चाइल्ड पोर्नोग्राफी के भंडारण के लिए पीड़ित की पहचान अनिवार्य नहीं; दिल्ली हाईकोर्ट ने डिस्चार्ज का आदेश रद्द किया

दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम की धारा 15(2) के तहत मामला चलाने के लिए पीड़ित बच्चे की पहचान या उसकी शारीरिक उपस्थिति अनिवार्य शर्त नहीं है। हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज मटेरियल (CSAM) से संबंधित मामलों में अदालतों को “व्यक्तिपरक संतुष्टि के परीक्षण” (test of subjective satisfaction) का पालन करना चाहिए ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि सामग्री में दिखने वाला व्यक्ति बच्चा प्रतीत होता है या नहीं।

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने 4 अप्रैल, 2026 को दिए गए अपने फैसले में एक सत्र न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री के भंडारण और प्रसार के आरोपी दो व्यक्तियों को आरोपमुक्त (डिस्चार्ज) कर दिया था।

मामले की पृष्ठभूमि

इस मामले की शुरुआत ‘तुलिर चैरिटेबल ट्रस्ट’ द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) से हुई थी। याचिका में कड़कड़डूमा कोर्ट (शाहदरा जिला) के विशेष पॉक्सो कोर्ट द्वारा 1 सितंबर, 2023 को पारित आदेश को चुनौती दी गई थी। सत्र न्यायालय ने प्रतिवादी संख्या 2 (रमन गौतम) और 3 (संदीप सिंह उर्फ लवली) को पॉक्सो एक्ट की धारा 15(2) के तहत आरोपों से मुक्त कर दिया था। हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने बाद में इस जनहित याचिका को स्वतः संज्ञान लेते हुए पुनरीक्षण याचिका (suo motu revision petition) में बदल दिया था।

अभियोजन पक्ष का मामला सीबीआई द्वारा दर्ज एक एफआईआर पर आधारित था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि आरोपी सोशल मीडिया और थर्ड-पार्टी स्टोरेज प्लेटफॉर्म के माध्यम से चाइल्ड सेक्सुअल एक्सप्लॉइटेशन मटेरियल (CSEM) के प्रसार और भंडारण में शामिल थे। रमन गौतम के पास से एक हार्ड डिस्क और मोबाइल फोन जब्त किया गया था, जबकि संदीप सिंह से दो मोबाइल फोन बरामद हुए थे।

जांच में सामने आया कि संदीप सिंह ने रमन गौतम को CSEM भेजा था। रमन के उपकरणों से 34 वीडियो और हार्ड डिस्क से 14 वीडियो मिले, जबकि संदीप के उपकरणों से कुल 25 वीडियो बरामद हुए, जिनमें बच्चों को यौन रूप से स्पष्ट कृत्य (sexually explicit acts) करते हुए दिखाया गया था।

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सत्र न्यायालय का आदेश

सत्र न्यायालय ने आरोपियों को इस आधार पर डिस्चार्ज किया था कि वीडियो में दिखने वाले बच्चों की पहचान नहीं हो सकी है। कोर्ट का तर्क था कि चूंकि बच्चों के नाम, माता-पिता या पते ज्ञात नहीं हैं, इसलिए उनकी उम्र स्थापित करने के लिए कोई दस्तावेजी प्रमाण (जैसे जन्म प्रमाण पत्र) या वैज्ञानिक चिकित्सा परीक्षण (जैसे ऑसिफिकेशन टेस्ट) उपलब्ध नहीं है। निचली अदालत का मानना था कि उम्र के निश्चित निर्धारण के बिना पॉक्सो एक्ट के तहत ‘बच्चे’ की परिभाषा की शर्तें पूरी नहीं होतीं।

हाईकोर्ट के समक्ष तर्क

एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) सुश्री आशा तिवारी ने तर्क दिया कि केवल पीड़ित की पहचान न होने के कारण आरोपियों को छोड़ देना पॉक्सो एक्ट के उद्देश्य को विफल करता है। उन्होंने कहा कि अज्ञात ऑनलाइन पीड़ितों के मामलों में वैज्ञानिक आयु परीक्षण करना व्यावहारिक रूप से असंभव है।

सीबीआई ने याचिका का समर्थन करते हुए कहा कि कानून धारा 15(2) को लागू करने के लिए बच्चे की भौतिक उपस्थिति की मांग नहीं करता है। दूसरी ओर, प्रतिवादियों के वकील ने तर्क दिया कि उम्र के पुख्ता सबूत के बिना पॉक्सो के तहत आरोप तय नहीं किए जा सकते।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष

