सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए एक दशक पुराने वैवाहिक विवाद को समाप्त कर दिया है, जिसे कोर्ट ने “सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए मृत” (dead for all practical purposes) करार दिया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने स्पष्ट किया कि पत्नी का उच्च शिक्षित या प्रोफेशनल रूप से योग्य होना, पति को उसके कानूनी और नैतिक कर्तव्यों से मुक्त नहीं करता है।
पीठ ने पति द्वारा शुरू की गई 80 से अधिक कानूनी कार्यवाहियों को रद्द कर दिया और उसके आचरण को “प्रतिशोधी और दमनकारी” बताया। अदालत ने विवाद को पूरी तरह समाप्त करने के लिए पति को ₹5 करोड़ की समेकित राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता-पत्नी और प्रतिवादी-पति का विवाह 20 जनवरी 2010 को हुआ था और उनके दो नाबालिग बेटे हैं। आपसी मतभेदों के चलते दोनों 9 अक्टूबर 2016 से अलग रह रहे हैं। कोर्ट ने पाया कि अलग होने के बाद से ही दोनों पक्ष “एक दशक से चल रहे मुकदमों के दुष्चक्र” में फंसे हुए थे।
विवाद तब और गहरा गया जब 2019 में फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए ₹80,000 प्रति माह के अंतरिम गुजारा भत्ता आदेश का पति ने पालन नहीं किया। पेशे से वकील होने के बावजूद पति ने लगातार चूक की, जिसके कारण कई निष्पादन याचिकाएं दायर की गईं। मामला सुप्रीम कोर्ट तब पहुंचा जब बॉम्बे हाईकोर्ट ने पत्नी की त्वरित सुनवाई की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि अब नियमित जज की नियुक्ति हो चुकी है।
पक्षों की दलीलें
पत्नी की ओर से: वरिष्ठ वकील श्री अमित रावल ने तर्क दिया कि विवाह पूरी तरह से टूट चुका है और सुलह की कोई गुंजाइश नहीं है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि पति ने अपनी कानूनी विशेषज्ञता का दुरुपयोग कर पत्नी, उसके परिवार और यहां तक कि उसके वकीलों के खिलाफ भी 80 से अधिक केस दर्ज कराए हैं। यह भी आरोप लगाया गया कि पति ने अपनी वित्तीय स्थिति छिपाने के लिए जानबूझकर कंपनियों के निदेशक पदों से इस्तीफा दे दिया।
पति की ओर से: स्वयं पैरवी करते हुए पति ने गुजारा भत्ते का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दावा किया कि पत्नी ने धारा 498A और घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत झूठे केस दर्ज कराए, जिसके कारण उन्हें जेल जाना पड़ा। उनका तर्क था कि पत्नी एक उच्च योग्य प्रोफेशनल है और उसकी आय अच्छी है, इसलिए गुजारा भत्ते की मांग अनुचित है। उन्होंने यह भी कहा कि वैवाहिक घर उनके पिता की संपत्ति है और पत्नी से ₹20 करोड़ के मुआवजे की मांग की।
कोर्ट की टिप्पणियां और विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने पति के आचरण को “असहयोगी और शत्रुतापूर्ण” पाया। पीठ ने कहा:
“प्रतिवादी-पति ने हर स्तर पर अपनी पत्नी, उसके रिश्तेदारों और यहां तक कि उसके वकीलों के खिलाफ अनगिनत आवेदन और शिकायतें दर्ज करके कार्यवाही को जटिल बनाने की कोशिश की है। इनमें से अधिकांश कार्यवाहियां प्रतिशोधी और परेशान करने वाली प्रतीत होती हैं।”
पत्नी की योग्यता के आधार पर गुजारा भत्ता न देने के पति के तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा:
“भले ही अपीलकर्ता-पत्नी उच्च शिक्षित और प्रोफेशनल रूप से योग्य हो, लेकिन यह अपने आप में प्रतिवादी-पति को अपनी पत्नी और बच्चों के प्रति उसके वैवाहिक, पितृत्व, नैतिक और कानूनी उत्तरदायित्वों से मुक्त करने का कारण नहीं हो सकता।”
कोर्ट ने पति की वित्तीय अक्षमता के दावे को एक “छल” करार दिया। मुकदमों की अधिकता को देखते हुए कोर्ट ने इसकी तुलना “महाभारत के युद्ध” से की और कहा कि अनुच्छेद 142 का प्रयोग “पूर्ण न्याय करने और इस दशक पुराने विवाद को शांत करने के लिए” अनिवार्य है।
अदालत का निर्णय
अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- विवाह विच्छेद: विवाह को ‘इरिट्रीवेबल ब्रेकडाउन’ (irretrievable breakdown) के आधार पर भंग माना जाएगा।
- मुकदमों की समाप्ति: दोनों पक्षों के बीच लंबित सभी सिविल और आपराधिक केस, FIR और पत्नी के वकीलों के खिलाफ बार काउंसिल में दर्ज शिकायतें रद्द कर दी गईं।
- वित्तीय सेटलमेंट: पति को एक वर्ष के भीतर स्थायी गुजारा भत्ता, बच्चों की देखभाल और मुकदमों के खर्च के रूप में ₹5 करोड़ का भुगतान करने का आदेश दिया गया।
- कस्टडी और मुलाकात: दोनों बेटों की कस्टडी पत्नी के पास रहेगी, जबकि पति को हर महीने के दूसरे सप्ताहांत (weekend) पर मिलने और छुट्टियों के दौरान सीमित कस्टडी का अधिकार होगा।
- पासपोर्ट में सहयोग: पति को बेटे के कनाडाई पासपोर्ट के नवीनीकरण में पूरा सहयोग करना होगा, ऐसा न करने पर अवमानना की कार्यवाही हो सकती है।
- संपत्ति का कब्ज़ा: ₹5 करोड़ की पूरी राशि प्राप्त होने के दो सप्ताह के भीतर पत्नी को मुंबई स्थित फ्लैट का कब्ज़ा पति के पिता को सौंपना होगा।
कोर्ट ने पति को यह वचन देने का भी निर्देश दिया कि वह भविष्य में पत्नी या उसके कानूनी दल के खिलाफ कोई नया मुकदमा दायर नहीं करेगा।
केस विवरण ब्लॉक
- केस का शीर्षक: XXX बनाम YYY
- केस नंबर: सिविल अपील (SLP (Civil) No. 28311 of 2024 से उत्पन्न)
- तारीख: 07 अप्रैल, 2026
- पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता

