सुप्रीम कोर्ट ने इंडियन रिजर्व बटालियन (IRB) के एक कांस्टेबल, जय प्रकाश यादव को अपने वरिष्ठ अधिकारी, सब-इंस्पेक्टर सुनील सोरेन की 2014 में हुई हत्या के आरोपों से बरी कर दिया है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (circumstantial evidence) की एक पूरी श्रृंखला स्थापित करने में विफल रहा। कोर्ट ने टिप्पणी की कि “साक्ष्यों की कड़ी में एक भी कमी या कमजोर कड़ी अभियोजन के मामले के लिए घातक साबित हो सकती है।” इसके साथ ही, कोर्ट ने निचली अदालत और झारखंड हाईकोर्ट के फैसलों को रद्द करते हुए अपीलकर्ता को लगभग 12 साल की कैद के बाद तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि और अदालती कार्यवाही
यह घटना 18 मई 2014 को शाम करीब 7:30 बजे आईआरबीपी पिपरवार कैंप में हुई थी। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि अपीलकर्ता ने छुट्टी मंजूर न होने के कारण एस.आई. सुनील सोरेन की इंसास (INSAS) राइफल से गोली मारकर हत्या कर दी थी।
27 सितंबर 2016 को, ट्रायल कोर्ट (II ASJ, चतरा) ने यादव को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और आर्म्स एक्ट की धारा 27 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। 23 सितंबर 2024 को झारखंड हाईकोर्ट ने भी इस सजा की पुष्टि कर दी थी, जिसके बाद अपीलकर्ता ने विशेष अनुमति याचिका (SLP) के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
गवाहों के बयानों का विश्लेषण
अभियोजन का पूरा मामला मुख्य रूप से एक हवलदार (PW-3) की गवाही पर टिका था। अपनी मुख्य परीक्षा में, PW-3 ने दावा किया था कि उसने अपीलकर्ता को घटनास्थल से हथियार के साथ आते देखा था और अपीलकर्ता ने अपना जुर्म भी कबूल किया था।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने PW-3 की जिरह (cross-examination) में आए विरोधाभास को रेखांकित किया, जिसमें उसने स्वीकार किया था:
“गोलियों की आवाज सुनने के बाद जब मैं बाहर आया, उस समय अंधेरा हो चुका था। अंधेरे के कारण चेहरा साफ दिखाई नहीं दे रहा था… जय प्रकाश की आवाज से ऐसा लगा कि वह जय प्रकाश ही था।”
पीठ ने पाया कि यह स्वीकारोक्ति गवाह की विश्वसनीयता को गंभीर रूप से प्रभावित करती है, क्योंकि पहचान केवल आवाज के आधार पर की गई थी, न कि प्रत्यक्ष पहचान के आधार पर। कोर्ट ने यह भी पाया कि अन्य गवाह या तो केवल सुनी-सुनाई बातें कह रहे थे या मुकर (hostile) गए थे।
बैलिस्टिक साक्ष्य और ‘राइफल अदला-बदली’ का तर्क
अभियोजन का तर्क था कि हालांकि अपीलकर्ता को बट नंबर 329 वाली राइफल आवंटित की गई थी, लेकिन उसने हत्या के लिए बट नंबर 351 वाली राइफल का उपयोग किया। एक जवान (CW-3) ने गवाही दी कि घटना से दस दिन पहले उनकी राइफलें गलती से बदल गई थीं।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दावे पर गहरा संदेह व्यक्त करते हुए कहा:
“यह स्वीकार करना कठिन है कि एक अनुशासित बल में, दो जवानों को आवंटित राइफलों की अदला-बदली दस दिनों तक किसी के संज्ञान में न आए। महत्वपूर्ण बात यह है कि 18 मई 2014 का ड्यूटी रजिस्टर भी साक्ष्य के रूप में पेश नहीं किया गया था।”
कोर्ट ने कहा कि संबंधित ड्यूटी रजिस्टर की अनुपस्थिति में “केवल संदेह” के आधार पर सजा बरकरार रखना सुरक्षित नहीं होगा।
परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर कानूनी सिद्धांत
शरद बिरधीचंद सारदा बनाम महाराष्ट्र राज्य (1984) के मामले में स्थापित सिद्धांतों को दोहराते हुए, कोर्ट ने जोर दिया कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित मामले में, साक्ष्यों की कड़ी इतनी पूर्ण होनी चाहिए कि वह बिना किसी संदेह के केवल आरोपी के दोष की ओर इशारा करे। पीठ ने स्पष्ट किया:
“जहां साक्ष्यों के आधार पर दो विचार संभव हों, वहां संदेह का लाभ अनिवार्य रूप से आरोपी को दिया जाना चाहिए।”
पीठ ने आगे टिप्पणी की कि हाईकोर्ट ने मामले की बारीकियों को समझने में चूक की और यह नहीं देख पाया कि अपीलकर्ता ने जिरह के दौरान किस तरह मुख्य गवाह के बयानों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया था।
निष्कर्ष और बहाली के निर्देश
साक्ष्यों को “पूरी तरह से अपर्याप्त” पाते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि को रद्द कर दिया। यह देखते हुए कि अपीलकर्ता पिछले 12 वर्षों से जेल में है, कोर्ट ने उसे तुरंत रिहा करने का आदेश दिया।
दोषसिद्धि के कारण सेवा से बर्खास्तगी के संबंध में कोर्ट ने निर्देश दिया:
“अपीलकर्ता को अपने नियुक्ति प्राधिकारी के समक्ष बहाली और अन्य परिणामी लाभों (consequential benefits) के लिए आवेदन करने की छूट दी जाती है… बशर्ते वह अभी भी अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से सक्षम हो।”
कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि यदि अपीलकर्ता ड्यूटी के लिए सक्षम नहीं पाया जाता है, तो नियुक्ति प्राधिकारी को उसे पर्याप्त वित्तीय मुआवजा सुनिश्चित करना चाहिए।
मामले का विवरण:
- केस शीर्षक: जय प्रकाश यादव बनाम झारखंड राज्य
- केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या ___ ऑफ 2026 [SLP (Crl.) No. 2536 of 2026 से उत्पन्न]
- पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा
- निर्णय की तिथि: 06 अप्रैल, 2026

