दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि पत्नी को संपत्ति की बिक्री से कोई एकमुश्त राशि प्राप्त हुई है, तो उसे अंतरिम भरण-पोषण (Interim Maintenance) के साथ समायोजित (Adjust) किया जाना चाहिए। हालांकि, यह समायोजन दोनों पक्षों के अलग होने की तारीख से नहीं, बल्कि उस तिथि से शुरू होगा जब भरण-पोषण का आवेदन दायर किया गया था। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने टिप्पणी की कि यह निर्णय उस कानूनी सिद्धांत के अनुरूप है जिसके तहत भरण-पोषण आमतौर पर आवेदन की तारीख से ही प्रदान किया जाता है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता (पति) और प्रतिवादी (पत्नी) का विवाह 13 नवंबर, 2013 को हुआ था और मार्च 2019 में वे अलग हो गए। कानूनी कार्यवाही के दौरान यह तथ्य सामने आया कि रोहिणी स्थित एक संपत्ति, जिसे पति के पैसे से 2018 में पत्नी के नाम पर खरीदा गया था, अलगाव के बाद 2019 में बेच दी गई थी। पत्नी ने स्वीकार किया कि बैंक ऋण चुकाने के बाद उसे बिक्री से लगभग ₹20,00,000 प्राप्त हुए थे।
31 मई, 2023 को फैमिली कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 125 के तहत पत्नी और नाबालिग बेटे के लिए ₹25,000 प्रति माह का अंतरिम भरण-पोषण तय किया, लेकिन पत्नी के पास मौजूद ₹20,00,000 की राशि पर विचार नहीं किया। पति ने इस आदेश की समीक्षा (Review) के लिए आवेदन किया, जिसे फैमिली कोर्ट ने 2 अगस्त, 2024 को खारिज कर दिया। इसके बाद पति ने हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की।
पक्षों के तर्क
याचिकाकर्ता पति का तर्क था कि पत्नी तत्काल भरण-पोषण की हकदार नहीं है क्योंकि उसके पास पहले से ही संपत्ति की बिक्री से प्राप्त ₹20,00,000 की बड़ी राशि उपलब्ध है। उन्होंने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट द्वारा इस राशि को भरण-पोषण की देनदारी के विरुद्ध समायोजित करने से इनकार करना गलत था।
वहीं, प्रतिवादी पत्नी ने राशि प्राप्त होने की बात स्वीकार की, लेकिन कहा कि यह राशि 2020 और 2021 के दौरान उसने अपनी और बच्चे की देखभाल पर खर्च कर दी थी।
कोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष
हाईकोर्ट ने पति की आय (MCD में जूनियर इंजीनियर) के आधार पर ₹25,000 की राशि को उचित माना, लेकिन समायोजन की अवधि के संबंध में निचली अदालत की कानूनी त्रुटि को रेखांकित किया। जस्टिस शर्मा ने समायोजन की शुरुआत को लेकर महत्वपूर्ण निष्कर्ष साझा किया:
“स्थापित कानूनी स्थिति को देखते हुए कि अंतरिम भरण-पोषण आवेदन दायर करने की तारीख से दिया जाना चाहिए, उक्त राशि का समायोजन भी आवेदन दाखिल करने की तारीख से ही किया जाना चाहिए, न कि अलगाव की तारीख से।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि अंतरिम स्तर पर अदालत को बेवफाई जैसे विवादित तथ्यों पर अंतिम राय देने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वे “सुनवाई (Trial) का विषय” हैं। कोर्ट का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि पत्नी के पास मौजूद संपत्ति को ध्यान में रखते हुए दोनों पक्षों की वित्तीय स्थिति संतुलित रहे।
निर्णय
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि पत्नी को प्राप्त ₹20,00,000 की राशि को आवेदन दाखिल करने की तिथि (23 अक्टूबर, 2020) से ₹25,000 प्रति माह के भरण-पोषण के विरुद्ध समायोजित किया जाएगा।
इस गणना के आधार पर, कोर्ट ने तय किया कि प्रतिवादी पत्नी और बच्चा तब तक नई मासिक राशि प्राप्त करने के हकदार नहीं होंगे जब तक कि समायोजित राशि पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाती। कोर्ट के अनुसार, पति की मासिक भरण-पोषण देने की देनदारी 24 जून, 2027 से दोबारा शुरू होगी।
इसके अतिरिक्त, सुप्रीम कोर्ट के रजनीश बनाम नेहा मामले का हवाला देते हुए, कोर्ट ने आदेश दिया कि PWDV एक्ट के तहत समानांतर कार्यवाही में भुगतान की गई किसी भी राशि को Cr.P.C. मामले के साथ समायोजित किया जाना चाहिए ताकि दोहरा भुगतान न हो।
केस विवरण:
- केस टाइटल: अनुराग मनोहर कांकेरवाल बनाम सोहम रानी
- केस नंबर: CRL.REV.P.(MAT.) 77/2024
- जज: जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा
- तारीख: 04 अप्रैल, 2026

