सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसके तहत 2016 के एक हत्या मामले में दो दोषियों की उम्रकैद की सजा निलंबित कर उन्हें जमानत दी गई थी। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने टिप्पणी की कि दोषसिद्धि के बाद सजा के निलंबन (Suspension of Sentence) के मानक ‘प्री-ट्रायल’ जमानत के मानकों से “गुणात्मक रूप से भिन्न” (qualitatively distinct) होते हैं, क्योंकि दोषसिद्धि के बाद आरोपी की बेगुनाही की धारणा समाप्त हो जाती है।
कानूनी मुद्दा: सजा का निलंबन बनाम प्री-ट्रायल बेल
अदालत के समक्ष मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि क्या हाईकोर्ट सजायाफ्ता दोषियों की सजा निलंबित करने के लिए उन्हीं सामान्य जमानत सिद्धांतों को लागू कर सकता है जो मुकदमे की सुनवाई के दौरान लागू होते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सीआरपीसी की धारा 389 के तहत, सजा का निलंबन एक नियम के बजाय अपवाद होना चाहिए, विशेषकर हत्या जैसे गंभीर अपराधों में।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 4 जनवरी, 2016 को बिहार के बक्सर में हुई एक घटना से संबंधित है। अपीलकर्ता/मुखबिर धनजी पांडे के अनुसार, जब वह और उनके बड़े भाई रमाशंकर पांडे मोटरसाइकिल से जा रहे थे, तब आरोपियों ने उन्हें रोक लिया। आरोप था कि स्थानीय चुनाव की राजनीतिक रंजिश के कारण यह हमला किया गया था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, दो आरोपियों ने मृतक को पकड़ लिया जबकि मुख्य आरोपी शिवजी पांडे ने उसके सिर में गोली मार दी। प्रतिवादी नंबर 2 (शेखर पांडे) सहित अन्य आरोपियों ने मुखबिर पर भी गोलियां चलाईं, जिससे वह बाल-बाल बच गए। 18 अगस्त, 2018 को ट्रायल कोर्ट ने शेखर पांडे और अन्य को आईपीसी की धारा 302, 307/34 और आर्म्स एक्ट के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
दोषियों ने पटना हाईकोर्ट में अपील दायर की। अपील लंबित रहने के दौरान, हाईकोर्ट ने नवंबर 2024 और मई 2025 में उनकी सजा निलंबित कर उन्हें जमानत दे दी। हाईकोर्ट ने मुख्य रूप से इस बात पर गौर किया कि घातक गोली एक सह-आरोपी ने चलाई थी और दोषी लंबे समय से जेल में थे।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ता (मुखबिर) की ओर से: वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि एक बार जब व्यक्ति हत्या जैसे गंभीर अपराध के लिए दोषी ठहरा दिया जाता है, तो उसकी बेगुनाही का अनुमान खत्म हो जाता है। यह तर्क दिया गया कि हाईकोर्ट ने धारा 389 सीआरपीसी के स्तर पर सबूतों का पुनर्मूल्यांकन (re-appreciation of evidence) करके गलती की है। साथ ही दोषियों के आपराधिक इतिहास और मुखबिर के परिवार को मिल रही धमकियों का भी हवाला दिया गया।
बिहार राज्य की ओर से: राज्य सरकार ने अपीलकर्ता का समर्थन किया और जमानत रद्द करने की मांग की। राज्य का तर्क था कि चूंकि प्रतिवादी उम्रकैद का दोषी है, इसलिए केवल लंबे समय तक जेल में रहना सजा के निलंबन का आधार नहीं हो सकता।
प्रतिवादी (दोषी) की ओर से: बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि यह मामला चुनावी रंजिश के कारण झूठा फंसाने का है। उन्होंने चश्मदीद गवाहों और मेडिकल रिपोर्ट के बीच विरोधाभास का दावा किया। दोषियों की ओर से ‘सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम सीबीआई’ और ‘पी. रामचंद्र राव बनाम कर्नाटक राज्य’ मामलों का हवाला देते हुए कहा गया कि अपील के निपटारे में देरी के कारण उन्हें जमानत मिलनी चाहिए।
कोर्ट का विश्लेषण: ‘उच्च जांच’ (Higher Scrutiny) का सिद्धांत
सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि धारा 389 सीआरपीसी के तहत अपीलीय अदालत को अपनी शक्तियों का प्रयोग “अत्यधिक सावधानी और संयम” (circumspection and restraint) के साथ करना चाहिए। पीठ ने कहा कि दोषसिद्धि के बाद आरोपी की कानूनी स्थिति पूरी तरह बदल जाती है।
‘हरियाणा राज्य बनाम हसमत (2004)’ मामले का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा:
“धारा 389 की आवश्यक शर्तों में से एक यह है कि अपीलीय अदालत को सजा के निलंबन का आदेश देते समय लिखित रूप में कारण दर्ज करने चाहिए… सजा के निलंबन और जमानत का आदेश नियमित तरीके से पारित नहीं किया जाना चाहिए।”
कोर्ट ने ‘ओम प्रकाश साहनी बनाम जय शंकर चौधरी (2023)’ मामले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि सजा का निलंबन केवल तभी उचित है जब रिकॉर्ड पर कोई “स्पष्ट त्रुटि” (palpable infirmity) दिखाई दे। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट ने सबूतों का समय पूर्व पुनर्मूल्यांकन किया, जो इस स्तर पर कानूनी रूप से गलत है।
हाईकोर्ट द्वारा इस बात पर गौर करने कि शेखर पांडे ने मुख्य गोली नहीं चलाई थी, सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“धारा 34 आईपीसी के तहत ‘समान इरादे’ (common intention) का सिद्धांत सुस्थापित है; जहां एक अपराध समान इरादे को आगे बढ़ाने के लिए किया जाता है, वहां प्रत्येक प्रतिभागी उस कार्य के लिए समान रूप से उत्तरदायी होता है। किसी विशिष्ट घातक भूमिका का अभाव इस स्तर पर दोषी की आपराधिकता को कम नहीं करता है।”
कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि हाईकोर्ट द्वारा सजा का निलंबन किया जाना न्यायसंगत नहीं था। पीठ ने अपीलों को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के आदेशों को रद्द कर दिया।
अदालत के निर्देश:
- प्रतिवादियों (शेखर पांडे और घनश्याम पांडे) के जमानत बांड रद्द किए जाते हैं।
- प्रतिवादियों को आज से दो सप्ताह के भीतर संबंधित ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया जाता है।
- यदि वे आत्मसमर्पण नहीं करते हैं, तो ट्रायल कोर्ट को कानून के अनुसार उन्हें हिरासत में लेने के लिए आवश्यक कदम उठाने का निर्देश दिया जाता है।
मामले का विवरण:
केस टाइटल: धनजी पांडे बनाम बिहार राज्य एवं अन्य
केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 1864/2026
पीठ: जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन
तारीख: 10 अप्रैल, 2026

