दिल्ली हाईकोर्ट ने आजादपुर स्थित एक व्यावसायिक संपत्ति पर कब्जे को लेकर निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा है कि यदि कोई व्यक्ति मकान मालिक और किरायेदार के संबंधों को साबित करने में विफल रहता है, तो उसे ‘अतिक्रमी’ (Rank Trespasser) माना जाएगा। जस्टिस अनुप जयराम भंभानी ने कब्जाधारी की अपील को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि बिजली के बिल और मार्केट कमेटी के नोटिस जैसे दस्तावेज दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम (DRC एक्ट), 1958 के तहत संरक्षित किरायेदारी साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद नई सब्जी मंडी, आजादपुर स्थित दुकान संख्या C-20 से जुड़ा है। उत्तरदाता ‘मेहता रोशन लाल एंड संस’ (वादी) ने अपीलकर्ता राम गोपाल मिश्रा (प्रतिवादी) के खिलाफ कब्जे की बहाली, स्थायी निषेधाज्ञा और हर्जाने के लिए मुकदमा दायर किया था।
निचली अदालत ने 6 जनवरी 2024 को वादी के पक्ष में डिक्री पारित की थी। अदालत ने पाया था कि पिछला किरायेदार जाने के बाद अपीलकर्ता ने 2011 में अनधिकृत रूप से दुकान पर कब्जा कर लिया था। अपीलकर्ता ने इस फैसले को सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 96 के तहत हाईकोर्ट में चुनौती दी और दावा किया कि वह ₹2,000 प्रति माह का किरायेदार है।
पक्षों के तर्क
अपीलकर्ता की ओर से वकील राहुल शर्मा ने दलील दी कि वह 2001 से मौखिक किरायेदार है और किराया ₹3,500 से कम होने के कारण यह मामला DRC एक्ट की धारा 50 के तहत वर्जित है। उन्होंने अपनी बात साबित करने के लिए निम्नलिखित दस्तावेज पेश किए:
- कृषि उत्पाद विपणन समिति (APMC) द्वारा जारी जुर्माना रसीद।
- APMC द्वारा भेजे गए कारण बताओ नोटिस, जिनमें दुकान का पता दर्ज था।
- चेक के माध्यम से भुगतान किए गए बिजली के बिल।
दूसरी ओर, उत्तरदाता की ओर से डॉ. अमित जॉर्ज ने तर्क दिया कि दोनों पक्षों के बीच कभी कोई कानूनी संबंध नहीं रहा। उन्होंने कहा कि अपीलकर्ता और एक अन्य व्यक्ति ने 21-22 जुलाई 2011 की रात को दुकान में “अतिक्रमी के रूप में अवैध रूप से प्रवेश किया और कब्जा कर लिया।” उत्तरदाता ने यह भी बताया कि उन्होंने रेंट कंट्रोलर के पास जमा किया गया किराया कभी नहीं निकाला, ताकि किरायेदारी की कोई स्वीकृति न बन जाए।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता किसी भी प्रकार का औपचारिक लीज एग्रीमेंट, रेंट डीड या विश्वसनीय मौखिक साक्ष्य पेश करने में असमर्थ रहा। जस्टिस भंभानी ने नोट किया कि किरायेदारी साबित करने का पूरा भार अपीलकर्ता पर था।
रेंट कंट्रोलर के पास किराया जमा करने के आवेदनों पर कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“DRC एक्ट की धारा 27 (निचली अदालत के रिकॉर्ड में इसे धारा 21 बताया गया है) के तहत प्रक्रिया एक संक्षिप्त प्रक्रिया है जो मकान मालिक और किरायेदार के संबंधों की स्वीकृति पर आधारित होती है। यदि यह संबंध विवादित है, तो अदालत के पास इस प्रावधान के तहत इसकी जांच करने का अधिकार क्षेत्र नहीं है।”
कोर्ट ने आगे कहा:
“APMC द्वारा चालान या कारण बताओ नोटिस जारी करना, या अपीलकर्ता द्वारा बिजली बिलों का भुगतान करना, अपीलकर्ता और उत्तरदाता के बीच मकान मालिक-किरायेदार के संबंधों के अस्तित्व का प्रमाण नहीं है।”
हर्जाने (Mesne Profits) के मुद्दे पर, हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा तय किए गए ₹40,000 प्रति माह के जुर्माने को उचित और तर्कसंगत पाया।
निर्णय
हाईकोर्ट ने अपील (RFA 362/2024) को खारिज कर दिया और कहा कि निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है। इसके साथ ही, उत्तरदाता द्वारा हर्जाना बढ़ाने के लिए दायर की गई क्रॉस-अपील (RFA 298/2024) को भी खारिज कर दिया गया।
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि अपीलकर्ता संपत्ति पर अंतिम कब्जाधारी था और उसे अतिक्रमी पाया गया है, इसलिए वह संपत्ति वापस करने और अवैध कब्जे की अवधि के लिए हर्जाना भरने के लिए उत्तरदायी है।
केस विवरण
- केस शीर्षक: राम गोपाल मिश्रा बनाम मेहता रोशन लाल एंड संस (RFA 362/2024 और RFA 298/2024)
- केस साइटेशन: 2026:DHC:2752
- बेंच: जस्टिस अनुप जयराम भंभानी
- तारीख: 02 अप्रैल, 2026

