रेल दुर्घटना मुआवजा: यात्रा टिकट न मिलना ‘बोना फाइड पैसेंजर’ के दावे को खारिज करने का आधार नहीं; दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल का फैसला पलटा

दिल्ली हाईकोर्ट ने रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें यात्रा टिकट न मिलने के आधार पर मुआवजे के दावे को खारिज कर दिया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि यह साबित हो जाता है कि मृत्यु ट्रेन से गिरने के कारण हुई है, तो टिकट की बरामदगी न होने जैसे तकनीकी कारणों का महत्व सीमित रह जाता है।

जस्टिस मनोज कुमार ओहरी की पीठ ने अपील स्वीकार करते हुए कहा कि प्रतिवादी (रेलवे) यह साबित करने में विफल रहा कि मृतक एक वैध यात्री (Bona fide passenger) नहीं था। कोर्ट ने मामले को वापस ट्रिब्यूनल के पास भेजते हुए निर्देश दिया है कि मुआवजे की राशि निर्धारित कर उसका भुगतान सुनिश्चित किया जाए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद सोनू @ सूरज चोपड़ा की मृत्यु से जुड़े मुआवजे के दावे से संबंधित है। 7 जून, 2013 को सोनू अपने भाई विजय चोपड़ा और दोस्त जितेंद्र शर्मा के साथ हरिद्वार से पुरानी दिल्ली की यात्रा कर रहे थे। साहिबाबाद रेलवे स्टेशन के पास ट्रेन में भारी भीड़ और अचानक लगे झटके के कारण वह चलती ट्रेन से नीचे गिर गए। उन्हें तुरंत जीटीबी (GTB) अस्पताल ले जाया गया, जहाँ इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।

12 अप्रैल, 2017 को रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल ने इस दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि मृतक के पास से कोई वैध टिकट बरामद नहीं हुआ, इसलिए उन्हें ‘बोना फाइड पैसेंजर’ नहीं माना जा सकता। साथ ही, ट्रिब्यूनल ने इसे रेलवे अधिनियम के तहत ‘अनहोनी घटना’ (Untoward Incident) मानने से भी इनकार कर दिया था।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि ट्रिब्यूनल ने गवाहों के बयानों को नजरअंदाज कर गलती की है। गवाहों ने स्पष्ट किया था कि टिकट खरीदे गए थे, लेकिन दुर्घटना के दौरान मृतक का बैग खो जाने के कारण वे बरामद नहीं हो सके। उन्होंने कोर्ट का ध्यान पुलिस की डीडी (DD) प्रविष्टियों और चिकित्सा रिकॉर्ड की ओर आकर्षित किया, जो घटना की तत्काल पुष्टि करते हैं।

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दूसरी ओर, भारत संघ (रेलवे) के वकील ने ट्रिब्यूनल के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने तर्क दिया कि टिकट की अनुपस्थिति और गवाहों के बयानों में विरोधाभास के कारण यह मामला संदिग्ध है। रेलवे ने यह भी दावा किया कि यह घटना मृतक की अपनी लापरवाही का परिणाम थी, जैसा कि डीआरएम (DRM) रिपोर्ट में भी कहा गया है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

कोर्ट ने मुख्य रूप से दो बिंदुओं—’अनहोनी घटना’ की परिभाषा और ‘वैध यात्री’ की स्थिति—पर अपना ध्यान केंद्रित किया।

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1. अनहोनी घटना और लापरवाही पर: कोर्ट ने पाया कि ट्रिब्यूनल ने खुद यह माना था कि मृत्यु ट्रेन से गिरने के कारण हुई है। जस्टिस ओहरी ने स्पष्ट किया कि एक बार जब चलती ट्रेन से गिरना साबित हो जाता है, तो यह घटना रेलवे अधिनियम के तहत ‘अनहोनी घटना’ के दायरे में आती है। कोर्ट ने जोर देते हुए कहा कि धारा 124-A के तहत रेलवे की जिम्मेदारी बनती है, और “भीड़भाड़ या दरवाजे के पास खड़े होने” जैसी लापरवाही के आरोप रेलवे को इस वैधानिक दायित्व से मुक्त नहीं करते।

2. बोना फाइड पैसेंजर और टिकट की बरामदगी पर: टिकट न मिलने के मुद्दे पर कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध फैसले Union of India vs. Rina Devi (2019) 3 SCC 572 का हवाला देते हुए कहा:

“केवल टिकट बरामद न होना ही अपने आप में निर्णायक (conclusive) नहीं माना जा सकता।”

कोर्ट ने माना कि अपीलकर्ता ने यह साबित करने का प्रारंभिक भार पूरा कर लिया है कि टिकट खरीदा गया था। मृतक के भाई विजय चोपड़ा की गवाही और अस्पताल ले जाने संबंधी पुलिस रिकॉर्ड (DD No. 20B) से उनके साथ होने की पुष्टि होती है। कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के उस संदेह को भी खारिज कर दिया जिसमें आपातकालीन रिकॉर्ड में भाई का नाम न होने पर सवाल उठाए गए थे।

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कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि इस मामले में रीना देवी केस के मापदंड पूरी तरह लागू होते हैं और रेलवे के तर्क आधारहीन हैं।

कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के फैसले को दरकिनार करते हुए निर्देश दिया कि:

  • ट्रिब्यूनल मृतक के कानूनी वारिसों को देय मुआवजे की राशि का आकलन करे।
  • संबंधित अधिकारी इस आदेश की प्रति मिलने के दो महीने के भीतर मुआवजे का भुगतान करें।
  • इस उद्देश्य के लिए मामला 20 अप्रैल, 2026 को ट्रिब्यूनल के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए।

केस विवरण

  • केस का नाम: सुनीता बनाम भारत संघ (Sunita vs. Union of India)
  • केस संख्या: FAO 473/2017
  • पीठ: जस्टिस मनोज कुमार ओहरी
  • दिनांक: 06 अप्रैल, 2026

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