हाईकोर्ट ने अवलोकन किया कि पॉक्सो अधिनियम की धारा 15(2) उन व्यक्तियों को दंडित करती है जो किसी भी रूप में बच्चे से संबंधित अश्लील सामग्री का भंडारण या कब्जा प्रसार के उद्देश्य से रखते हैं।

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‘बच्चा’ और ‘चाइल्ड पोर्नोग्राफी’ की व्याख्या

जस्टिस शर्मा ने नोट किया कि यद्यपि धारा 2(1)(d) बच्चे को 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति के रूप में परिभाषित करती है, लेकिन आयु निर्धारण की सामान्य प्रक्रिया (धारा 94, जेजे एक्ट) मुख्य रूप से उन मामलों के लिए है जहाँ पीड़ित की पहचान हो चुकी हो।

हाईकोर्ट ने पॉक्सो एक्ट की धारा 2(1)(da) पर विशेष जोर दिया, जो ‘चाइल्ड पोर्नोग्राफी’ को ऐसी किसी भी दृश्य प्रस्तुति के रूप में परिभाषित करती है जो “बच्चा होने का आभास देती हो” (appear to depict a child)। हाईकोर्ट ने कहा:

“धारा 2(1)(da) में उपयोग किया गया शब्द ‘बच्चा होने का आभास देना’ अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह संकेत देता है कि… अदालत सामग्री का प्रथम दृष्टया मूल्यांकन कर यह तय कर सकती है कि चित्रण में दिखने वाला व्यक्ति बच्चा प्रतीत होता है या नहीं।”

व्यक्तिपरक संतुष्टि का परीक्षण (Test of Subjective Satisfaction)

सुप्रीम कोर्ट के जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस बनाम एस. हरीश (2024) मामले का हवाला देते हुए, हाईकोर्ट ने कहा कि “प्रथम दृष्टया व्यक्तिपरक संतुष्टि” पर्याप्त है। कोर्ट ने शीर्ष अदालत के शब्दों को उद्धृत किया:

“यदि आयु निर्धारण के लिए केवल वस्तुनिष्ठ मानदंडों (objective criteria) को अपनाया गया, तो चाइल्ड पोर्नोग्राफी के भंडारण से संबंधित अधिकांश मामले प्रारंभिक स्तर पर ही विफल हो जाएंगे… और आरोपी तकनीकी खामियों का लाभ उठाकर बच निकलेंगे।”

तथ्यों पर अनुप्रयोग

वर्तमान मामले में, सीबीआई ने मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज के दो विशेषज्ञों की राय ली थी। विशेषज्ञों ने सामग्री की जांच के बाद राय दी थी कि शारीरिक और यौन विकास के लक्षणों के आधार पर “वीडियो में दिखने वाले कुछ व्यक्ति बच्चे हैं, यानी 18 वर्ष से कम उम्र के हैं।” इसके अतिरिक्त, दिल्ली महिला आयोग की एक टीम ने भी सामग्री की पुष्टि की थी।

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हाईकोर्ट ने माना कि विशेषज्ञ की राय और गवाहों के बयानों के आधार पर “व्यक्तिपरक संतुष्टि” की शर्त पूरी होती है।

फैसला

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि सत्र न्यायालय ने इस मामले में “अति-तकनीकी दृष्टिकोण” (hyper-technical approach) अपनाकर गलती की है। कोर्ट ने कहा कि जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री धारा 15(2) के तहत आरोप तय करने के लिए पर्याप्त है।

हाईकोर्ट ने डिस्चार्ज के आदेश को रद्द कर दिया और सत्र न्यायालय को निर्देश दिया कि वह प्रतिवादियों के खिलाफ पॉक्सो एक्ट की धारा 15(2) के साथ-साथ आईटी एक्ट की धारा 67B और आईपीसी की धारा 120B के तहत आरोप तय करे और कानून के अनुसार मुकदमे की कार्यवाही आगे बढ़ाए।

मामले का विवरण:

  • केस शीर्षक: कोर्ट ऑन इट्स ओन मोशन बनाम स्टेट एवं अन्य
  • केस संख्या: CRL.REV.P. 691/2024
  • पीठ: जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा
  • दिनांक: 4 अप्रैल, 2026

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