छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा है कि जब सभी आरोपी एक ही साक्ष्य के आधार पर समान अपराध में शामिल हों, तो किसी विशेष आरोपी के पक्ष में कोई कृत्रिम अंतर (Artificial Distinction) नहीं किया जा सकता। इसी सिद्धांत को लागू करते हुए चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने रामावतार जग्गी हत्याकांड में पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र अमित जोगी की 2007 में हुई दोषमुक्ति को रद्द कर दिया है।
हाईकोर्ट ने अमित जोगी को हत्या की आपराधिक साजिश रचने के लिए भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 और 120-B के तहत दोषी ठहराया है और उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई है।
मामले की पृष्ठभूमि
4 जून 2003 को रायपुर में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के कोषाध्यक्ष रामावतार जग्गी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। 2004 में जांच संभालने वाली केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के अनुसार, यह हत्या 10 जून 2003 को होने वाली राकांपा की एक बड़ी रैली को विफल करने के लिए रची गई एक राजनीतिक साजिश थी। CBI ने अमित जोगी को मुख्य साजिशकर्ता के रूप में चिन्हित किया, जिन्होंने शूटर चिमन सिंह और अन्य सहयोगियों के माध्यम से इस अपराध को अंजाम दिया।
31 मई 2007 को ट्रायल कोर्ट ने 28 सह-आरोपियों को दोषी ठहराया था, लेकिन अमित जोगी को यह कहते हुए बरी कर दिया था कि वह साजिश का हिस्सा नहीं थे। इस दोषमुक्ति को CBI और मृतक के पुत्र सतीश जग्गी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता (CBI और शिकायतकर्ता): CBI के वकील वैभव ए. गोवर्धन और शिकायतकर्ता के वकील श्री सिंह ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने एक ही साक्ष्य पर 28 लोगों को सजा दी, लेकिन उन्हीं सबूतों के आधार पर अमित जोगी को बरी करना गलत था। उन्होंने निम्नलिखित साक्ष्यों पर भरोसा जताया:
- साजिश की बैठकें: रेजिनाल्ड जेरेमिया (PW-85) की गवाही, जिसमें उन्होंने होटल ग्रीन पार्क और मुख्यमंत्री निवास (CM House) में हुई उन बैठकों का विवरण दिया जहां जोगी ने कथित तौर पर राकांपा नेताओं को “खत्म” करने का प्रस्ताव रखा था।
- गवाहों की पुष्टि: सिद्धार्थ असाटी (PW-97) और रोहित प्रसाद (PW-126) के बयान, जिन्होंने चिमन सिंह की उपस्थिति और रैली में बाधा डालने की योजना की पुष्टि की थी।
- घटना के बाद का आचरण: हत्या के बाद जोगी द्वारा शूटर को 5 लाख रुपये देने के निर्देश और वास्तविक दोषियों को बचाने के लिए पुलिस अधिकारियों की मदद से फर्जी आरोपी खड़े करने के साक्ष्य।
प्रतिवादी (अमित जोगी): बचाव पक्ष के वकील विकास वालिया ने मामले की विस्तृत फाइलों का अध्ययन करने के लिए समय मांगा। हालांकि, हाईकोर्ट ने नोट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को जल्द निपटाने के निर्देश के साथ भेजा था और आरोपी के पास नवंबर 2025 से पर्याप्त समय था।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने साक्ष्यों की निरंतरता और “हेड नोट” में उल्लिखित कानूनी सिद्धांत पर ध्यान केंद्रित किया।
कृत्रिम विभेदीकरण पर: हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने “अनावश्यक रूप से आरोपी अमित जोगी की भूमिका को अन्य सजायाफ्ता सह-आरोपियों से अलग करने का प्रयास किया था।” कोर्ट ने कहा:
“जब सभी आरोपियों पर एक ही अपराध में शामिल होने का आरोप हो, तो किसी विशेष आरोपी के पक्ष में कृत्रिम अंतर नहीं किया जा सकता। यदि अभियोजन का मामला सभी आरोपियों के खिलाफ एक ही साक्ष्य पर आधारित है, तो उन्हीं सबूतों पर कुछ को दोषी ठहराना और एक को बरी करना अनुचित है, जब तक कि उस आरोपी के पक्ष में दोषमुक्ति का कोई ठोस और स्वतंत्र आधार न हो।”
मुख्य साजिशकर्ता की भूमिका पर: हाईकोर्ट ने माना कि तत्कालीन मुख्यमंत्री के पुत्र होने के कारण अमित जोगी “प्रभावी स्थिति” (Commanding Position) में थे। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“इतने बड़े स्तर के संगठित अपराध की साजिश… प्रभावशाली व्यक्ति की सक्रिय संलिप्तता, मार्गदर्शन और संरक्षण के बिना संभव नहीं थी।”
कोर्ट ने यह भी माना कि मुख्यमंत्री निवास, होटल ग्रीन पार्क और बत्रा हाउस में हुई लगातार बैठकें और पैसों का लेनदेन यह साबित करता है कि अमित जोगी इस साजिश के “मुख्य सूत्रधार और प्रेरक शक्ति” थे।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने 2007 की दोषमुक्ति को “पूरी तरह से अवैध, गलत और त्रुटिपूर्ण” घोषित किया।
अंतिम आदेश:
- दोषसिद्धि: अमित जोगी उर्फ अमित ऐश्वर्या जोगी को IPC की धारा 302 और 120-B के तहत दोषी करार दिया गया।
- सजा: उम्रकैद और 1,000 रुपये का जुर्माना (जुर्माना न देने पर छह महीने का अतिरिक्त श्रम कारावास)।
- आत्मसमर्पण: जोगी को तीन सप्ताह के भीतर संबंधित ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया है।
- रिवीजन याचिकाएं: CBI की अपील (ACQA No. 66/2026) स्वीकार की गई, जबकि अन्य दोषियों की सजा बढ़ाने की याचिका को निष्प्रभावी (Infructuous) मानते हुए खारिज कर दिया गया।
मामले का विवरण:
- केस नंबर: ACQA No. 66 of 2026
- बेंच: चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा
- तारीख: 2 अप्रैल, 2026

