दिल्ली हाईकोर्ट ने लक्ष्मीबाई कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) की एक एसोसिएट प्रोफेसर, रंजीत कौर के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया है। यह एफआईआर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST एक्ट) और भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज की गई थी। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि जाति-आधारित आरोप एक प्रशासनिक विवाद में “बाद में जोड़े गए” प्रतीत होते हैं और इस विशेष अधिनियम के तहत अपराध मानने के लिए आवश्यक विशिष्टता का अभाव है।
मामले की पृष्ठभूमि
विवाद की शुरुआत 16 अगस्त, 2021 को लक्ष्मीबाई कॉलेज में ‘नेशनल असेसमेंट एंड एक्रेडिटेशन काउंसिल’ (NAAC) की तैयारियों के संबंध में आयोजित एक विभागीय बैठक के दौरान हुई थी। याचिकाकर्ता रंजीत कौर (विभागाध्यक्ष) और प्रतिवादी नंबर 2, डॉ. नीलम (एसोसिएट प्रोफेसर) के बीच बैठक के मिनट्स (कार्यवृत्त) पर हस्ताक्षर करने को लेकर बहस हुई थी।
याचिकाकर्ता के अनुसार, डॉ. नीलम ने तुरंत हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया, जिससे रजिस्टर को लेकर हाथापाई हुई। इसके विपरीत, शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता ने उन पर बिना पढ़े हस्ताक्षर करने का दबाव बनाया और सहकर्मियों के सामने उन्हें थप्पड़ मारा।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता ने एफआईआर संख्या 0512/2021 को रद्द करने की मांग करते हुए तर्क दिया कि यह शिकायत “दुर्भावना से प्रेरित” है और निजी रंजिश निकालने के लिए की गई है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि घटना के दिन शिकायतकर्ता द्वारा प्रिंसिपल और पुलिस को दी गई शुरुआती हस्तलिखित शिकायतों में जातिगत टिप्पणियों या एससी सदस्य होने के कारण अपमानित करने का कोई जिक्र नहीं था।
प्रतिवादी नंबर 2 (शिकायतकर्ता) ने तर्क दिया कि उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। उन्होंने कहा कि हालांकि उनकी शुरुआती शिकायतें शारीरिक हमले पर केंद्रित थीं, लेकिन बाद में उन्होंने विस्तार से जातिगत अत्याचारों का विवरण दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता का व्यवहार लंबे समय से “जातिवादी” रहा है और उन्होंने पहले भी “कोटा लाभार्थियों” के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की थी।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने शिकायतों के घटनाक्रम की बारीकी से जांच की। हाईकोर्ट ने पाया कि 16 अगस्त, 2021 को दी गई पहली दो हस्तलिखित शिकायतों में केवल शारीरिक विवाद और थप्पड़ का उल्लेख था।
हाईकोर्ट ने कहा:
“जातिगत तत्व पहली बार 17.08.2021 को प्रिंसिपल को दी गई शिकायत में सामने आता है, जो घटना के पहले से बताए गए विवरण में बाद में जोड़े गए एक विचार के रूप में प्रतीत होता है।”
इसके अलावा, हाईकोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 161 और 164 के तहत दर्ज बयानों का विश्लेषण किया। हाईकोर्ट ने पाया कि केवल एक गवाह, डॉ. पूनम रानी ने याचिकाकर्ता द्वारा विशिष्ट जातिगत अपशब्दों के इस्तेमाल की बात कही, जबकि शिकायतकर्ता ने स्वयं अपने बयानों में इन टिप्पणियों को “अस्पष्ट और सामान्य” बताया।
SC/ST एक्ट की कानूनी आवश्यकताओं के संबंध में हाईकोर्ट ने कहा:
“SC/ST एक्ट की धारा 3 के तहत अपराध बनने के लिए यह आवश्यक है कि कथित कार्य पीड़ित को अपमानित करने के इरादे से किया गया हो, विशेष रूप से उसकी जातिगत पहचान के कारण… कथित कार्य और पीड़ित की जातिगत पहचान के बीच संबंध (Nexus) स्पष्ट और निर्विवाद रूप से शिकायत के स्वरूप से ही स्थापित होना चाहिए।”
हाईकोर्ट ने पाया कि विवाद का मूल कारण एक “प्रशासनिक मतभेद” था और एक एकल गवाह का बयान, जिसे शिकायतकर्ता ने स्वयं अपने बयानों में विशिष्ट रूप से पुष्ट नहीं किया, इस एक्ट के तहत आरोपों का आधार नहीं बन सकता।
IPC की धारा 323 (स्वेच्छा से चोट पहुँचाना) और 504 (शांति भंग करने के इरादे से अपमान) के आरोपों के संबंध में हाईकोर्ट ने कहा कि ये दोनों गैर-संज्ञेय (Non-Cognizable) अपराध हैं। सीआरपीसी की धारा 155(2) के तहत, मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना ऐसे अपराधों के लिए एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती। हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि घटना के दिन ही धारा 323 के तहत एक एनसीआर (NCR) पहले ही दर्ज की जा चुकी थी।
हाईकोर्ट का निर्णय
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने निष्कर्ष निकाला कि यह एफआईआर टिकने योग्य नहीं है। हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए थाना भारत नगर में दर्ज एफआईआर संख्या 0512/2021 और उससे उत्पन्न सभी कार्यवाही को रद्द कर दिया।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता भारतीय दंड संहिता के आरोपों के संबंध में “कानून के अनुसार उचित उपाय” करने के लिए स्वतंत्र है।
मामले का विवरण:
- केस टाइटल: रंजीत कौर बनाम राज्य (N.C.T. दिल्ली) एवं अन्य
- केस नंबर: W.P.(CRL) 1622/2021 एवं CRL.M.A. 13581/2021
- बेंच: जस्टिस नीना बंसल कृष्णा
- दिनांक: 01 अप्रैल, 2026

