गुजारा भत्ता पति की आय के अनुपात में होना चाहिए; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 11,000 रुपये के भत्ते को घटाकर 7,500 रुपये किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए पत्नी और बच्चे को दिए जाने वाले गुजारा भत्ता (भरण-पोषण) की राशि में कटौती की है। न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने स्पष्ट किया कि हालांकि अपने परिवार का भरण-पोषण करना पति का कानूनी दायित्व है, लेकिन भत्ते की राशि उसकी आय के “उचित और आनुपातिक” होनी चाहिए।

यह मामला सरफराज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 2 अन्य (CRIMINAL REVISION No. 1116 of 2025) से संबंधित है। इसमें मुख्य विवाद यह था कि क्या फैमिली कोर्ट द्वारा निर्धारित 11,000 रुपये प्रति माह का भत्ता पति की वित्तीय क्षमता से अधिक था। हाईकोर्ट ने पति की आय का आकलन 30,000 रुपये प्रति माह किया और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के आधार पर कुल भत्ते को घटाकर 7,500 रुपये कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

पुनरीक्षणकर्ता (Revisionist) सरफराज ने प्रिन्सिपल जज, फैमिली कोर्ट, आगरा द्वारा 24 जनवरी, 2025 को पारित आदेश को चुनौती दी थी। मेंटेनेंस केस नंबर 617/2019 (धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत) में निचली अदालत ने उसे अपनी पत्नी (विपक्षी संख्या 2) को 7,000 रुपये और बच्चे (विपक्षी संख्या 3) को 4,000 रुपये प्रति माह देने का निर्देश दिया था।

पक्षों के तर्क

पुनरीक्षणकर्ता की ओर से: वकील श्री जय राज ने तर्क दिया कि सरफराज अपने भाई की दुकान में मजदूर के रूप में काम करता है और केवल 8,000 से 9,000 रुपये प्रति माह कमाता है। यह भी तर्क दिया गया कि उसकी आय का कोई नियमित स्रोत नहीं है और उस पर अन्य जिम्मेदारियां भी हैं। बचाव पक्ष ने कहा कि निचली अदालत का आदेश सुप्रीम कोर्ट द्वारा निम्नलिखित मामलों में प्रतिपादित कानूनों का उल्लंघन करता है:

  • रजनीश बनाम नेहा और अन्य (2021) 2 SCC 324
  • कल्याण डे चौधरी बनाम रीता डे चौधरी उर्फ नंदी AIR 2017 SC 2383
  • कुलभूषण कुमार बनाम राज कुमारी (1970) 3 SCC 129
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विपक्षी दलों की ओर से: विपक्षी संख्या 2 के वकील और राज्य के ए.जी.ए. ने याचिका का विरोध किया। उनका कहना था कि वर्तमान महंगाई को देखते हुए निचली अदालत द्वारा तय की गई राशि अत्यधिक नहीं है और न ही यह पति की क्षमता से बाहर है। उन्होंने पुनरीक्षण याचिका को आधारहीन बताते हुए इसे खारिज करने की मांग की।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने पाया कि विवाह एक स्वीकृत तथ्य है। आय के संबंध में कोर्ट ने गौर किया कि हालांकि सरफराज ने खुद को अपने भाई की दुकान में सहायक बताया, लेकिन उसकी सटीक आय के बारे में कोई दस्तावेजी सबूत पेश नहीं किए गए थे।

ऐसी स्थिति में, कोर्ट ने आय का एक उचित आकलन किया:

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“विश्वसनीय साक्ष्यों के अभाव में, उसकी आय 1,000 रुपये प्रतिदिन यानी सभी स्रोतों से 30,000 रुपये प्रति माह आंकी जाती है।”

सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का हवाला देते हुए, जिनमें कहा गया है कि गुजारा भत्ता पति की शुद्ध आय के 25% तक दिया जा सकता है, हाईकोर्ट ने गणना की कि 30,000 रुपये का 25% हिस्सा 7,500 रुपये प्रति माह बनता है।

कोर्ट ने कहा:

“यह सच है कि पत्नी और बच्चे का भरण-पोषण करना पति का कानूनी दायित्व है; हालांकि, भत्ते की राशि उचित और उसकी आय के आनुपातिक होनी चाहिए। इसलिए, निचली अदालत द्वारा दिया गया भत्ता अत्यधिक प्रतीत होता है और इसमें संशोधन की आवश्यकता है।”

न्यायालय का निर्णय

हाईकोर्ट ने कुल गुजारा भत्ता 11,000 रुपये से घटाकर 7,500 रुपये प्रति माह कर दिया। संशोधित राशि का वितरण इस प्रकार है:

  • पत्नी (विपक्षी संख्या 2) के लिए: 4,000 रुपये प्रति माह।
  • बच्चे (विपक्षी संख्या 3) के लिए: 3,500 रुपये प्रति माह।
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यह राशि आवेदन की तिथि से देय होगी। हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि यदि सरफराज ने पहले ही कोई राशि जमा की है, तो उसे समायोजित (adjust) किया जाएगा। बकाया राशि (arrears) का भुगतान 20 समान मासिक किश्तों में किया जाएगा, जिसकी पहली किश्त 10 अप्रैल, 2026 तक जमा करनी होगी।

मामले का विवरण

  • केस टाइटल: सरफराज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 2 अन्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल रिवीजन नंबर 1116 ऑफ 2025
  • पीठ: न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह
  • दिनांक: 17 मार्च, 2026

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