नोटिस अवधि में इनकार न करने पर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति प्रभावी, रिटायरमेंट के बाद बर्खास्तगी का अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि नियुक्तिकर्ता प्राधिकारी (appointing authority) निर्दिष्ट नोटिस अवधि के भीतर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (Voluntary Retirement) के नोटिस को स्पष्ट रूप से खारिज करने में विफल रहता है, तो वह सेवानिवृत्ति कानून के संचालन द्वारा स्वतः प्रभावी हो जाती है। कोर्ट ने आगे यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी सेवानिवृत्ति के बाद शुरू की गई कोई भी अनुशासनात्मक कार्रवाई या बर्खास्तगी का आदेश कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं है।

जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने यूको बैंक द्वारा दायर दो अपीलों को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। बैंक ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के उन आदेशों को चुनौती दी थी, जिनमें एक पूर्व मैनेजर को सेवानिवृत्ति लाभ देने का निर्देश दिया गया था और सेवा से उनकी बर्खास्तगी को रद्द कर दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

प्रतिवादी, एस.के. श्रीवास्तव, 1983 में यूको बैंक में क्लर्क-कम-गोडाउन कीपर के रूप में नियुक्त हुए थे और 2007 में मैनेजर के पद पर पदोन्नत हुए। जुलाई 2010 में, रायपुर शाखा में पदस्थापना के दौरान बैंक ने कुछ खातों में संदिग्ध लेनदेन पाए। इस बीच, प्रतिवादी ने 4 अक्टूबर, 2010 को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए तीन महीने का नोटिस दिया।

बैंक के जोनल ऑफिस ने 11 नवंबर, 2010 को कारण बताओ नोटिस (Show-cause notice) जारी कर स्पष्टीकरण मांगा, लेकिन सेवानिवृत्ति की तीन महीने की नोटिस अवधि 4 जनवरी, 2011 को समाप्त हो गई। प्रतिवादी 16 मई, 2011 तक सेवा में रहे, जिसके बाद उन्होंने काम पर आना बंद कर दिया। बैंक ने काफी समय बाद 29 जून, 2011 को उन्हें सूचित किया कि उनकी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति स्वीकार नहीं की गई है। इसके आठ महीने बाद, 5 मार्च, 2012 को बैंक ने चार्जशीट जारी की और अंततः उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पहले ही कर्मचारी के पक्ष में निर्णय देते हुए माना था कि नोटिस अवधि के दौरान इनकार न किए जाने के कारण उन्हें सेवानिवृत्त माना जाना चाहिए।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता (यूको बैंक): बैंक के वकील ने यूको बैंक (अधिकारी) सेवा विनियम, 1979 के विनियम 20(3)(ii) का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि कारण बताओ नोटिस जारी करना अनुशासनात्मक कार्यवाही के ‘लंबित’ होने के समान है। बैंक का कहना था कि कार्यवाही लंबित रहने के दौरान स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति स्वीकार नहीं की जा सकती।

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प्रतिवादी (कर्मचारी): प्रतिवादी ने स्वयं पैरवी करते हुए तर्क दिया कि केवल कारण बताओ नोटिस जारी करने का अर्थ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करना नहीं है। उन्होंने कहा कि चूंकि 4 जनवरी, 2011 को नोटिस अवधि समाप्त होने तक कोई इनकार नहीं किया गया था, इसलिए उनकी सेवानिवृत्ति स्वतः प्रभावी हो गई।

एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae): कोर्ट की सहायता के लिए नियुक्त वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल ने बताया कि पेंशन विनियमों के नियम 29(2) के अनुसार, नोटिस अवधि के भीतर इनकार करने का एक सकारात्मक कार्य (positive act) आवश्यक है। उन्होंने तर्क दिया कि इस मामले में कारण बताओ नोटिस अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने के इरादे को नहीं दर्शाता।

कोर्ट का विश्लेषण

कोर्ट ने यूको बैंक (कर्मचारी) पेंशन विनियम, 1995 के विनियम 29 और सेवा विनियमों के बीच के संबंध की समीक्षा की। कोर्ट ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण निष्कर्ष साझा किए:

  1. मानित स्वीकृति (Deemed Acceptance): कोर्ट ने नोट किया कि विनियम 29(2) के प्रावधान के अनुसार, यदि प्राधिकारी नोटिस अवधि समाप्त होने से पहले अनुमति देने से इनकार नहीं करता है, तो सेवानिवृत्ति “नोटिस में निर्दिष्ट अवधि की समाप्ति की तारीख से प्रभावी हो जाएगी।”
  2. सामंजस्यपूर्ण व्याख्या (Harmonious Construction): कोर्ट ने माना कि सेवा विनियम बैंक को अनुशासनात्मक कार्यवाही का सामना कर रहे कर्मचारी को रोकने की अनुमति देते हैं, लेकिन इसे पेंशन विनियमों के साथ मिलाकर पढ़ना होगा। कोर्ट ने टिप्पणी की:
    “जबकि सेवा विनियम का विनियम 20(3)(i) और (ii) प्राधिकारी को वहां ‘अनुमोदन’ न देने की अनुमति देता है जहां अनुशासनात्मक कार्यवाही लंबित है; पेंशन विनियम का विनियम 29 भी अपने प्रावधान के माध्यम से नोटिस अवधि के भीतर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति से ‘इनकार’ करने की अनुमति देकर प्रभावी रूप से वही लक्ष्य प्राप्त करता है।”
  3. कारण बताओ नोटिस की प्रकृति: कोर्ट ने पाया कि 11 नवंबर, 2010 का कारण बताओ नोटिस केवल स्पष्टीकरण मांगने के लिए था और इसमें यह नहीं कहा गया था कि अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की जा रही है। कोर्ट ने कहा:
    “‘आगे की कार्रवाई’ का केवल उल्लेख करना अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने के इरादे के रूप में नहीं माना जा सकता।”
  4. न्यायाधिकार की सीमा: टेक चंद बनाम दिले राम मामले का संदर्भ देते हुए, कोर्ट ने दोहराया कि यदि नियम इनकार की अनुपस्थिति में स्वतः सेवानिवृत्ति का प्रावधान करते हैं, तो नोटिस अवधि की समाप्ति पर मालिक और सेवक का संबंध समाप्त हो जाता है।
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कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि प्रतिवादी की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति 4 जनवरी, 2011 से प्रभावी हो गई थी। इसके परिणामस्वरूप, बैंक के पास 2012 में चार्जशीट जारी करने या बर्खास्तगी का आदेश पारित करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था।

“हमारी राय में, यह मानना सही है कि जब कोई कर्मचारी मालिक-सेवक के संबंध को समाप्त करने का निर्णय लेता है और अवधि निर्दिष्ट करते हुए ऐसा नोटिस देता है, तो इनकार का कोई आदेश न होने की स्थिति में कानून के संचालन द्वारा यह प्रभावी हो जाएगा। इसके बाद चार्जशीट जारी करना और बर्खास्तगी का आदेश देना कानूनन उचित नहीं है।”

कोर्ट ने बैंक की अपीलों को खारिज कर दिया और निर्देश दिया कि बैंक तीन महीने के भीतर लागू ब्याज दर के साथ सभी बकाया और सेवानिवृत्ति लाभों का भुगतान करे।

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मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: यूको बैंक और अन्य बनाम एस.के. श्रीवास्तव
  • केस नंबर: सिविल अपील संख्या 375/2020 (साथ में सी.ए. संख्या 376/2020)
  • पीठ: जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई
  • तारीख: 07 अप्रैल, 2026

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