सीनियर एडवोकेट और अखिल भारतीय बार एसोसिएशन (AIBA) के अध्यक्ष डॉ. आदिश सी. अग्रवाल ने भारत की राष्ट्रपति माननीया द्रौपदी मुर्मू को एक पत्र लिखकर जस्टिस यशवंत वर्मा का इस्तीफा स्वीकार न करने का अनुरोध किया है। डॉ. अग्रवाल, जो सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के पूर्व अध्यक्ष भी रहे हैं, ने तर्क दिया कि इस्तीफे पर तब तक रोक लगाई जानी चाहिए जब तक कि संसद में लंबित महाभियोग (impeachment) की कार्यवाही किसी निर्णायक निष्कर्ष तक नहीं पहुंच जाती।
मामले की पृष्ठभूमि
10 अप्रैल, 2026 को लिखे गए इस पत्र में डॉ. अग्रवाल ने “अत्यधिक संवैधानिक महत्व” के मुद्दे को रेखांकित किया है। पत्र के अनुसार, भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना ने शुरू में जस्टिस यशवंत वर्मा को इस्तीफा देने के लिए कहा था। हालांकि, उस समय जस्टिस वर्मा ने पद छोड़ने के बजाय जांच का सामना करने का विकल्प चुना था।
डॉ. अग्रवाल ने इस बात की ओर इशारा किया कि वर्तमान में जस्टिस वर्मा के विरुद्ध भारतीय संसद में महाभियोग की कार्यवाही लंबित है। उन्होंने कहा कि इस मोड़ पर इस्तीफा देना जवाबदेही और संवैधानिक प्रक्रियाओं की अखंडता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
जवाबदेही से जुड़े महत्वपूर्ण सरोकार
AIBA अध्यक्ष ने चिंता व्यक्त की कि इस समय इस्तीफा स्वीकार करने से चल रही महाभियोग की प्रक्रिया “निष्प्रभावी” (infructuous) हो जाएगी।
पत्र में स्पष्ट किया गया है:
“ऐसी परिस्थितियों में, इस्तीफा स्वीकार करने से लंबित महाभियोग कार्यवाही निष्प्रभावी हो सकती है, जिससे उन मुद्दों पर पूर्ण और पारदर्शी निर्णय लेने की प्रक्रिया बाधित होगी जो विशेष रूप से संविधान के तहत परिकल्पित है।”
डॉ. अग्रवाल ने आगे जोर देकर कहा कि इस तरह के कदम से न्यायिक जवाबदेही के मामलों में संसदीय निरीक्षण (oversight) की प्रभावकारिता कमजोर हो सकती है। उनका मानना है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता, विश्वसनीयता और गरिमा हमारे संवैधानिक ढांचे की नींव हैं, और जन विश्वास को प्रभावित करने वाले आरोपों का समाधान संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार ही होना अनिवार्य है।
राष्ट्रपति से हस्तक्षेप का अनुरोध
“व्यापक जनहित” का हवाला देते हुए, डॉ. अग्रवाल ने राष्ट्रपति से अनुरोध किया कि महाभियोग प्रक्रिया को अपने तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचने दिया जाए।
उन्होंने पत्र में लिखा:
“मैं महामहिम से सम्मानपूर्वक आग्रह करता हूं कि इस स्तर पर जस्टिस वर्मा का इस्तीफा स्वीकार न करने पर विचार करें और महाभियोग की कार्यवाही को कानून के अनुसार आगे बढ़ने दें, ताकि शामिल मुद्दों पर निर्णायक रूप से निर्णय लिया जा सके।”
पत्र के अंत में इस बात पर बल दिया गया है कि न्याय वितरण प्रणाली की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए इन मुद्दों का निर्णायक समाधान आवश्यक है।

