिस्ट्रेट का अधिकार क्षेत्र समाप्त हो जाता है।

प्रतिवादी संख्या 2 के वकील की दलील: प्रतिवादी ने तर्क दिया कि ग्राम न्यायालय को यह अधिकार क्षेत्र विधायिका द्वारा ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 के माध्यम से दिया गया है। उन्होंने कहा कि चूंकि अधिकार क्षेत्र कानूनी रूप से स्थानांतरित किया गया था, इसलिए ग्राम न्यायालय द्वारा पारित आदेश कानून और अधिनियम की पहली अनुसूची के प्रावधानों के अनुरूप थे।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों के पदानुक्रम और दोनों अधिनियमों के विरोधाभासी प्रावधानों का विश्लेषण किया। कोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट में उच्च न्यायिक सेवा (HJS) कैडर के अधिकारी होते हैं, जबकि ग्राम न्यायालय का नेतृत्व जूनियर डिवीजन रैंक के अधिकारी करते हैं।

कोर्ट ने टिप्पणी की:

“जूनियर डिवीजन रैंक का एक न्यायिक अधिकारी, जो उच्च न्यायिक सेवा कैडर के रैंक से बहुत नीचे है, जिला जज/प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट के रैंक वाले अधिकारी द्वारा पारित आदेश की समीक्षा, उसे वापस लेने या उस पर निर्णय लेने की शक्ति नहीं रख सकता।”

असंगति पर चर्चा करते हुए जस्टिस हरवीर सिंह ने कहा:

“इस व्यवस्था ने न केवल अव्यवस्था पैदा की है, बल्कि न्यायिक पदानुक्रम में दो अलग-अलग न्यायिक अधिकारियों द्वारा एक ही विषय (CrPC के अध्याय IX) पर अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने से विसंगति, न्यायिक अनुचितता और ओवरलैपिंग की स्थिति भी पैदा हुई है।”

कोर्ट ने आगे कहा कि 16 दिसंबर, 2021 के एक पुराने सर्कुलर में ग्राम न्यायालय अधिनियम को प्रभावी बताया गया था, लेकिन वह “बहुमूल्य कानूनी उपचार” (remedy) के नुकसान पर विचार नहीं करता। ग्राम न्यायालय के आदेश के खिलाफ सत्र न्यायालय में अपील की जा सकती है, लेकिन यदि सत्र न्यायाधीश (फैमिली कोर्ट के रूप में) स्वयं आदेश पारित करते हैं, तो पक्षकार अपील का एक स्तर खो देता है।

अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने ग्राम न्यायालय, धामपुर द्वारा पारित 1 अक्टूबर, 2024 और 25 मार्च, 2025 के आदेशों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. आदेशों को रद्द करना: ग्राम न्यायालय के आदेशों को “फैमिली कोर्ट एक्ट के साथ असंगत” होने के कारण रद्द कर दिया गया।
  2. मूल आदेश की निरंतरता: 6 मार्च, 2019 का मूल भरण-पोषण आदेश तब तक प्रभावी रहेगा जब तक कि प्रतिवादी ने पुनर्विवाह नहीं कर लिया।
  3. स्थानांतरण पर रोक: फैमिली कोर्ट में दायर मामलों को ग्राम न्यायालय में केवल तभी स्थानांतरित किया जा सकता है जब पक्षों के अधिकारों को तय करने वाला कोई आदेश (जैसे अंतरिम भरण-पोषण) पारित न किया गया हो।
  4. लंबित आवेदन: कोर्ट ने विशेष रूप से स्पष्ट किया कि “CrPC की धारा 126(2), 127 और 128 के तहत तय किए जाने वाले फैमिली कोर्ट में लंबित मामलों को ग्राम न्यायालय में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता है।”

याचिका का निपटारा करते हुए कोर्ट ने कहा कि पक्षकार फैमिली कोर्ट योजना के ढांचे के भीतर कानून के तहत उपलब्ध किसी भी उपचार का लाभ उठा सकते हैं।

केस विवरण:

  • केस शीर्षक: अमित कुमार राणा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
  • केस संख्या: MATTERS UNDER ARTICLE 227 No. 9426 of 2025
  • पीठ: जस्टिस हरवीर सिंह
  • तिथि: 10 अप्रैल, 2026

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