सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि डिक्री का निष्पादन (execution) करने वाली अदालत (एग्जीक्यूटिंग कोर्ट) के पास किसी भी ‘समझौता डिक्री’ (Compromise Decree) की शर्तों में संशोधन करने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि एग्जीक्यूटिंग कोर्ट की भूमिका केवल डिक्री को उसके मूल रूप में लागू करने तक ही सीमित है। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, यदि डिक्री में निर्धारित भूमि के हिस्सों का आदान-प्रदान निर्माण कार्यों या किसी अन्य कारण से “अव्यवहारिक” (impracticable) लगता है, तब भी अदालत अपनी मर्जी से डिक्री की शर्तों को बदल नहीं सकती।
जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने महाराष्ट्र के पांचगणी में स्थित जमीन से जुड़ी 2017 की एक समझौता डिक्री में बदलाव करने वाले एग्जीक्यूटिंग कोर्ट और हाईकोर्ट के आदेशों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि मूल डिक्री को उसके वास्तविक “शब्दों और भाव” (terms and tenor) के अनुसार ही लागू किया जाए।
मामले की पृष्ठभूमि
विवाद सतारा जिले के पांचगणी गाँव में स्थित प्लॉट नंबर 396(A) की कृषि-योग्य भूमि से संबंधित है। अपीलकर्ता (वादी) ने मूल रूप से 97.12R जमीन खरीदी थी, जिसमें से कुछ हिस्सा प्रतिवादी को बेचा गया था। बाद में, 51R जमीन को लेकर विवाद हुआ, जिसे सुलझाने के लिए दोनों पक्षों ने 8 जुलाई, 2017 को एक समझौता किया।
इस समझौते के आधार पर 14 जुलाई, 2017 को एक डिक्री तैयार की गई, जिसमें प्रावधान था कि:
- 10R जमीन रास्ता और अन्य अधिकारों के लिए साझा रहेगी।
- शेष 41R जमीन को दो बराबर हिस्सों (20.5R प्रत्येक) में बांटा जाएगा।
- डिक्री में स्पष्ट रूप से सीमाओं का विवरण दिया गया था कि कौन सा हिस्सा अपीलकर्ता के पास जाएगा और कौन सा प्रतिवादी के पास।
जब प्रतिवादी ने डिक्री लागू करने के लिए याचिका दायर की, तो एग्जीक्यूटिंग कोर्ट ने जुलाई और अगस्त 2021 में आदेश पारित कर डिक्री में आवंटित हिस्सों को बदल दिया। निचली अदालत का तर्क था कि जमीन पर कुछ निर्माण स्वीकृत नक्शे के अनुसार नहीं थे, इसलिए डिक्री का पालन करना “व्यावहारिक नहीं” था। हाईकोर्ट ने भी 21 अप्रैल, 2022 को इस बदलाव को सही ठहराया था।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ता की दलीलें: अपीलकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट श्री शोएब आलम ने तर्क दिया कि कानून का यह स्थापित सिद्धांत है कि एग्जीक्यूटिंग कोर्ट डिक्री के पीछे नहीं जा सकती। उन्होंने कहा कि अदालत को डिक्री वैसी ही लागू करनी चाहिए जैसी वह है, और उसमें किसी भी प्रकार का फेरबदल करना कानूनी रूप से गलत है।
प्रतिवादी की दलीलें: प्रतिवादी की ओर से वकील श्री गोपाल झा ने दलील दी कि एग्जीक्यूटिंग कोर्ट ने डिक्री की सही व्याख्या की है ताकि उसे निष्पादित किया जा सके। उन्होंने जय नारायण राम लुंडिया बनाम केदार नाथ खेतान और अन्य (1956) मामले का हवाला देते हुए कहा कि अदालत यह सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र है कि पक्षों को वही मिले जो डिक्री में निर्देशित है।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 47 का विश्लेषण किया, जो डिक्री लागू करने वाली अदालत के अधिकारों को तय करती है। कोर्ट ने कहा:
“उक्त प्रावधान के स्पष्ट पठन से यह साफ है कि एग्जीक्यूटिंग कोर्ट को डिक्री के निष्पादन, निर्वहन या संतुष्टि से संबंधित प्रश्नों को तय करने का अधिकार है, लेकिन उसके पास डिक्री की सीमाओं से बाहर जाने का कोई क्षेत्राधिकार नहीं है।”
अदालत ने वासुदेव धनजीभाई मोदी बनाम राजाभाई अब्दुल रहमान (1970) मामले का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि जब तक किसी डिक्री को अपील या पुनरीक्षण के माध्यम से रद्द नहीं किया जाता, तब तक वह पक्षकारों पर बाध्यकारी होती है।
प्रतिवादी द्वारा उद्धृत जय नारायण राम लुंडिया मामले पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एग्जीक्यूटिंग कोर्ट केवल तभी हस्तक्षेप कर सकती है जब जमीन की पहचान को लेकर कोई विवाद हो। वर्तमान मामले में जमीन के हिस्सों की पहचान डिक्री में पूरी तरह स्पष्ट थी।
पीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की:
“वर्तमान मामले में, दोनों पक्षों के हिस्सों में आने वाली जमीन की पहचान को लेकर कोई विवाद नहीं है। समझौता डिक्री स्पष्ट रूप से दोनों पक्षों को आवंटित भूमि के हिस्सों का वर्णन करती है। इसलिए, एग्जीक्यूटिंग कोर्ट को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि दोनों पक्ष अपने दायित्वों को पूरा करें और डिक्री के अनुसार जमीन का आदान-प्रदान करें।”
कोर्ट ने आगे कहा कि जमीन पर अवैध निर्माण या किसी तीसरे पक्ष को जमीन बेचे जाने जैसे कारण एग्जीक्यूटिंग कोर्ट के लिए डिक्री बदलने का आधार नहीं हो सकते।
कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि एग्जीक्यूटिंग कोर्ट ने समझौता डिक्री की शर्तों को बदलकर अपने क्षेत्राधिकार का उल्लंघन किया है।
“चूंकि एग्जीक्यूटिंग कोर्ट ने 19.07.2021 और 26.08.2021 के आदेश पारित करके अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर डिक्री की शर्तों को बदल दिया है, इसलिए ये आदेश कानून की नजर में टिकने योग्य नहीं हैं।”
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए एग्जीक्यूटिंग कोर्ट और हाईकोर्ट के आदेशों को रद्द कर दिया और मामले को वापस भेजते हुए मूल डिक्री को अक्षरशः लागू करने का निर्देश दिया।
मामले का विवरण:
- केस टाइटल: मॉरिस डब्ल्यू. इनिस बनाम लिली काज़रूनी @ लिली आरिफ शेख
- केस नंबर: सिविल अपील नंबर ___ ऑफ 2026 (SLP (C) No. 8166/2022 से उत्पन्न)
- पीठ: जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले
- फैसले की तारीख: 09 अप्रैल, 2026

