मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका का निपटारा करते हुए 19 वर्षीय युवती को उसके साथी के साथ जाने की अनुमति दे दी है। युवती ने हाईकोर्ट में गवाही दी कि वह किसी अवैध कब्जे में नहीं है और अपने पति या माता-पिता के बजाय अपने पार्टनर के साथ रहना चाहती है। कोर्ट ने युवती की सुरक्षा और भविष्य को ध्यान में रखते हुए एक सरकारी वकील और एक महिला कांस्टेबल को “शौर्य दीदी” के रूप में नियुक्त किया है, जो अगले छह महीने तक उसकी देखरेख करेंगी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला एक याचिकाकर्ता द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है, जिसमें उसने अपनी पत्नी को वापस दिलाने की मांग की थी। याचिकाकर्ता का आरोप था कि उसकी पत्नी को विपक्षी नंबर 4 (पार्टनर) ने अवैध रूप से बंधक बनाकर रखा है।
2 अप्रैल, 2026 को जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की खंडपीठ के समक्ष युवती को दतिया जिले के सेवढ़ा पुलिस स्टेशन और वन स्टॉप सेंटर के अधिकारियों द्वारा पेश किया गया।
कार्यवाही और युवती के बयान
हाईकोर्ट के समक्ष उपस्थित होकर युवती ने स्पष्ट किया कि वह बालिग है और किसी के अवैध कब्जे में नहीं है। उसने बताया कि वह स्वतंत्र रूप से रह रही है और उसने अपने पति या माता-पिता के पास लौटने से साफ इनकार कर दिया। युवती ने आरोप लगाया कि उसके पति और माता-पिता उसके साथ “दुर्व्यवहार करते हैं” और वे उसके “शुभचिंतक नहीं हैं।”
हाईकोर्ट के निर्देश पर सरकारी वकील सुश्री अंजलि ज्ञानी ने युवती की काउंसलिंग की। काउंसलिंग के बाद कोर्ट को बताया गया कि युवती “वैवाहिक बंधन में नहीं रहना चाहती क्योंकि उसके पति की उम्र लगभग 40 वर्ष है जबकि उसकी उम्र केवल 19 वर्ष है।” युवती ने यह भी साझा किया कि वैवाहिक जीवन में तालमेल के बजाय “घरेलू कलह” अधिक थी।
दूसरी ओर, पार्टनर ने व्यक्तिगत रूप से पेश होकर कोर्ट को बताया कि वह युवती के साथ “भावनात्मक रूप से जुड़ा” है और युवती द्वारा याचिकाकर्ता से तलाक लेने के बाद उसके साथ विवाह करना चाहता है। उसने हाईकोर्ट को वचन दिया कि वह युवती का पूरा ध्यान रखेगा और उसे किसी भी तरह से परेशान नहीं करेगा।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और “शौर्य दीदी” की अवधारणा
हाईकोर्ट ने माना कि चूंकि युवती ने अपने पार्टनर के साथ रहने की इच्छा जताई है, इसलिए इस याचिका का उद्देश्य पूरा हो गया है।
हालांकि, युवती के सर्वोत्तम हित को देखते हुए हाईकोर्ट ने “शौर्य दीदी” की अवधारणा को लागू किया। इस अवधारणा का विस्तृत उल्लेख हरचंद गुर्जर बनाम मध्य प्रदेश राज्य व अन्य (ILR 2024 MP 2547) मामले में किया गया था। हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि ऐसी स्थितियों में युवतियों को केवल कानूनी सुरक्षा ही नहीं, बल्कि “भविष्य के लिए प्रोत्साहन, मार्गदर्शन और मेंटरिंग” की भी आवश्यकता होती है।
हरचंद गुर्जर मामले के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“शौर्य दीदी एक महिला सब-इनस्पेक्टर या कांस्टेबल या कोई उपयुक्त व्यक्ति हो सकती है… जो पीड़िता को मुख्यधारा में आने, पढ़ाई करने या व्यावसायिक पाठ्यक्रम (vocational course) से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित कर सकें ताकि वह भविष्य में अपने पैरों पर खड़ी हो सके।”
खंडपीठ ने कहा कि कभी-कभी माता-पिता ऐसी परिस्थितियों को संभालने के लिए पर्याप्त रूप से सक्षम नहीं होते हैं, इसलिए समाज या राज्य को आगे आना चाहिए।
अंतिम निर्णय
हाईकोर्ट ने युवती को उसके पार्टनर के साथ जाने की अनुमति दे दी। उसकी सुरक्षा और मार्गदर्शन सुनिश्चित करने के लिए सरकारी वकील सुश्री अंजलि ज्ञानी और महिला कांस्टेबल भावना को अगले छह महीने के लिए युवती की “शौर्य दीदी” नियुक्त किया गया है। वे लगातार युवती के संपर्क में रहेंगी और उसकी कुशलता की जानकारी लेंगी।
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि सभी औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद युवती को वन स्टॉप सेंटर, कंपू (ग्वालियर) से रिहा कर दिया जाए।
केस विवरण
- केस टाइटल: अब्धेश बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य
- केस नंबर: रिट याचिका संख्या 5164/2026
- बेंच: जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस पुष्पेंद्र यादव
- तारीख: 2 अप्रैल, 2026

