धारा 319 CrPC के तहत सम्मन जारी करने के लिए केवल आरोप पर्याप्त नहीं, पुख्ता सबूत जरूरी; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सम्मन आदेश रद्द किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुकेश सिंह उर्फ सलज सिंह द्वारा दायर एक आपराधिक अपील को स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके तहत उन्हें दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 319 के तहत मुकदमे का सामना करने के लिए सम्मन जारी किया गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि अतिरिक्त आरोपियों को बुलाने की शक्ति का प्रयोग बहुत ही सावधानी से किया जाना चाहिए और इसके लिए केवल संलिप्तता की संभावना से कहीं अधिक मजबूत सबूतों की आवश्यकता होती है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 6 सितंबर 2021 को हमीरपुर जिले के थाना मौदहा में दर्ज एक प्राथमिकी (FIR) से शुरू हुआ था। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि नामजद आरोपियों ने उनके बेटे मंगल पर जान से मारने की नीयत से लाठी, डंडे और कुल्हाड़ी से हमला किया। इस FIR में अपीलकर्ता मुकेश सिंह का नाम भी शामिल था।

हालांकि, जांच के दौरान विवेचक (IO) को ऐसे साक्ष्य मिले जिनसे संकेत मिला कि घटना के समय अपीलकर्ता मौके पर मौजूद नहीं था। स्वतंत्र गवाहों के बयानों और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) से पुष्टि हुई कि वह उस समय मौदहा में था। इसके परिणामस्वरूप, विवेचक ने अपीलकर्ता के खिलाफ कोई विश्वसनीय सबूत न पाते हुए उसे दोषमुक्त कर दिया और केवल तीन अन्य सह-आरोपियों के खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल किया।

ट्रायल के दौरान, तीन अभियोजन गवाहों (PW-1, PW-2 और PW-3) के परीक्षण के बाद, हमीरपुर स्थित ट्रायल कोर्ट ने 28 नवंबर 2025 को धारा 319 Cr.P.C. के तहत एक आवेदन स्वीकार कर लिया और अपीलकर्ता को अन्य आरोपियों के साथ मुकदमे का सामना करने के लिए तलब किया।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री कमल कृष्ण ने तर्क दिया कि सम्मन आदेश अवैध था और साक्ष्यों की उचित सराहना किए बिना “यांत्रिक तरीके” (mechanical manner) से पारित किया गया था। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि एक गहन जांच के बाद अपीलकर्ता को क्लीन चिट दी गई थी, जिसमें उसके ‘अन्यत्र उपस्थिति’ (alibi) के दावे की पुष्टि हुई थी। उन्होंने दलील दी कि ट्रायल के दौरान कोई नया या आपत्तिजनक सबूत सामने नहीं आया था, क्योंकि गवाहों के बयान केवल पुरानी बातों का दोहराव मात्र थे।

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दूसरी ओर, विपक्षी संख्या 2 (शिकायतकर्ता) के वकील ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि तीनों अभियोजन गवाहों ने विशेष रूप से अपीलकर्ता का नाम लिया है और कथित मारपीट में उसकी भूमिका का विवरण दिया है। उन्होंने तर्क दिया कि घायल गवाहों की गवाही का बहुत अधिक साक्ष्य मूल्य होता है और ट्रायल कोर्ट का आदेश पूरी तरह तर्कसंगत था।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस मदन पाल सिंह ने उल्लेख किया कि अपीलकर्ता को शुरू में आरोप-पत्रित नहीं किया गया था क्योंकि जांच में अपराध स्थल से उसकी अनुपस्थिति की पुष्टि हुई थी। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

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“अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयान, अधिक से अधिक, FIR में लगाए गए आरोपों के दोहराव के समान हैं और धारा 319 Cr.P.C. के तहत किसी व्यक्ति को सम्मन जारी करने के लिए आवश्यक उच्च स्तर की संतुष्टि को पूरा नहीं करते हैं।”

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले हरदीप सिंह बनाम पंजाब राज्य (2014) 3 SCC 92 पर भरोसा किया और उद्धृत किया:

“धारा 319 Cr.P.C. के तहत शक्ति एक विवेकाधीन और असाधारण शक्ति है। इसका प्रयोग कम से कम और केवल उन्हीं मामलों में किया जाना चाहिए जहां मामले की परिस्थितियां इसकी अनुमति दें… केवल वहीं जहां अदालत के सामने पेश किए गए साक्ष्यों से किसी व्यक्ति के खिलाफ मजबूत और ठोस सबूत (strong and cogent evidence) मिलते हों, वहां इस शक्ति का प्रयोग किया जाना चाहिए, न कि आकस्मिक और लापरवाह तरीके से।”

हाईकोर्ट ने आगे बृजेंद्र सिंह बनाम राजस्थान राज्य (2017) 7 SCC 706 का उल्लेख करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट को धारा 319 के तहत प्रथम दृष्टया राय बनाते समय जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री (जैसे CDR और स्वतंत्र गवाहों के बयान) पर भी विचार करना चाहिए, विशेषकर तब जब वे सामग्री यह संकेत देती हों कि आरोपी कहीं और था।

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कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट यह दर्ज करने में विफल रहा कि अपीलकर्ता के खिलाफ सबूत “संलिप्तता की मात्र संभावना से कहीं अधिक मजबूत” थे या यह कि यदि इन सबूतों का खंडन नहीं किया गया, तो अपीलकर्ता को सजा होने की संभावना है।

निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अपर सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश (SC/ST एक्ट), हमीरपुर द्वारा पारित 28 नवंबर 2025 का आदेश “अवैधता और विकृति” से ग्रस्त था और कानून की दृष्टि में टिकने योग्य नहीं है।

तदनुसार, हाईकोर्ट ने आपराधिक अपील स्वीकार की और सम्मन आदेश को रद्द कर दिया।

मामले का विवरण:

  • केस का नाम: मुकेश सिंह @ सलज सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 1354 ऑफ 2026
  • न्यायाधीश: जस्टिस मदन पाल सिंह
  • दिनांक: 6 अप्रैल, 2026

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