नए साक्ष्यों के बिना जाति सत्यापन की कार्यवाही बार-बार शुरू करना गलत: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जाति जांच समितियों के आदेशों को रद्द किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य और क्षेत्रीय स्तरीय जाति जांच समितियों (Caste Scrutiny Committees) द्वारा पारित उन आदेशों को रद्द कर दिया है, जिनके माध्यम से दो व्यक्तियों के जाति सत्यापन की प्रक्रिया को बार-बार खोलने का प्रयास किया गया था। जस्टिस नीरज तिवारी और जस्टिस गरिमा प्रशांत की खंडपीठ ने कहा कि प्रशासनिक और अर्ध-न्यायिक कार्यवाहियों को अनिश्चित काल तक जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि यह ‘निर्णय की अंतिमता’ (Principle of Finality) के सिद्धांत के विरुद्ध है और संबंधित पक्षों के उत्पीड़न का कारण बनता है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला अफ़ज़ाल अहमद और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 4 अन्य से संबंधित है। विवाद की शुरुआत 14 दिसंबर, 2011 को स्वर्गीय नजमुद्दीन द्वारा दायर एक शिकायत से हुई थी। शिकायतकर्ता का आरोप था कि याचिकाकर्ताओं ने “भिश्ती अब्बासी” (अन्य पिछड़ा वर्ग) श्रेणी से संबंधित होने के लिए फर्जी जाति प्रमाण पत्र प्राप्त किए थे।

शिकायत पर कार्यवाही करते हुए, राज्य सरकार ने जिला स्तरीय जाति जांच समिति, प्रयागराज को जांच के निर्देश दिए। 3 अप्रैल, 2014 को जिला समिति ने शिकायत को निराधार पाया और प्रमाण पत्रों की वैधता को बरकरार रखा। 2013 में मूल शिकायतकर्ता की मृत्यु के बावजूद, उनके बेटे (प्रतिवादी संख्या 5) ने इस निष्कर्ष को चुनौती देना जारी रखा। हालांकि जिला समिति ने 2016 में अपने निष्कर्षों को दोहराया और राज्य सरकार ने 2015 में औपचारिक रूप से कार्यवाही बंद कर दी थी, फिर भी क्षेत्रीय और राज्य स्तरीय समितियों ने नए सिरे से जांच के लिए मामले को रिमांड करना जारी रखा, जिसके कारण वर्तमान रिट याचिका दायर की गई।

पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता वी.के. सिंह ने तर्क दिया कि उनकी जाति की स्थिति की बार-बार जांच की गई और जिला स्तरीय समिति द्वारा दो बार उन्हें क्लीन चिट दी गई। उन्होंने दलील दी कि राज्य सरकार ने 2015 और 2022 में ही मामले को बंद (consigned to record) कर दिया था, और एक तीसरे पक्ष (शिकायतकर्ता के बेटे) के कहने पर जारी कार्यवाही केवल उत्पीड़न है।

प्रतिवादी संख्या 5 के वकील ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं ने पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षित सरकारी पद धोखाधड़ी के माध्यम से प्राप्त किए हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए प्रतिवादी ने तर्क दिया कि जाति प्रमाण पत्र की वैधता सार्वजनिक महत्व का मामला है और “संविधान के साथ धोखाधड़ी” को रोकने के लिए किसी तीसरे पक्ष द्वारा भी इसे उठाया जा सकता है।

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राज्य की ओर से पेश स्थायी अधिवक्ता (Standing Counsel) ने याचिकाकर्ताओं के दावों का समर्थन किया। उन्होंने पुष्टि की कि राज्य सरकार ने 28 अप्रैल, 2015 को ही मूल शिकायत को निराधार मानकर खारिज कर दिया था और सभी संबंधित कार्यवाहियों को समाप्त करने के निर्देश दिए थे।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने गौर किया कि पूरा विवाद “जाति सत्यापन कार्यवाही को बार-बार फिर से शुरू करने की वैधता” के इर्द-गिर्द घूमता है। कुमारी माधुरी पाटिल बनाम अतिरिक्त आयुक्त (1994) के ऐतिहासिक फैसले का उल्लेख करते हुए, पीठ ने स्पष्ट किया कि हालांकि जांच की एक व्यवस्था मौजूद है, लेकिन उस निर्णय को एक बिंदु पर अंतिम होना चाहिए।

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हाईकोर्ट ने कहा:

“प्रशासनिक और अर्ध-न्यायिक कार्यवाहियों को अनिश्चित काल तक जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती क्योंकि इससे निर्णय की अंतिमता का सिद्धांत विफल होगा और पार्टियों को अनावश्यक परेशानी का सामना करना पड़ेगा।”

पीठ ने आगे स्पष्ट किया कि हालांकि गलत जाति का दावा संविधान के साथ धोखाधड़ी है (जैसा कि एफ़सीआई बनाम जगदीश बलराम बाहिरा मामले में कहा गया है), लेकिन इस सिद्धांत को यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने पाया कि इस मामले में कई जांचों के बावजूद किसी भी सक्षम प्राधिकारी द्वारा धोखाधड़ी का कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं किया गया था।

‘लोकस स्टैंडी’ (कार्यवाही शुरू करने का अधिकार) के मुद्दे पर, कोर्ट ने डॉ. दुर्योधन साहू बनाम जितेंद्र कुमार मिश्रा (1998) और हरि बंश लाल बनाम सहोदर प्रसाद महतो (2010) का हवाला देते हुए टिप्पणी की:

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“किसी तीसरे पक्ष (स्ट्रेंजर) के पास नियुक्तियों या सेवा लाभों को चुनौती देने का अधिकार नहीं है; ऐसे विवाद अनिवार्य रूप से नियोक्ता और कर्मचारी के बीच के होते हैं।”

हाईकोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी संख्या 5, एक सह-ग्रामीण होने के नाते, अपनी कोई प्रत्यक्ष कानूनी क्षति साबित नहीं कर सका और वह सक्षम प्राधिकारियों द्वारा पहले से ही निष्कर्ष पर पहुँचाए गए मामले को बार-बार उठाने का हकदार नहीं है।

निर्णय

हाईकोर्ट ने क्षेत्रीय जाति जांच समिति द्वारा 18 दिसंबर, 2016 और 18 जुलाई, 2017 को पारित आदेशों के साथ-साथ राज्य स्तरीय समिति के 27 नवंबर, 2020 के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि क्षेत्रीय और जिला स्तरीय समितियों के समक्ष लंबित कार्यवाहियों को तत्काल बंद किया जाए। कोर्ट ने पुष्टि की कि जिला स्तरीय समिति द्वारा 2014 और 2016 में दिए गए निष्कर्ष, जिनमें याचिकाकर्ताओं के जाति प्रमाण पत्रों को वैध घोषित किया गया था, प्रभावी रहेंगे।

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: अफ़ज़ाल अहमद और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 4 अन्य
  • केस नंबर: रिट-सी नंबर 12679 ऑफ 2022
  • बेंच: जस्टिस नीरज तिवारी और जस्टिस गरिमा प्रशांत
  • दिनांक: 6 अप्रैल, 2026

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