क्या धारा 468 CrPC के तहत समय-सीमा शिकायत दर्ज करने की तारीख से शुरू होती है या संज्ञान से? सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें समय-सीमा (Limitation) के आधार पर एक आपराधिक मामले को खारिज कर दिया गया था। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 468 के तहत समय-सीमा की गणना के लिए प्रासंगिक तारीख शिकायत दर्ज करने या अभियोजन शुरू करने की तिथि है, न कि वह तारीख जब मजिस्ट्रेट मामले का संज्ञान (Cognizance) लेता है।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने शिकायतकर्ता रोमा आहूजा द्वारा दायर अपीलों को स्वीकार करते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने संज्ञान की तारीख पर ध्यान केंद्रित करके एक “गंभीर त्रुटि” (Patent error) की है। कोर्ट ने दोहराया कि इस मुद्दे पर कानून संविधान पीठ द्वारा पूरी तरह से स्थापित है और स्थापित मिसालों के खिलाफ बहस करने के प्रयासों की आलोचना की।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद 9 मई 2011 को दिल्ली के मोती नगर में स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के परिसर में हुई एक घटना से शुरू हुआ था। अपीलकर्ता रोमा आहूजा ने आरोप लगाया कि प्रतिवादी संख्या 2 (एक वकील आशुतोष) ने उनके साथ गाली-गलौज और मारपीट की, जिससे उनके सिर, आंख और कंधे पर चोटें आईं। इसके परिणामस्वरूप क्रॉस-FIR दर्ज हुईं: प्रतिवादी द्वारा अपीलकर्ता के खिलाफ FIR नंबर 120/2011 और अपीलकर्ता द्वारा प्रतिवादी के खिलाफ FIR नंबर 121/2011 (जो इस अपील का विषय है)।

FIR नंबर 121/2011 में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 323 और 341 के तहत अपराधों का आरोप लगाया गया था। जहां प्रतिवादी की क्रॉस-FIR में आरोप पत्र 13 जुलाई 2011 को तुरंत दायर किया गया था, वहीं अपीलकर्ता के मामले में आरोप पत्र 29 मई 2012 को दायर किया गया—जो घटना की तारीख से एक वर्ष और 20 दिन बाद था।

ट्रायल कोर्ट ने FIR नंबर 121/2011 में अपराधों का संज्ञान लिया। प्रतिवादी ने बार-बार इस आधार पर मामले को रद्द करने की मांग की कि चूंकि अपराधों के लिए अधिकतम सजा एक वर्ष थी, इसलिए धारा 468(2)(b) CrPC के तहत एक वर्ष की समय-सीमा मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लेने से पहले ही समाप्त हो गई थी। 30 जनवरी 2025 को, दिल्ली हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार कर लिया और FIR को इस आधार पर रद्द कर दिया कि धारा 468 के तहत प्रतिबंध पूर्ण (Absolute) है।

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पक्षों के तर्क

अपीलकर्ता और राज्य के वकील ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट का दृष्टिकोण सुप्रीम कोर्ट के स्थापित फैसलों के विपरीत था। उन्होंने कहा कि आरोप पत्र दाखिल करने में देरी जांच अधिकारी के “लापरवाह रवैये” के कारण हुई थी और किसी शिकायतकर्ता को राज्य मशीनरी की लापरवाही के लिए दंडित नहीं किया जाना चाहिए।

प्रतिवादी के वकील ने तर्क दिया कि CrPC की धारा 2(d) के तहत ‘शिकायत’ और धारा 2(r) के तहत ‘पुलिस रिपोर्ट’ के बीच अंतर है। उनका कहना था कि हालांकि यह नियम निजी शिकायतों पर लागू हो सकता है, लेकिन FIR और पुलिस रिपोर्ट के माध्यम से शुरू किए गए मामलों में संज्ञान की तारीख ही निर्णायक होनी चाहिए। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि इस विषय पर ऐतिहासिक फैसलों पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।

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कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने निजी शिकायतों और पुलिस रिपोर्टों के बीच प्रतिवादी द्वारा बताए गए अंतर को खारिज कर दिया। जस्टिस एन.वी. अंजारिया ने पीठ के लिए लिखते हुए कहा:

“आपराधिक कार्यवाही दोनों श्रेणियों में तब शुरू हुई मानी जा सकती है जब मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत दर्ज की जाती है या पुलिस के पास FIR दर्ज की जाती है।”

कोर्ट ने सारा मैथ्यू बनाम इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियो वैस्कुलर डिजीज (2014) के संविधान पीठ के फैसले पर भरोसा किया। पीठ ने उल्लेख किया कि ‘सारा मैथ्यू’ मामले में भारत दामोदर काले बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2003) और जापानी साहू बनाम चंद्र शेखर मोहंती (2007) में व्यक्त किए गए दृष्टिकोण की पुष्टि की गई थी, जबकि कृष्ण पिल्लई बनाम टी.ए. राजेंद्रन (1990) के फैसले को गलत कानून घोषित किया गया था।

कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि “संज्ञान लेना” अदालत का एक कार्य है जिस पर शिकायतकर्ता का कोई नियंत्रण नहीं होता है। कानूनी सिद्धांत actus curiae neminem gravabit (अदालत का कार्य किसी को नुकसान नहीं पहुंचाएगा) का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:

“…एक सतर्क शिकायतकर्ता या अभियोजन एजेंसी जिसने तुरंत शिकायत दर्ज की है, उसे गंभीर नुकसान होगा यदि यह माना जाए कि समय-सीमा की गणना के लिए प्रासंगिक बिंदु वह तारीख होगी जब मजिस्ट्रेट संज्ञान लेता है।”

पीठ ने वकीलों के आचरण पर भी टिप्पणी की और कहा कि “जिस कानूनी बिंदु पर पहले ही निर्णय लिया जा चुका है, उस पर बहस छोड़ देना एक पेशेवर गुण है।”

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निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि FIR घटना के दिन (9 मई 2011) ही दर्ज की गई थी, इसलिए आपराधिक कार्यवाही शुरू करना धारा 468(2)(b) CrPC के तहत निर्धारित एक वर्ष की समय-सीमा के भीतर था।

कोर्ट ने कहा:

“जैसा कि सारा मैथ्यू मामले में संविधान पीठ ने निर्धारित किया है, धारा 468 CrPC के तहत समय-सीमा की गणना के लिए प्रासंगिक तारीख शिकायत दर्ज करने की तारीख या आपराधिक कार्यवाही शुरू करने की तारीख है, न कि वह तारीख जिस दिन मजिस्ट्रेट अपराध का संज्ञान लेता है।”

नतीजतन, कोर्ट ने 30 जनवरी 2025 के हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि ट्रायल कानून के अनुसार तेजी से आगे बढ़े।

मामले का विवरण

  • केस शीर्षक: रोमा आहूजा बनाम राज्य और अन्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 1831-1832 ऑफ 2026 (SLP (Crl.) नंबर 9971-9972 ऑफ 2025 से उत्पन्न)
  • पीठ: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया
  • तारीख: 09 अप्रैल, 2026

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